आज का श्लोक : संगठित समाज के बिना राष्ट्र वैभवशाली नहीं हो सकता
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होम धर्म-संस्कृति

आज का श्लोक : संगठित समाज के बिना राष्ट्र वैभवशाली नहीं हो सकता

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 26, 2026, 06:00 am IST
inधर्म-संस्कृति

यह श्लोक संगठन, सामाजिक एकता और जन-शक्ति के महत्व को दर्शाने वाला एक अत्यंत दूरदर्शी विचार है।

 

धन-धान्य-सुसम्पन्नं स्वर्णरत्नादि संभवम्।
सुसंहतिं विना राष्ट्र नहि स्यात् शून्य-वैभवम्।।

भावार्थ-

धन-धान्य से सुसम्पन्न, सोने और रत्नों की प्रचुर खानों से परिपूर्ण हो, ऐसा राष्ट्र भी संगठित समाज के बिना वैभवशाली नहीं हो सकता।

आज की प्रासंगिकता: आज के समय में यह श्लोक हमें यह संदेश देता है कि आर्थिक समृद्धि (धन-धान्य) और प्राकृतिक संसाधन केवल ढांचा प्रदान करते हैं, लेकिन राष्ट्र की आत्मा उसके नागरिकों की एकता और संगठन में बसती है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” की भावना को रेखांकित करता है। यह याद दिलाता है कि नागरिक अनुशासन और संगठन ही किसी राष्ट्र की असली संपत्ति हैं।

Topics: आज का श्लोकजन-शक्तिसमृद्धिधन-धान्यसबका साथस्वर्ण और रत्नसबका विकासवैभवराष्ट्र निर्माणसामूहिक प्रयासअखंडतानागरिक कर्तव्यसंगठित समाज
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