जॉनसन एंड जॉनसन (J&J) कंपनी ने अमेरिका में अपने टॉक-बेस्ड बेबी पाउडर से जुड़े हजारों मुकदमों को सुलझाने के लिए करीब 5.5 बिलियन डॉलर (लगभग 46,000 करोड़ रुपये) का प्रस्तावित सेटलमेंट स्वीकार कर लिया है। यह सेटलमेंट करीब 76,000 क्लेम्स को कवर करता है। इसमें दावा किया गया था कि कंपनी का पाउडर ओवेरियन कैंसर का कारण बना। सेटलमेंट को अंतिम रूप देने के लिए कम से कम 95 प्रतिशत क्लेमेंट्स की मंजूरी जरूरी है।
भारत में रहने वाले लोग सोच रहे होंगे कि क्या यह मामला उन पर भी लागू होता है। इसका सीधा जवाब है – नहीं।
क्या है पूरा मामला
2019 में अमेरिका में FDA के लिए काम करने वाली एक लैब ने जॉनसन के बेबी पाउडर की एक बोतल में एस्बेस्टस पाया। यह पहली बार था जब अमेरिकी नियामक संस्था ने इस प्रोडक्ट में एस्बेस्टस की पुष्टि की थी। इसके बाद 33,000 बोतलों को रिकॉल कर लिया गया।
एस्बेस्टस असल में क्या है?
एस्बेस्टस कोई एक खनिज नहीं है। यह छह प्राकृतिक सिलिकेट खनिजों का समूह है जो पतले और मजबूत फाइबर्स में बंट जाते हैं। बीसवीं सदी में यह बहुत इस्तेमाल होता था क्योंकि यह आग नहीं पकड़ता, गर्मी सहन करता है, बिजली नहीं चालता और सस्ता भी है। इसी वजह से इसे छतों, पाइप्स, ब्रेक पैड्स, इंसुलेशन और कभी-कभी टॉक प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल किया गया। खतरा इन फाइबर्स से है। जब इन्हें सांस के साथ अंदर लिया जाता है तो ये फेफड़ों में गहरे जाकर दशकों तक रह जाते हैं। इससे फेफड़ों में घाव (एस्बेस्टोसिस), मेसोथेलियोमा और फेफड़े का कैंसर हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सभी प्रकार के एस्बेस्टस को इंसानों के लिए कैंसर पैदा करने वाला माना है। एक्सपोजर की कोई सुरक्षित सीमा नहीं बताई गई है। लक्षण दिखने में 15 से 40 साल लग सकते हैं।
बेबी पाउडर और एस्बेस्टस का कनेक्शन
टॉक और एस्बेस्टस दो अलग खनिज हैं। लेकिन जमीन के नीचे ये अक्सर एक साथ पाए जाते हैं। अगर टॉक खोदते समय सावधानी न बरती जाए और टेस्टिंग ठीक से न हो तो एस्बेस्टस मिल सकता है। अमेरिका के मुकदमों का आधार यही है – खनन और स्क्रीनिंग में कमी।
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भारत में स्थिति क्या है?
भारत में J&J बेबी पाउडर वाला डर कभी नहीं रहा, लेकिन एस्बेस्टस की समस्या कहीं बड़ी और गहरी है। 1993 में भारत ने एस्बेस्टस की खदान बंद कर दी, लेकिन इसके इस्तेमाल और आयात पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया। भारत दुनिया का सबसे बड़ा एस्बेस्टस प्रोडक्ट्स आयातक देश है। इसे सीमेंट पाइप्स, छत की शीट्स और ब्रेक लाइनिंग में खूब इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर आयात रूस और कजाकिस्तान से होता है, जो सफेद एस्बेस्टस (क्रिसोटाइल) होता है।
क्यों जारी है इस्तेमाल?
मुख्य वजह आर्थिक है। एस्बेस्टस वाली सीमेंट छतें सस्ती पड़ती हैं। गांवों में सस्ती आवास योजनाओं में इनका खूब इस्तेमाल होता है। इसके इर्द-गिर्द एक पूरा उद्योग और कामगारों का नेटवर्क भी बन गया है। 2022 में पर्यावरण मंत्रालय ने संसद को बताया कि एस्बेस्टस के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। हालांकि, सरकार खुद माइंस एक्ट के तहत एस्बेस्टस से होने वाली बीमारियों को मानती है।
नवंबर 2025 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने स्कूलों में एस्बेस्टस छतों पर सुनवाई में देशव्यापी बैन लगाने से इनकार कर दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सामान्य इस्तेमाल में सीधा नुकसान साबित करने वाले पुख्ता सबूत नहीं हैं। हालांकि उसने हैंडलिंग, डिस्पोजल के लिए सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाने और स्कूलों को सलाह देने के निर्देश दिए।











