सेंगोल के शिल्पकार वुम्मिडी एथिराज का 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उन्होंने इसे भेंट किया था। इसके बाद यह संग्रहालय की वस्तु बन गया। लेकिन, वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से इसे नई संसद में स्थापित किया गया।
सेंगोल भारत का सांस्कृतिक प्रतीक है। ब्रह्माजी के समान तेजस्वी यह दण्ड सबको मर्यादा के भीतर रखता है। यह कालरूप दण्ड सृष्टि के आदि में, मध्य में और अन्त में भी जागता रहता है। यह सर्व-लोकेश्वर महादेव का स्वरूप है। यही समस्त प्रजाओं का पालक है। सेंगोल राजा और धर्म के बीच संवाद का प्रतीक है।
बताया जाता है कि ऐतिहासिक दृष्टि से सेंगोल का प्रयोग चोल राजाओं के समय हुआ। चोल राज्य प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था। सेंगोल बताता है कि दुनिया गोल है और आखिरकार वहीं लौटती है जहां उसे लौटना चाहिये था। यह भी बताता है कि सत्ता का चक्र परिवर्तनशील है। महाभारत के शांतिपर्व के राजधर्मानुशासनपर्व में सबसे पहले शिव इसे विष्णु को देते हैं।
महाभारत के शांतिपर्व के राजधमार्नुशासनपर्व में सबसे पहले शिव इसे विष्णु को देते हैं। भगवान् विष्णु ने उसे महर्षि अंगिरा को दे दिया। अंगिरा ने इन्द्र और मरीचि को दिया और मरीचि ने महर्षि भृगु को सौंप दिया। भृगु ने वह धर्मसमाहित दण्ड ऋषियों को दिया। ऋषियों ने लोकपालों को, लोकपालों ने क्षुप को, क्षुप ने सूर्यपुत्र मनु (श्राद्धदेव) को और श्राद्धदेव ने सूक्ष्म धर्म तथा अर्थ की रक्षा के लिए उसे अपने पुत्रों को सौंप दिया।
राजधर्म को अनुशासन में रखने के लिए है दंड
इस प्रजातंत्र के लिए यह बात कितनी प्रेरक है कि- प्रजा जागर्ति लोकेऽस्मिन दण्डो जागर्ति तासु च। सर्वं संक्षिपते दण्ड: पितामहसमप्रभ:॥ कि इस लोक में प्रजा जागती है और प्रजाओं में दण्ड जागता है। वह ब्रह्माजी के समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादा के भीतर रखता है। यह दंड राजधर्म को अनुशासन में रखने के लिए है। इसलिए पर्व का नाम राजधर्मानुशासन है। यहां दंडशक्ति प्रजा के पास भी है। प्रजा की जागरूकता ही लोकतंत्र का मूल्य है।
लोक में प्रजा जागती है और प्रजाओं में दंड
तिरुक्कुरल में सेनकोनमाई अध्याय में इस सेंगोल को कवि तिरुवल्लुवर ने विज्ञान और धार्मिकता, वेदों और उसमें वर्णित गुणों का आधार कहा है। इस प्रजातंत्र के लिए यह बात कितनी प्रेरक है कि- प्रजा जागर्ति लोकेऽस्मिन् दण्डो जागर्ति तासु च। सर्वं संक्षिपते दण्ड: पितामहसमप्रभ:॥ कि इस लोक में प्रजा जागती है और प्रजाओं में दण्ड जागता है। वह ब्रह्माजी के समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादा के भीतर रखता है।
राजा एवं धर्म के संवाद का प्रतीक
सेंगोल राजा और धर्म के बीच संवाद का प्रतीक है। सेंगोल में सबसे ऊपर एक वृषभ है। कामायनी के आनंद सर्ग में जयशंकर प्रसाद जी ने वृषभ को धर्म का प्रतिनिधि कहा था तो वह उसी शास्त्रीय दृष्टि की आधारभूमि से कहा था। शिवपुराण वृषभ को एक जननेता बताता है, चौंसठ करोड़ का। यानी गणतंत्र का प्रतीक है, बौद्धधर्म में वृषभ सबसे बड़े क्रिया तंत्रों में माना जाता है। संस्कृत में वृषभ अपनी कक्षा का सर्वश्रेष्ठ या प्रतिष्ठित कुछ हो – नरवृषभ, द्विजवृषभ आदि कहलाता है, यानी वृषभ सर्वोत्कृष्टता का प्रतीक है। शक्ति और स्थायित्व का प्रतीक तो वह है ही, सेंगोल का मंगलवृषभ कल्याणमूलक है, स्वस्तिमूलक है। किसी ने वृषभ के बारे में यह भी कहा कि
वाहनं पशुनाथस्य कृषकस्य प्रिय: सखा।
निष्कामकर्मयोगी सः क्षेत्रं कर्षति आजन्म॥
जो भगवान शिव (पशुनाथ) का वाहन है, जो किसानों का सबसे प्रिय मित्र है, और जो बिना किसी फल की लालसा के एक सच्चे कर्मयोगी की तरह जीवनभर खेतों को जोतता (परिश्रम करता) रहता है-वह वृषभ है।
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