सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला : कन्वर्जन के साथ समाप्त होगा अनुसूचित जाति का दर्जा, नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ
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सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला : कन्वर्जन के साथ समाप्त होगा अनुसूचित जाति का दर्जा, नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध मत के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो धर्म परिवर्तन के उसी क्षण से उसका “अनुसूचित जाति” का संवैधानिक दर्जा समाप्त हो जाता है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jul 27, 2026, 06:56 pm IST
inभारत
supreme court

सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्‍ली। अनुसूचित जाति (एससी) के संवैधानिक दर्जे और धर्म परिवर्तन से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने 24 मार्च 2026 के ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि उसके पूर्व निर्णय में कोई ऐसी स्पष्ट त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसकी समीक्षा की जाए। इस निर्णय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध मत के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो धर्म परिवर्तन के उसी क्षण से उसका “अनुसूचित जाति” का संवैधानिक दर्जा समाप्त हो जाता है।

उल्‍लेखनीय है कि यह फैसला संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 की व्याख्या तथा आरक्षण एवं विशेष संवैधानिक अधिकारों की पात्रता के संदर्भ में दूरगामी महत्व रखता है।

पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 15 जुलाई को पारित आदेश में पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय ने 24 मार्च, 2026 के अपने निर्णय का पुनः परीक्षण किया, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं मिली, जिसके कारण फैसले की समीक्षा आवश्यक हो। अदालत ने पुनर्विचार याचिका पर मौखिक सुनवाई की मांग को भी अस्वीकार कर दिया। इस आदेश के साथ मार्च में दिया गया निर्णय पूरी तरह प्रभावी बना रहेगा।

क्या था 24 मार्च का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च, 2026 को दिए अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि अनुसूचित जाति समुदाय का कोई व्यक्ति यदि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है, तो जन्म चाहे किसी भी अनुसूचित जाति में हुआ हो, धर्म परिवर्तन के उसी क्षण से उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के खंड-3 में यह प्रतिबंध पूरी तरह स्पष्ट और अनिवार्य है तथा इसकी अलग व्याख्या की कोई गुंजाइश नहीं है।

आंध्र प्रदेश के मामले से शुरू हुआ विवाद

आपको बता दें कि यह पूरा विवाद आंध्र प्रदेश के एक मामले से जुड़ा था। शिकायतकर्ता का जन्म ‘अनुसूचित जाति’ परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में उसने ‘ईसाई धर्म’ अपना लिया और ‘पादरी’ के रूप में कार्य करने लगा। बाद में उसने आरोप लगाया कि उसे जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया गया और उसके विरुद्ध धमकी दी गई। इस आधार पर उसने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई।

आरोपित पक्ष ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि शिकायतकर्ता धर्म परिवर्तन कर चुका है, इसलिए वह अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े कानूनी संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए एफआईआर रद्द कर दी। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया।

संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के प्रावधानों का विस्तार से उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन व्यक्तियों को प्राप्त है, जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से संबंधित हैं। यदि कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है, तो वह संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं रहता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था न्यायालय द्वारा नहीं बनाई गई है, बल्कि संविधान के तहत जारी राष्ट्रपति आदेश में निहित है। इसलिए न्यायालय का दायित्व केवल संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करना है।

कन्वर्जन के साथ तत्काल समाप्त होगा एससी दर्जा

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा था कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के खंड-3 में लगाया गया प्रतिबंध पूर्ण और स्पष्ट है। इसलिए जैसे ही कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, उसी क्षण उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाता है। इस संबंध में जन्म से अनुसूचित जाति में होना भी संवैधानिक पात्रता बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

जनजातीय पहचान पर भी अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

फैसले में न्यायालय ने अनुसूचित जनजाति से संबंधित एक व्यापक संवैधानिक सिद्धांत का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद अपनी मूल जनजातीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह त्याग देता है तथा नए धर्म की परंपराओं को पूर्ण रूप से अपना लेता है, तो उसकी जनजातीय पहचान पर भी प्रश्न उठ सकता है। हालांकि ऐसी स्थिति में अंतिम निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय करेगा।

क्या दोबारा मिल सकता है अनुसूचित जाति का दर्जा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में लौटता है, तो विशेष परिस्थितियों में वह अनुसूचित जाति का दर्जा दोबारा प्राप्त करने का दावा कर सकता है, लेकिन इसके लिए केवल धर्म परिवर्तन पर्याप्त नहीं होगा।

न्यायालय के अनुसार, संबंधित व्यक्ति को यह सिद्ध करना होगा कि उसका जन्म मूल रूप से अनुसूचित जाति में हुआ था, उसने वास्तविक रूप से पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म स्वीकार किया है तथा पूर्व में अपनाए गए धर्म का पूर्ण त्याग कर दिया है। इसके अतिरिक्त यह भी साबित करना होगा कि उसके मूल जाति समुदाय ने उसे पुनः स्वीकार कर लिया है। यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती, तो अनुसूचित जाति का दर्जा पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।

संवैधानिक व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि न्यायालय ने इस पूरे विवाद को सामाजिक या धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि संविधान और राष्ट्रपति द्वारा जारी संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के प्रावधानों के आधार पर परखा है। पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अब यह कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो गई है कि अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है और धर्म परिवर्तन की स्थिति में उसकी पात्रता स्वतः प्रभावित होती है। यह फैसला भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

Topics: सुप्रीम कोर्टधर्म परिवर्तनअनुसूचित जाति का दर्जाआरक्षण का अधिकारकन्वर्जन एससी संविधान
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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