पाकिस्तान को अचानक सिंधु घाटी सभ्यता की याद क्यों आई? देखिए उसका पाखंड
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पाकिस्तान को अचानक सिंधु घाटी सभ्यता की याद क्यों आई? देखिए उसका पाखंड

सिंधु जल संकट के बाद पाकिस्तान को अचानक सिंधु घाटी सभ्यता की याद क्यों आई? मोहनजोदड़ो-हड़प्पा को नकारने वाला पाकिस्तान आज खुद को उसका वारिस बता रहा है। जानिए पाकिस्तान का यह पाखंड और हकीकत।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jul 3, 2026, 02:39 pm IST
inविश्व

भारत के द्वारा सिंधु नदी का पानी रोकने के बाद जल संकट से ग्रस्त पाकिस्तान को सिंधु घाटी सभ्यता की याद आने लगी है। पाकिस्तान अब अपने को सिंधु घाटी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर रहा है। सिंधु जल समझौते पर हुए इस्लामाबाद के सम्मेलन में दुनिया के प्रतिनिधियों के समक्ष पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि पाकिस्तान के लोग सिंधु घाटी सभ्यता के ही लोग हैं।

पाकिस्तान का दिखावा

हकीकत में जलसंकट से जूझ रहे पाकिस्तान का यह महज दिखावा है। सिंधु सभ्यता से अपनी जड़ें जोड़कर पाकिस्तान विश्व समुदाय की आँखों में धूल झोंकना चाह रहा है जैसा कि हमेशा करता रहा है। मोहम्मद अली जिन्ना, अयूब खान, जुल्फी अली कार भुट्टो, जनरल जियाउल हक, बेनज़ीर भुट्टो, परवेज मुशर्रफ, नवाज शरीफ, शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर तक ने किसी ने भी सिंधु घाटी की महान सभ्यता को कभी भी दिल से स्वीकार नहीं किया है।

इसका एकमात्र कारण सिंधु घाटी की सभ्यता का जुड़ाव प्राचीन हिंदू सनातनी संस्कृति और परम्परा से होना है। पाकिस्तान ऐसा बोलकर अपनी कट्टरपंथी छवि को तोड़कर विश्व समाज के समक्ष अपने को एक उदार और सहनशील देश साबित करना है। पाकिस्तान की हकीकत बहुत कड़वा है, जिसको विश्व समुदाय को जानना बहुत ही जरुरी है। पूरे विश्व समाज को जानकारी होना चाहिए कि पाकिस्तान अपने ही संस्कृति, भूगोल और अपने पुरखों के इतिहास से नफरत करता है। इसका भी एकमात्र कारण इसमें भारतीय संस्कृति और सनातन की छाप का होना है। जहाँ दुनिया के अन्य देश अपनी प्राचीन विरासत को ढूंढने के लिए हर स्तर पर पूरा प्रयास कर रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी दुनिया की सबसे विकसित और प्राचीन शहरी सभ्यता जैसे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और सिंधु घाटी सभ्यता के  गौरवशाली विरासत से दूरी बनाता रहा है।

सिंधु सभ्यता के इतिहास को धूमिल करता रहा है पाकिस्तान

1947 में अपनी स्थापना से वहां के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। पाकिस्तान इस इलाके को ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे 712 ईसवी से पहले इस इलाका सुनसान और बंजर था। पाकिस्तान के शिक्षाविदों और इतिहासकारों ने अपनी पाठ्य पुस्तक में बताया है कि मुहम्मद बिन कासिम द्वारा 712 ईस्वी में सिंध पर किए गए आक्रमण को पाकिस्तान की नींव और इस्लामी इतिहास के शुरुआत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली कुछ किताबों जैसे कि इश्तियाक हुसैन कुरैशी के  ‘पाकिस्तान का संक्षिप्त इतिहास’   में इस बात पर जोर दिया गया है कि आधुनिक पाकिस्तान की पहचान और राष्ट्रवाद का आधार इस्लामी संस्कृति है, जो अरब आक्रमणकारियों के साथ आई थी। इसी विचारधारा के तहत मुहम्मद बिन कासिम को अक्सर “पहला पाकिस्तानी” करार देने की बात सामने आती है। पाकिस्तान अपनी प्राचीन मिट्टी को गैर इस्लामिक कहकर नकार देता है। पाकिस्तान की सोच और व्यवहार में सिंधु घाटी सभ्यता को कोई भी झलक नहीं दिखती है।

पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम देते हैं इस्लामिक कट्टरता का प्रमाण

पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम को देखने से इसका प्रमाण मिलता है। पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों का नाम गौरी, गजनवी, अब्दाली और बाबर रखा है जो मध्य एशिया और अरब के क्रूर हमलावर थे। इन सब ने अलग-अलग समय काल में भारत पर बर्बर हमले किया और भारत और सिंधु घाटी सभ्यता की पवित्र जमीन को रौंदा, लूटा और तबाह किया था। गजनवी और गौरी ने तो लाहौर, मुल्तान और पेशावर के स्थानीय लोगों का ही कत्लेआम किया था।

