बहुआयामी वीर सावरकर (7) : व्यक्ति नहीं राष्ट्र की बात
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बहुआयामी वीर सावरकर (7) : व्यक्ति नहीं राष्ट्र की बात

सावरकर के लिए आत्मचरित्र आत्मप्रशंसा नहीं, बल्कि राष्ट्र के संघर्ष का इतिहास था। उनके चरित्र-साहित्य में व्यक्ति नहीं, स्वातंत्र्य की अखंड साधना और राष्ट्रीय चेतना का प्रखर स्वर बोलता है

Written byडॉ. नीरज देवडॉ. नीरज देव
Jul 24, 2026, 11:48 am IST
inभारत, संघ @100

बहुआयामी वीर सावरकर  (7वीं) कड़ी-

जीवनी अथवा चरित्र-लेखन ललितेतर साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है, जो इतिहास और कथा-साहित्य के मध्य सेतु का कार्य करती है। वीर सावरकर ने अनेक चरित्र तथा आत्मचरित्र लिखे और इस विधा के संबंध में अपनी स्पष्ट साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि प्रस्तुत की। आत्मचरित्र की भूमिका में उन्होंने व्यक्ति-चरित्र के तीन स्वरूप बताए हैं-व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक (राष्ट्रीय)।
उनके अनुसार अधिकांश व्यक्तियों का जीवन व्यक्तिगत स्वरूप का होता है। ऐसे चरित्र मुख्यतः व्यक्ति-विशेष तक सीमित रहते हैं और समाज पर उनका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। इनका महत्त्व मनोविज्ञान के अध्ययन तक सीमित रहता है।

दूसरा प्रकार पारिवारिक चरित्र का है, जिसका महत्त्व परिवार और वंश तक सीमित होता है तथा जो मानववंशशास्त्र एवं आनुवंशिकी के अध्ययन में उपयोगी सिद्ध होता है। तीसरा और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्वरूप सामाजिक अथवा राष्ट्रीय चरित्र का है। इसमें वे व्यक्तित्व आते हैं जो अपने युग का प्रतिनिधित्व करते हैं, समाज की दिशा बदलते हैं तथा आगामी पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करते हैं। सावरकर का मत था कि पराधीन भारत में ऐसे महापुरुषों के चरित्र लिखे जाने चाहिए, जो जनमानस में स्वातंत्र्य की आकांक्षा और राष्ट्रभक्ति का संचार करें। यही चरित्र-लेखन वास्तव में राष्ट्रोपयोगी है।

लेखन की बुद्धिनिष्ठ दृष्टि

‘संत-चरित्र कैसे पढ़ने चाहिए’ निबंध में सावरकर ने चरित्र-लेखन की ऐतिहासिक कसौटियां स्पष्ट की हैं। उनके अनुसार अधिकांश संत-चरित्र चमत्कारों, लोककथाओं और अनैतिहासिक प्रसंगों से युक्त हैं; इसलिए उन्हें बिना परीक्षण के इतिहास नहीं माना जा सकता। वे चरित्र की प्रामाणिकता के लिए तीन आधार स्वीकार करते हैं-देशी समकालीन स्रोत, विदेशी समकालीन प्रमाण तथा घटनाओं की आंतरिक संगति।

इसी संदर्भ में वे उदाहरण देते हैं कि यदि कोई कहे कि ‘चिमाजी अप्पा से छत्रपति शिवाजी महाराज मिलने आए थे’, तो कालभेद के कारण यह कथन तत्काल असत्य सिद्ध हो जाता है। किंतु संत-चरित्रों में ऐसी असंगतियां प्रायः अनदेखी कर दी जाती हैं। इस प्रकार सावरकर भावुक श्रद्धा के स्थान पर विवेकपूर्ण और इतिहाससम्मत दृष्टि अपनाने का आग्रह करते हैं।

