एक तरफ जहां वैश्विक उथल-पुथल, युद्ध, आपूर्ति शृंखलाओं में बाधाओं और तेल-गैस की बढ़ती कीमतों के कारण पूरी दुनिया में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ रही है, मुद्रास्फीति बढ़ रही है और सरकारी ऋणों का बोझ भी बढ़ रहा है, वहीं भारत की जीडीपी वृद्धि दर (सकल घरेलू उत्पाद) लगातार बढ़ रही है। हालांकि भारत में सरकार से बैर रखने वाले कुछ अर्थशास्त्री और पूर्व अफसर, भले ही देश में आर्थिक वृद्धि को कमतर आंकनें की कोशिश कर रहे हैं, देश में बढ़ती जीडीपी ही नहीं, बल्कि निवेश के बेहतर माहौल पर भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों बार बार भरोसा जता रही हैं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है की क्या ये एजेंसियों भारत की स्थिति का सही आकलन कर रही हैं, या सरकार विरोधी अर्थशास्त्री और पूर्व अधिकारी, सरकार से बाहर रखने की अपनी कुंठा के कारण भारत की अर्थिक वृद्धि पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।
समान आकलन
13 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ के जुलाई माह में दिए अपने ही पूर्वानुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ा कर 7 प्रतिशत कर दिया है। आईएमएफ ने कहा है कि यह अर्थव्यवस्था में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन, मजबूत घरेलू मांग और सेवा गतिविधियों में जबरदस्त प्रदर्शन के कारण संभव हुआ है। यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए दिए गए आपने पूर्वानुमान 7.1 प्रतिशत के एकदम एक करीब है।
वर्ष 2027-28 के लिए भी आईएमएफ ने अपने पूर्वानुमान को पहले से बेहतर होते हुए 7 प्रतिशत बताया है। हाल ही में बिजनेस स्वीडन और स्वीडिश चैम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित ग्लोबल बिजनेस क्लाइमेट सर्वे में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विनिर्माण एवं दीर्घकालिक निवेश के गंतव्य के रूप में भारत अपनी भूमिका को बढ़ा रहा है। सर्वे में तीन मुख्य बातें कहीं गई हैं।
भारत व्यवसायिक माहौल के रूप में वैश्विक स्तर पर पहले स्थान पर पहुंच गया है। पिछले कई सालों से भारत इस संदर्भ में पहले तीन स्थानों पर बना हुआ था। दूसरे, भारत में निवेश करने वालों का भरोसा बढ़ रहा है। भारत में कार्यरत 73 प्रतिशत स्वीडिश और अन्य विदेशी कंपनियां भारत के कारोबारी माहौल को सकारात्मक मानती हैं। उन्हें उम्मीद है कि उनका कारोबार तेजी से बढ़ेगा और आय में भी वृद्धि होगी।
सर्वेक्षण की तीसरी प्रमुख बात यह है कि भारत की बेहतर होती रैंकिंग के पीछे मजबूत घरेलू खपत, डिजिटल बुनियादी ढांचे में तेज प्रगति और वैश्विक मूल्य शृंखला में प्रतिस्पर्धी भागीदारी की अहम भूमिका है। इन सभी क्षेत्रों में सरकार की नीतियां सहयोग कर रही हैं। उम्मीद की जा रही है कि यह शीर्ष रैंकिंग निवेश बढ़ाने, द्विपक्षीय व्यापार साझेदारी को मजबूत करने और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करेगी। अब देखते हैं कि अर्थव्यवस्था के वे कौन से क्षेत्र हैं, जो व्यवसाय में सकारात्मक माहौल बना रहे हैं।
पहला क्षेत्र विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला का स्थानीयकरण है। दुनिया की कंपनियां और देश भारत को केवल अपने सामान के बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहे हैं। दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में विनिर्माण बढ़ाकर उसे वैश्विक और घरेलू मूल्य शृंखलाओं का हिस्सा बना रही हैं। स्वीडिश चैंबर ऑफ कॉमर्स का कहना है कि लागत के मामले में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और आपूर्ति शृंखला के स्थानीयकरण के चलते भारत में विनिर्माण की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र विनिर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा का है। विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में सतत विकास की पहल में भूमिका निभा रही हैं। बड़ी संख्या में कंपनियां अपने स्थानीय कार्यों में 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का है। भारत में बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण, एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई), क्लाउड एकीकरण और प्रौद्योगिकी आधारित माल ढुलाई जैसी व्यवस्थाओं ने कामकाज को आसान बनाया है। जनसंख्यायकीय लाभ और दूसरी ओर युवाओं की बढ़ती आय के कारण उपभोग में लगातार उठाव आ रहा है। इसके कारण उपभोक्ता वस्तुओं, ऑटोमोबाइल आदि की मांग बढ़ने के साथ साथ रिटेल सेक्टर में भी वृद्धि देखने को मिल रही है।
भारत को मिली ‘ए’ रेटिंग
ग्लोबल बिजनेस क्लाइमेट सर्वे पहला अवसर नहीं है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था और कारोबारी माहौल की तारीफ हो रही है। कुछ सप्ताह पहले जापानी साख निर्धारण एजेंसी ‘जेसीआर’ ने भारत की संप्रभु साख रेटिंग को बीबीबी (+) से बढ़ाकर ए (-) कर दिया। एजेंसी के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक परिदृश्य स्थिर है। किसी वैश्विक साख निर्धारण एजेंसी ने 35 वर्षों में पहली बार भारत को इस श्रेणी में रखा है। हालांकि, अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारत की रेटिंग का आकलन अभी बाकी है, लेकिन ‘जेसीआर’ द्वारा भारत की रेटिंग में सुधार का खासा महत्व है। रेटिंग में सुधार से वैश्विक स्तर पर भारत में निवेश का माहौल सकारात्मक बनता है और कंपनियों के लिए ऋण लेना सस्ता और आसान हो जाता है।
