पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (पीओजेके) में पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारी मुख्यत: पीओजेके विधानसभा में कथित कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, जो पीओके में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में बसे हैं। उन्हें आरक्षित सीटों पर मतदान और विधानसभा में प्रतिनिधित्व देना स्थानीय जनादेश को विकृत करता है और क्षेत्र की डेमोग्राफी को भी बदल सकता है।
इन सीटों पर पीओजेके के नागरिक चुनाव नहीं लड़ सकते। अपने ही घर में उनके साथ भेदभाव होता है। प्रतिक्रिया में पाकिस्तान सरकार ने दमनचक्र तेज कर दिया। प्रदर्शनों में लगभग 100 लोग मारे गए और पाकिस्तान सरकार ने प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रही ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएएसी) को आतंकी संगठन घोषित कर उस पर पाबंदी और संचार सेवाओं पर रोक लगा दी। जेएएएसी के चुनाव बहिष्कार की अपील और जनता के कड़े विरोध के बावजूद विधानसभा चुनाव कराए गए और पीएमएल(एन) को बहुमत मिला।
पाकिस्तान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पूंछ और रावलकोट से शुरू हुए थे। दरअसल, 1960 के दशक में जब मांगला बांध बना तो बड़ी संख्या में पूंछ से विस्थापित लोगों को इंग्लैंड में शरण दी गई। पाकिस्तान ने वर्षों तक उनका उपयोग कश्मीर मुद्दे पर भारत विरोधी प्रचार के लिए किया। जब पूंछ के लोग अपने अधिकार मांग रहे हैं तो रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ कहते हैं कि वे कश्मीरी नहीं हैं। उन्हें हिंदुस्तानी और पाकिस्तान का दुश्मन तक कहा।
सवालों के घेरे में शरणार्थी सीटें
पीओजेके विधानसभा की 53 सीटों में से 45 सीटों पर ही प्रत्यक्ष चुनाव होते हैं। इनमें 33 स्थानीय, 12 ‘कश्मीरी शरणार्थियों’ (कुल सीटों का लगभग 25%) के लिए और 8 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें 5 महिलाओं तथा एक-एक उलमा, तकनीकविद् और विदेश में बसे पीओजेके निवासियों के लिए है। शरणार्थी सीटें पूरे पाकिस्तान में बिखरी हुई हैं और उनमें मतदाताओं की संख्या बहुत कम है। इन चुनावी हलकों के बेहद छोटे होने का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले महीने हुए चुनाव में यहां डाले गए कुल मतों की संख्या महज 1,839 (क्षेत्र एल-39) से 4,271 (क्षेत्र एल-45) के बीच रही। बड़ा क्षेत्रफल और कम मतदाता होने से पाकिस्तान की केंद्रीय या प्रदेश की सरकारों के लिए चुनाव परिणाम में हेर-फेर करना आसान होता है।
यही कारण है की अधिकतर शरणार्थी सीटें सत्ताधारी पार्टी के खाते में जाती है। 8 आरक्षित सीटों का चुनाव विधानसभा में होता है, जिसमें से अधिकांश सीटें उस पार्टी के खाते में जाती हैं, जो प्रथम दो श्रेणियों में बहुमत जुटा लेती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। चुनाव तीन चरणों में हुए, लेकिन दूसरे चरण के बाद ही नतीजा स्पष्ट हो गया। पीएमएल(एन) ने 45 में से 25 सीटें जीतीं। उसे 12 में से 10 शरणार्थी सीटें, जबकि पीपीपी को दो सीटें मिलीं। इसके बाद आरक्षित 8 में से 6 सीटें पीएमएल(एन) और 2 सीटें पीपीपी ने जीती। एक सीट जीतने वाली जमात-ए-इस्लामी के समर्थन के बाद पीएमएल(एन) के सीटों की संख्या 32 हो गई, जबकि पीपीपी की 14। शेष 7 प्रत्यक्ष सीटों पर चुनाव बाकी है। ये सीटें सुधनोटी और पूंछ में हैं, जहां सबसे अधिक विरोध प्रदर्शन हुए।
इसी तरह 2021 में जब पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार थी, तब उनकी पार्टी पीटीआई को 25 सीटें मिली थीं। इनमें 12 शरणार्थी सीटों में से 11 सीटें शामिल थीं। पीएमएल(एन) को 6 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या शरणार्थी सीटें बार-बार सत्ताधारी पार्टी को मिलना केवल संयोग है? वास्तव में पाकिस्तान ने पीओजेके की ‘शरणार्थी सीटों’ को वहां की सरकार पर नियंत्रण बनाए रखने का एक प्रभावी साधन बना लिया है। इसलिए वहां प्रायः वही दल सरकार बनाता है जो इस्लामाबाद में सत्ता में होता है।
2013 में नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के बाद पीओजेके में पीएमएल(एन) और 2018 में इमरान खान के सत्ता में आने पर पीटीआई की सरकार बनी। 2022 में जब इमरान की सरकार अविश्वास प्रस्ताव से गिरी, तो उनके द्वारा मनोनीत पीओजेके प्रधानमंत्री अब्दुल कय्यूम नियाजी को भी अपनी ही पार्टी पीटीआई के 25 विधायकों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इस तरह बीते चार वर्ष में पीओजेके में चार प्रधानमंत्री बने-अब्दुल कय्यूम नियाजी, सरदार तनवीर इल्यास, चौधरी अनवरुल हक और फैसल मुमताज राठौर।
संविधान की दीवार
प्रदर्शनकारियों की 12 शरणार्थी सीटें समाप्त करने की मांग पर जून 2026 में पीओजेके सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के संदर्भ पर सरकार के पक्ष में राय दी। अदालत ने कहा कि ये सीटें अंतरिम संविधान का हिस्सा हैं। इन्हें किसी प्रशासनिक आदेश, राजनीतिक समझौते, विरोध-प्रदर्शन या जन-दबाव के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी है। पर सवाल यह है कि क्या ऐसी विधानसभा और सरकार, जिनकी स्वायत्तता स्वयं सीमित है, पाकिस्तान के निहित राजनीतिक हितों के विरुद्ध जाकर यह संशोधन कर सकती है? वह भी तब जब अंतरिम संविधान की संशोधन-व्यवस्था में कुछ मूल प्रावधानों के लिए पाकिस्तान सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। ऐसे में कोई कठपुतली सरकार के लिए क्या संविधान में संशोधन संभव है? क्या पाकिस्तान अपना अधिकार कम करने की अनुमति देगा?