जो आज के पाकिस्तान का प्रमुख शहर है। इन आक्रमणकारियों ने इनके पूर्वजों को तलवार की नोक पर अपना हिंदू धर्म बदलकर इस्लाम में बदलने को मजबूर किया था। जिन विदेशी लुटेरों ने पाकिस्तान की इसी सिंधु घाटी वाली मिट्टी के पुरखों को प्रताड़ित किया था आज का पाकिस्तानी समाज उसको अपनी रहनुमा मानता है। पाकिस्तान आज भी अपनी जड़ों से कटी हुई आत्मघाती मानसिकता में जी रहा है।

अपने भूगोल को नकारने वाला समाज समृद्ध नहीं हो सकता

कोई भी समाज अपनी संस्कृति और भूगोल को नकार कर अपनी पहचान बदलना चाहता है वो कभी भी स्थिर, प्रभावी या समृद्ध नहीं बन सकता हैं। आज पाकिस्तान अपनी बदली हुई पहचान का खामियाजा भुगत रहा है। धर्म, मजहब बदलने से किसी के पुरखे और धरती का इतिहास नहीं बदल जाता है। पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने वहां के समाज से इस सच को हमेशा छुपाया है। यह भी हक़ीकत है कि सच को ज्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकता है। पाकिस्तान के लोगों को अंत में यह मानना ही पड़ेगा कि उनकी असल पहचान अरब के हमलावरों में नहीं, बल्कि सिंधु घाटी सभ्यता, मोहनजोदड़ो और भारतीय सनातनी संस्कृति में निहित है।

पाकिस्तान अपने स्थापनाकाल से सबसे बड़ा परेशानी का सामना कर रहा है। पाकिस्तान के चारों राज्यों में बगावत का स्वर तेज होता जा रहा है। पाकिस्तान को यह समस्या पानी के लिए हो रहा है और पूरा देश बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। भारत द्वारा सिंधु जल समझौता स्थगित करने के कारण पाकिस्तान की प्रमुख नदियां सिंधु, झेलम और चेनाब सूखने लगा है। पाकिस्तान की आवाम जल संकट के कारण त्राहिमाम कर रहा है। पाकिस्तान दुनिया में गुहार लगा रहा है। इस समस्या की ओर पूरे विश्व का ध्यान आकृष्ट करने के लिए पाकिस्तान सरकार ने इस्लामाबाद में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन करके न केवल अपना दुखड़ा रोया रोने के अलावा पाकिस्तान के नेताओं और मंत्रियों ने भारत और दुनिया को विश्व युद्ध की धमकी दी है। इस्लामी पहचान पर गर्व करने वाला पाकिस्तान स्वयं को सिंधु घाटी सभ्यता का असली वारिस बता रहा है।

इंडोनेशिया सीखे पाकिस्तान

पाकिस्तान को इंडोनेशिया से सीखनी चाहिए। इंडोनेशिया विश्व में सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। इंडोनेशिया की संस्कृति और परंपराओं में सनातन धर्म की गहरी छाप झलकती है। इंडोनेशिया के बाली द्वीप में 80% से अधिक आबादी हिंदू धर्म का पालन करती है। यहाँ स्थानीय मान्यताओं और प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक अनूठा मिश्रण है। इंडोनेशिया में हिंदू परंपराओं और संस्कृति का गहरा मिश्रण है। इंडोनेशिया में बाली के हिंदू धर्म पुनर्जन्म और मोक्ष के हिंदू सिद्धांतों पर आधारित है, लेकिन इसे स्थानीय मान्यताओं (जैसे पूर्वजों की पूजा और आत्माओं) के साथ मिला दिया गया है। यहां के सर्वोच्च ईश्वर को संग हयांग विधी वासा कहा जाता है।

इंडोनेशिया में मंदिर और सनातनी वास्तुकला की भरमार है। इंडोनेशिया में हजारों मंदिर हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पुरा’  कहा जाता है। उदाहरणार्थ जावा का प्रम्बानन मंदिर परिसर दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक है। इंडोनेशिया में महाभारत और रामायण का प्रभाव विधमान है। महाकाव्य रामायण और महाभारत इंडोनेशियाई कला और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। यहाँ कि कठपुतली कला और शास्त्रीय नृत्य नाटिकाओं में इन महाकाव्यों की कहानियों का सजीव मंचन किया जाता है। इंडोनेशिया में राष्ट्रीय आदर्श वाक्य “भिनेका तुंग्गल इका” है जिसका अर्थ ‘अनेकता में एकता’ है। यह वाक्य प्राचीन जावानी कविता ‘सुतसोम’ से लिया गया है। यह पूर्णतः सनातेंइ परम्परा का अंग है। इंडोनेशिया के बाली में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में न्येपी, गलुंगन और कुनिंगन हैं, जो बुराई पर अच्छाई की जीत और आत्मा की शुद्धता का प्रतीक हैं। यह भी पूरी तरह से सनातनी परंपरा को रेखांकित करता हैं।

Topics: पाकिस्तानसिंधु घाटी सभ्यतापाकिस्तान जल संकटपाकिस्तान सिंधु घाटी सभ्यतापाकिस्तान सिंधु सभ्यता दावा
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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