सावरकर ने चरित्र-लेखन को राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी माध्यम बनाया। सन् 1906 में उन्होंने जोसेफ माझिनी के आत्मचरित्र का मराठी अनुवाद किया, जिसने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को नई वैचारिक दिशा प्रदान की। रत्नागिरी की स्थानबद्धता (1924–1937) के दौरान उन्होंने शचींद्रनाथ सान्याल, विष्णु गणेश पिंगले, श्रीराम राजू, रामप्रसाद बिस्मिल, पांडुरंग सदाशिव खानखोजे, वी. वी. एस. अय्यर तथा अशफाक उल्ला खां जैसे क्रांतिकारियों पर चरित्रात्मक लेख लिखे। इसके अतिरिक्त रामरखी, क्षीरोदवासिनी देवी तथा स्वातंत्र्यशाहिर गोविंद पर भी उनके लेख उपलब्ध हैं। चापेकर बंधुओं और भगत सिंह पर लिखी उनकी कविताएं भी वस्तुतः चरित्रप्रधान रचनाएं हैं।

चरित्र-लेखन का उद्देश्य

सावरकर के चरित्र-साहित्य का मूल उद्देश्य केवल ऐतिहासिक जानकारी देना नहीं था, बल्कि राष्ट्रचेतना का निर्माण करना था। उन्होंने उन्हीं व्यक्तित्वों का चयन किया, जिनका जीवन युवकों में त्याग, साहस, संगठन और स्वाधीनता की भावना जागृत कर सके। रामप्रसाद बिस्मिल, सान्याल, पिंगले, खानखोजे और अय्यर जैसे क्रांतिकारी राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पण की प्रेरणा देते हैं; वहीं रामरखी और क्षीरोदवासिनी देवी वीर पत्नी तथा वीर माता के आदर्श को प्रतिष्ठित करती हैं। जोसेफ माझिनी का चरित्र सशस्त्र क्रांतिकारी संगठन और राष्ट्रमुक्ति के सिद्धांतों का आदर्श प्रस्तुत करता है।

साहित्य और इतिहास-निर्माण

जोसेफ माझिनी पर सावरकर से पूर्व लाला लाजपत राय भी लिख चुके थे, किंतु उनका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार और संवैधानिक था। इसके विपरीत सावरकर ने माझिनी के जीवन से सशस्त्र क्रांति, संगठन और राष्ट्रीय अनुशासन की प्रेरणा ग्रहण करने पर बल दिया। यही कारण है कि उनकी अनूदित पुस्तक अभिनव भारत, फ्री इंडिया सोसायटी तथा अनेक क्रांतिकारी संगठनों की प्रेरणापुस्तक बनी। कान्हेरे, कर्वे और देशपांडे जैसे अनेक युवकों ने इसी से प्रेरणा प्राप्त की। वैलेंटाइन चिरोल ने इसे ‘राष्ट्रवाद की पाठ्यपुस्तक’ कहा था।

रत्नागिरी में रहते हुए भी सावरकर ने अनेक क्रांतिकारियों पर मृत्युलेख और चरित्र-लेख लिखे। यद्यपि इनके प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तथापि यह मानना असंगत नहीं होगा कि इन रचनाओं ने अनेक युवकों में स्वाधीनता और सशस्त्र क्रांति की भावना को सुदृढ़ किया। इस प्रकार सावरकर का चरित्र-साहित्य केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जागरण और इतिहास-निर्माण का सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ।

स्वातंत्र्याकांक्षा की सतत धारा

सावरकर ने आत्मचरित्र के रूप में पूर्वपीठिका, मेरे संस्मरण : भगूर, मेरे संस्मरण : नासिक, शत्रु के खेमे में (लंदन) तथा मेरा आजीवन कारावास-ये पांच खंड लिखे। इनमें उनके जन्म से लगभग पंद्रह-बीस वर्ष पूर्व की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि से लेकर सन् 1924 तक, अर्थात् उनके जीवन के लगभग इकतालीस वर्षों का वृत्तांत मिलता है। इसके बाद गांधी-हत्या प्रकरण में न्यायालय के समक्ष दिया गया उनका निवेदन उपलब्ध होता है, जिसमें 1937 से 1948 तक के जीवन की कुछ झलकियां मिलती हैं। किंतु स्वयं सावरकर के अनुसार न्यायालयीन मर्यादाओं से बंधा यह निवेदन आत्मचरित्र का विकल्प नहीं हो सकता।

