यह श्लोक मूलतः बृहस्पतिस्मृति (और कई पुराणों) से उद्धृत है। इसमें भारतवर्ष की एक विशिष्ट भौगोलिक और आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित किया गया है।
आज का श्लोक-
”हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥” – (बृहस्पति आगम)
भावार्थ-
अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
आज की प्रासंगिकता: आज का भारत ‘विविधता में एकता’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह विचार सिखाता है कि विभिन्न राज्यों, बोलियों और परंपराओं के बावजूद, एक अखंड डोर हमें आपस में जोड़ती है। यह “वसुधैव कुटुंबकम्” (समस्त विश्व एक परिवार है) और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना का मूल आधार है।

















