यह श्लोक सनातन परंपरा के सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथों में से एक ‘विष्णु पुराण’ से लिया गया है। यह न केवल हमारे देश के नाम ‘भारत’ की सबसे सटीक भौगोलिक परिभाषा देता है, बल्कि एक साझा नागरिक पहचान भी तय करता है।
श्लोक-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम ‘भारती’ यस्य सन्ततिः॥
भावार्थ-
पृथ्वी का वह भू-भाग, जो समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है, ‘भारतवर्ष’ कहलाता है तथा जिसकी सन्तानें (हम) भारतीय हैं।
आज के प्रासंगिक-
- यह श्लोक इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि ‘भारत’ नाम कोई आधुनिक या राजनीतिक खोज नहीं है। हजारों साल पहले भी इस भू-भाग की एक स्पष्ट और सर्वमान्य पहचान ‘भारत’ के रूप में थी। यह श्लोक हमारे देश के नामकरण की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता को सिद्ध करता है।
- नागरिकों में अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य-बोध, आदर और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाता है। यह याद दिलाता है कि राष्ट्र की रक्षा और प्रगति की जिम्मेदारी उसकी संतानों (हम नागरिकों) पर ही है।
- प्राकृतिक सीमाओं का सम्मान और सुरक्षा-बोध – यह श्लोक भारत की प्राकृतिक सीमाओं—उत्तर में हिमालय (हिमाद्रि) और दक्षिण में महासागर (समुद्र)—को परिभाषित करता है। आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में, यह श्लोक देश की सीमाओं के महत्व को रेखांकित करता है। यह नागरिकों और नेतृत्व को अपनी सामरिक सीमाओं के प्रति सचेत रहने और देश की अखंडता की रक्षा करने की प्रेरणा देता है।

