इस दृष्टि से उनका वास्तविक आत्मचरित्र 1924 तक ही सीमित माना जाता है। उनकी आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति केवल गद्य तक सीमित नहीं है। गोमांतक उनके बाल्यकाल का रूपकात्मक एवं काव्यमय आत्मचित्र है। मेरा मृत्युपत्र, सांत्वन, प्रभाकरास, सप्तर्षि, मरणोन्मुख शय्येवर जैसी कविताएं तथा अंडमान से लिखे गए पत्र उनके जीवन-संघर्ष और अंतर्मन की सशक्त अभिव्यक्तियां हैं। इसी प्रकार आत्महत्या और आत्मार्पण शीर्षक लेख भी उनके आत्मचिंतन की अंतिम कड़ी माना जा सकता है।

विशेषताएं

सामान्यतः आत्मचरित्र लेखक के जन्म या वंश-वृत्त से आरंभ होते हैं, जबकि सावरकर का आत्मचरित्र उनके जन्म से लगभग तेईस वर्ष पूर्व, सन् 1860 से प्रारंभ होता है। इसमें रामसिंह कूका, आद्यक्रांतिवीर वासुदेव बलवंत फडके, स्वतंत्रता के प्रारंभिक प्रयास, कांग्रेस की स्थापना तथा तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का विवेचन है। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए व्यक्तिगत जीवन का इतिहास राष्ट्र के इतिहास से पृथक नहीं था।

आत्मचरित्र की पहली पंक्ति-‘मुझे मेरा जन्म हुआ था, इसकी मुझे बिल्कुल याद नहीं।’-पाठक को चमत्कृत करती है। यह सामान्य कथन नहीं, बल्कि लेखक की आत्मदर्शी दृष्टि का परिचायक है। इसी प्रकार संस्मरणों की भूमिका में विस्मृति-देवी का स्मरण भी प्रतीकात्मक है। यहां विस्मरण व्यक्तिगत अहं का है, जबकि स्मरण राष्ट्रीय कर्तव्य का। इस आत्मचरित्र की एक और विशिष्टता उसका समापन है। मेरा आजीवन कारावास के अंत में सावरकर लिखते हैं कि यदि यह कथा पढ़ते समय पाठक को ऊब का अनुभव हुआ हो, तो वही इसकी सार्थकता है; क्योंकि तभी वह समझ सकेगा कि वर्षों तक कारावास भोगने वाले भारतीय राजबंदियों की पीड़ा कितनी असह्य रही होगी। सामान्य लेखक पाठक का मनोरंजन चाहता है, किंतु सावरकर पाठक को पीड़ा का अनुभव कराना चाहते हैं। यही उनके लेखन की संवेदनात्मक शक्ति है।

लिखने का औचित्य

सावरकर उपयोगितावादी साहित्यकार थे। उनके लिए आत्मचरित्र आत्मप्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय इतिहास का दस्तावेज था। उनका मत था कि उनका जीवन राष्ट्रोपयोगी है, दो-तीन पीढ़ियों के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है और उनके अनेक सहकर्मियों के त्याग तथा बलिदान का साक्षी है। यदि इन घटनाओं का लेखा-जोखा न रखा जाए, तो इतिहास की अनेक महत्त्वपूर्ण स्मृतियां सदा के लिए लुप्त हो जाएंगी।

वे लिखते हैं कि ममत्वशून्य दृष्टि से अपने जीवन का मूल्यांकन करने पर उन्हें प्रतीत होता है कि उनकी स्मृतियां केवल उनके व्यक्तित्व तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें एक पूरे युग का जीवन प्रतिबिंबित होता है। वे अपने जीवन को आकस्मिक, संघर्षपूर्ण और मनोवेधक घटनाओं से निर्मित मानते हैं, जो साहित्य और इतिहास-दोनों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि उनका आत्मचरित्र आत्मप्रशंसा नहीं, बल्कि तटस्थ आत्ममूल्यांकन का उदाहरण बन जाता है।