पीओजेके का अंतरिम संविधान 1974 में लागू हुआ। जिस कानून के जरिये यह संविधान लाया गया, वह पाकिस्तान के हितों की रक्षा के लिए बना था। इस एक्ट की धारा 31 के तहत कश्मीर काउंसिल व्यापक विधायी और प्रशासनिक अधिकार दिए गए, जिसकी अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते थे। 2018 के 13वें संविधान संशोधन में काउंसिल को दरकिनार कर महत्वपूर्ण विधायी शक्तियां पाकिस्तान सरकार ने अपने पास रख लीं। यानी पीओके न तो ‘आजाद’ है, और न ही उसके पास स्वायत्तता है। तो सत्ता की चाबी कहां है?
नई सरकार
2026 का घटनाक्रम इस प्रश्न को और बल देता है। नई सरकार के गठन के लिए नवाज शरीफ की अध्यक्षता में मरी में पीएमएल(एन) नेताओं की बैठक हुई, जिसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, मरयम और हमजा शरीफ शामिल थे। इसमें गुलाम मोहम्मद कादरी को पीओजेके का प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया। लेकिन 3-4 दिन बाद ही बैरिस्टर इफ्तिखार गिलानी को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया। प्रश्न है आखिर क्यों पार्टी नेतृत्व को अपना फैसला बदलना पड़ा? वास्तव में पीओजेके के प्रधानमंत्री का चुनाव विधानसभा या पार्टी नेतृत्व नहीं, बल्कि रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना मुख्यालय तय करता है। गिलानी हाल के चुनाव में मुजफ्फराबाद सीट से हारे थे, लेकिन आरक्षित सीट से विधानसभा में पहुंचे और फिर प्रधानमंत्री बने। यह पीओजेके राजनीति में ‘पीछे के दरवाजे’ से सत्ता में आने का उदाहरण है।
पाकिस्तान के अंतरिम संविधान के तहत कोई व्यक्ति या पार्टी पाकिस्तान में पीओजेके विलय का विरोध नहीं कर सकता। उनके पास न तो स्वतंत्रता है और न ही भारत में विलय का विकल्प। अमानुल्लाह खान और यासीन मलिक की पार्टी जेकेएलएफ ने 90 के दशक में आजादी के नाम पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैलाया। उस जेकेएलएफ को भी पीओके में चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह ‘स्वतंत्रता’ की मांग करती है। पीओजेके में क्षेत्रीय दल हाशिये पर धकेल दिए गए हैं और सत्ता पर हमेशा पाकिस्तान की प्रमुख पार्टियां-पीपीपी, पीएमएल(एन) या पीटीआई का कब्जा रहा है। 2021 के चुनाव में क्षेत्रीय दल को 2 सीटें मिली थीं, जबकि इस बार एक भी नहीं।
कुल मिलाकर पाकिस्तान में ‘कश्मीरियत’ के लिए कोई स्थान नहीं है। यही पीओजेके का सबसे बड़ा विरोधाभास है। जिसे पाकिस्तान ‘आजाद’ कहता है, वहां सत्ता की संवैधानिक सीमाएं पाकिस्तान तय करता है, राजनीतिक विकल्पों पर कानूनी शर्तें लगी हैं और असहमति के आंदोलन को सुरक्षा के चश्मे से देखा जाता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि पीओजेके में चुनाव हुए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या उस व्यवस्था को वास्तविक लोकतंत्र कहा जा सकता है, जिसमें जनता के सामने अपने भविष्य के विकल्पों की राजनीतिक सीमा पहले ही तय कर दी गई हो?

















