राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस एक आरोप पिछले कई दशकों से लगातार दोहरा रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत नहीं है। यह कोई नया प्रश्न नहीं है, न ही हाल के वर्षों में पहली बार सामने आया मुद्दा है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनेक बार अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रख चुका है। स्वयं सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत भी विभिन्न मंचों से इस विषय पर स्पष्टता दे चुके हैं। इसके बावजूद यह प्रश्न समय-समय पर फिर सामने आ जाता है।
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि किसी विषय पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण पहले से उपलब्ध है, तो वही प्रश्न बार-बार क्यों दोहराया जाता है? क्या यह उत्तर तलाशने का प्रयास है, या फिर किसी राजनीतिक ‘नैरेटिव’ को बनाए रखने की कोशिश?
हाल ही में कर्नाटक सरकार के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैधानिक स्थिति, संरचना, वित्तीय व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर प्रश्न उठाए। यह विवाद ऐसे समय में खड़ा किया गया जब रा. स्व. संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है।
इस विषय पर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत विभिन्न अवसरों पर अपना पक्ष रख चुके हैं। एक अवसर पर उन्होंने कहा था, “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।” उनके इस कथन का आशय यह था कि समाज जीवन की अनेक संस्थाएं और परंपराएं राज्य द्वारा निर्मित नहीं होतीं, बल्कि समाज की स्वीकृति और सहभागिता से विकसित होती हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया। पहला प्रतिबंध 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरकार ने संघ पर लगाया था। बाद में किसी भी आरोप के सिद्ध न होने पर 11 जुलाई, 1949 को यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। दूसरा प्रतिबंध आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 4 जुलाई, 1975 को लगाया, जिसे आपातकाल की समाप्ति के बाद 1977 में हटा लिया गया।
तीसरा प्रतिबंध 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद तत्कालीन पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार ने 10 दिसंबर, 1992 को लगाया था। इस मामले में भी न्यायिक जांच हुई तो संघ की कोई संलिप्तता नहीं पाई गई, इसलिए 4 जून, 1993 को प्राधिकरण ने इसे हटा दिया। यहां सवाल उठता है कि यदि किसी संगठन का कोई विधिक अस्तित्व ही न हो, तो उस पर प्रतिबंध लगाने, प्रतिबंध हटाने अथवा उससे संबंधित सरकारी प्रक्रियाएं कैसे संचालित हो सकती हैं?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2016 में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी संघ को लेकर इसी प्रकार के प्रश्न उठाए थे। बाद के वर्षों में अन्य नेताओं ने भी इसी प्रकार के आरोप लगाए। चेहरे बदलते रहे, लेकिन आरोपों की प्रकृति लगभग समान बनी रही।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कांग्रेस के बीच वैचारिक मतभेद स्वतंत्रता के बाद से ही सार्वजनिक रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू के समय से संघ को लेकर असहमति व्यक्त की जाती रही। बाद में इंदिरा गांधी के शासनकाल में संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और आपातकाल के दौरान हजारों स्वयंसेवक जेल भी गए। आगे चलकर राहुल गांधी ने भी विभिन्न मंचों से महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में संघ पर आरोप लगाए, जिनमें से कुछ मामलों में न्यायालय तक जाना पड़ा। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह विवाद केवल वर्तमान राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों का हिस्सा रहा है।
जहां तक पंजीकरण के प्रश्न का संबंध है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में हुई थी। उस समय भी और आज भी इसका उद्देश्य है हिंदू समाज को संगठित करना। इसी संदर्भ में यह भी कहा गया है कि भारत में अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक संस्थाएं किसी एक केंद्रीय पंजीकरण व्यवस्था के अंतर्गत कार्य नहीं करतीं। इसलिए पंजीकृत न होना और अवैध होना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। यह प्रश्न भी अक्सर उठाया जाता है कि संघ की गतिविधियों को चलाने के लिए धन कहां से मिलता है, तो इसका भी उत्तर है, संघ की सारी व्यवस्थाएं संघ के स्वयंसेवकों द्वारा दी गई गुरुदक्षिणा से चलती हैं। यानी संघ का आर्थिक आधार समाज है, राज्य नहीं।
संरचना के संदर्भ में भी संघ स्वयं को एक विकेंद्रित सामाजिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। हालांकि संघ के जो भी अनुषांगिक संगठन हैं, वे पंजीकृत हैं, वहां सारी प्रक्रियाओं का पालन होता है।
वैधानिक स्थिति के प्रश्न पर भी प्रस्तुत सामग्री में यह तर्क रखा गया है कि यदि कोई संगठन विधिक रूप से संदिग्ध होता, तो सरकारें उसके संबंध में प्रशासनिक निर्णय नहीं ले सकतीं, उस पर प्रतिबंध लगाने या हटाने की प्रक्रिया संभव नहीं होती, उससे संवाद नहीं किया जाता और न्यायालय भी उससे संबंधित मामलों में निर्णय नहीं देते। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में दशकों से ऐसी प्रक्रियाएं होती रही हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंजीकृत न होना कोई नई या छिपी हुई जानकारी नहीं है। इस विषय पर संघ और उसके शीर्ष नेतृत्व की तरफ से अनेक बार सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा जा चुका है। बावजूद इसके कांग्रेस के विभिन्न नेताओं द्वारा बार-बार यही प्रश्न दोहराने का अर्थ झूठा विमर्श खड़ा करने का प्रयास है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों की जिम्मेदारी यही है कि वे आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर उपलब्ध तथ्यों, सार्वजनिक बयानों और दस्तावेजों के आधार पर स्वयं अपना निष्कर्ष निकालें।
संघ स्वयं को समाज में एक अलग संगठन के रूप में नहीं, बल्कि समाज के संगठन के रूप में देखता है। स्थापना काल से ही उसका मूल विचार यह रहा है कि संघ का उद्देश्य किसी नए संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि पूरे समाज को संगठित करना है। इसी कारण संघ, या कहिए स्वयंसेवक, इसे एक पृथक संस्था के बजाय समाज की चेतना को जागृत करने और उसे संगठित करने वाले सतत अभियान के रूप में जीते हैं।संघ में ऐसे हजारों स्वयंसेवकों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने घर-परिवार के सुख-सुविधाओं का त्याग कर अपना जीवन समाज के लिए समर्पित किया है। पारदर्शिता की बात करने वालों को इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि संघ का स्वयंसेवक सबसे पहले समाज की कसौटी पर परखा जाता है। उसकी स्वीकार्यता और संघ की प्रतिष्ठा किसी सरकारी प्रमाणपत्र से नहीं, बल्कि समाज के विश्वास, आचरण और निरंतर सामाजिक मूल्यांकन से निर्मित होती है।
प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है और प्रत्येक प्रश्न का स्वागत होना चाहिए, लेकिन शर्त यह है कि प्रश्न उत्तर जानने की वास्तविक जिज्ञासा के साथ पूछे जाएं। यदि सचमुच जिज्ञासा है, तो आरोपों की सूची बढ़ाने के बजाय संघ की ओर कदम बढ़ाइए। यदि संघ को समझना है, तो उसके पास आइए, उसे निकट से देखिए और समझिए।
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