राष्ट्रभक्तों के सुरक्षित संस्मरण

सावरकर के आत्मचरित्र की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें अनेक ऐसे राष्ट्रभक्तों के संस्मरण सुरक्षित हैं, जो अन्यथा इतिहास के अंधकार में खो जाते। बेहोशी में भी था देशभक्ति का होश : सोलह वर्षीय सावरकर के संपर्क से आयु में उनसे लगभग तीन गुना बड़े त्र्यंबकराव उपाख्य बापूराव म्हसकर सशस्त्र क्रांतिकारी बन गए। वे सावरकर के राष्ट्रभक्त मंडल के संस्थापक सदस्यों में थे। 1901 में नासिक में महामारी फैली। जनसेवा करते-करते स्वयं म्हसकर भी संक्रमित हो गए। अंतिम दिनों में उन्हें दौरे पड़ते थे, किंतु अचेतावस्था में भी वे अंग्रेजों से संघर्ष करने का अभिनय करते रहते। एक ऐसे ही दौरे के दौरान गिरकर उनका निधन हो गया। यह घटना दर्शाती है कि उनके अवचेतन में भी राष्ट्रभक्ति कितनी गहराई तक समाई हुई थी।

भारतीय ही नहीं, विश्व के क्रांतिकारी इतिहास में भी ऐसा उदाहरण विरल है। लंगड़े के बल पर राष्ट्रवीर दौड़ पड़े : स्वातंत्र्यशाहिर गोविंद बहुविकलांग थे। वे प्रारंभ में लोकनाट्यों के लिए लावणियां लिखते थे। किंतु बाल सावरकर के संपर्क ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उनका प्रसिद्ध गीत ‘रणाविण स्वातंत्र्य कोणा मिळाले?’ असंख्य युवकों के लिए क्रांति का उद्घोष बन गया। मदनलाल धींगरा, लाला हरदयाल, कर्वे और कान्हेरे जैसे अनेक क्रांतिकारी उनके गीतों से प्रेरित हुए। उल्लेखनीय है कि इस गीत के प्रकाशन के कारण बाबाराव सावरकर को आजीवन कारावास हुआ, जबकि गीतकार गोविंद को बहुविकलांगता ब्रिटिश शासन ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। सावरकर का आत्मचरित्र ऐसे उपेक्षित राष्ट्रकवि को इतिहास में उसका उचित स्थान प्रदान करता है।

स्वाधीनता का पर्याय

सावरकर के लिए पराधीन जीवन मृत्यु के समान था और स्वाधीनता के लिए मृत्यु भी जीवन का पर्याय। पचास वर्ष के कालापानी का दंड सुनकर भी उनका धैर्य इसलिए नहीं डिगा, क्योंकि उनकी दृष्टि में वास्तविक आजीवन कारावास उनकी व्यक्तिगत सजा नहीं, बल्कि भारत की पराधीनता थी। मेरा आजीवन कारावास के अंतिम शब्द इसी भाव को व्यक्त करते हैं कि उनका व्यक्तिगत कष्ट उस महाव्रत का एक छोटा-सा भाग था, जिसका लक्ष्य राष्ट्र की स्वतंत्रता था।

बहुआयामी वीर सावरकर (6) : राष्ट्रमंत्र के महाकवि

Topics: पाञ्चजन्य विशेषकालापानीराष्ट्रीय चेतनानागरिक कर्तव्यराष्ट्रीय चरित्रवीर सावरकरसशस्त्र क्रांतिराष्ट्र निर्माणअखंड साधनाराष्ट्रभक्तिअंडमानस्वातंत्र्य समरअशफाक उल्ला खांभगत सिंहबापूराव म्हसकररामप्रसाद बिस्मिलत्याग और साहस
डॉ. नीरज देव
डॉ. नीरज देव
(दशग्रंथी सावरकर इस पीएचडी समकक्ष उपाधि से तथा महाराष्ट्र शासन-विवेक व्यासपीठ द्वारा ‘सावरकर वीरता’ पुरस्कार से सन्मानित) [Read more]
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