जापानी एजेंसी जेसीआर ने भारत की संप्रभु साख रेटिंग बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दी है। यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और सकारात्मक संभावनाओं की ओर संकेत करता है। पहला, भारत की लगातार ऊंची जीडीपी वृद्धि दर ने एजेंसी को प्रभावित किया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत आंकी गई। पिछले कई वर्षों से यह दर 7 प्रतिशत या उससे अधिक बनी हुई है, जो इस रेटिंग श्रेणी के अन्य देशों की तुलना में काफी ऊंची है।
दूसरा, भारत के बुनियादी ढांचे में लगातार हो रहा भारी निवेश भविष्य में उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि बढ़ाने की नींव रख रहा है। यानी जापानी एजेंसी जेसीआर भारत की मौजूदा आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं को भी महत्व दे रही है।
तीसरा, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण और सरकारी खर्च में पारदर्शिता जैसे संरचनात्मक सुधार भारत को अन्य देशों से अलग पहचान देते हैं। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचाने और पारदर्शिता बढ़ाने में भूमिका निभाई है। चौथा, भारत की बैंकिंग व्यवस्था में हुए सुधार भी महत्वपूर्ण हैं। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का स्तर 2 प्रतिशत से नीचे आना, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के माध्यम से ऋण वसूली की प्रक्रिया को मजबूत करना और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वाणिज्यिक बैंकों की सख्त निगरानी करना ऐसे कदम हैं, जिन्होंने बैंकिंग व्यवस्था की स्थिति सुधारने में योगदान दिया है। इन पहलुओं को जेसीआर ने महत्व दिया है।
जेसीआर द्वारा भारत की संप्रभु साख रेटिंग में सुधार से वैश्विक बाजार में यह संकेत गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है। बेहतर रेटिंग से देश के जोखिम का आकलन अनुकूल हो सकता है। इससे सरकार, बैंकों और भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों से कर्ज जुटाने की लागत घटने की संभावना बढ़ती है। इसका लाभ केवल पोर्टफोलियो निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करने में भी मिल सकता है। विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ने के साथ भारत की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।
एजेंसियों का पक्षपात
हालांकि, भारत सरकार और उससे जुड़े संस्थान ‘जेसीआर’ द्वारा रेटिंग में सुधार का श्रेय भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दे रहे हैं, लेकिन यह भी सही है कि अब तक भारत के प्रति अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण एजेंसियों का रवैया कुछ पक्षपातपूर्ण रहा है। गौरतलब है कि भारत लंबे समय से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
भारत ने आज तक अपने ऋणों पर ब्याज या मूलधन चुकाने में कभी कोताही नहीं की है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरंतर प्रगति करते हुए भारत रक्षा, दूरसंचार, अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे सहित अनेक क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। कुछ समय पहले भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन गया। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र भी पुरानी समस्याओं से उबरकर आगे बढ़ रहा है, जहां ऋण वृद्धि दर 20 प्रतिशत से भी अधिक बनी हुई है। मार्च 2026 तक भारतीय बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) घटकर मात्र 1.73 प्रतिशत रह गई थीं।
इसके बावजूद मूडीज, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और फिच जैसी वैश्विक साख निर्धारण एजेंसियों ने भारत की साख रेटिंग में मामूली सुधार ही किया है। अभी भी मूडीज ने भारत की रेटिंग बीएए 3 (स्थिर), स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने बीबीबी (स्थिर) और फिच ने बीबीबी- (स्थिर) रखी हुई है। पश्चिमी देशों के सुझावों और दबावों के अनुरूप आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के बावजूद भारत की रेटिंग में लंबे समय तक कोई उल्लेखनीय सुधार देखने को नहीं मिला।
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कारण मूडीज ने भारतीय बैंकों के परिदृश्य को स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया था। इससे शेयर बाजारों में उथल-पुथल मच गई थी। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अमेरिकी बैंकों में वित्तीय संकट के बावजूद इन एजेंसियों ने पर्याप्त जानकारी होने के बाद भी दुनिया को इस बात का अंदाजा नहीं लगने दिया कि उनके निवेश गंभीर संकट में हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कोरोना महामारी के दौरान इन साख निर्धारण एजेंसियों ने दुनिया भर की वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी थी, लेकिन अपनी ग्राहक कंपनियों की रेटिंग ऊंची बनाए रखी थी। फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, वर्ष 2015 में स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने स्वयं स्वीकार किया था कि वह कारोबार हासिल करने के लिए अपनी ग्राहक कंपनियों की रेटिंग ऊंची रखता है। ऐसे में इन कंपनियों की रेटिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पिछले कई वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है। पिछले पांच वर्षों में बुनियादी ढांचे पर 52 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र संकटों से उबरकर निरंतर प्रगति कर रहा है। वैश्विक युद्धों, आपूर्ति शृंखला में बाधाओं और दूसरे देशों द्वारा मुद्रा, मूल्य शृंखला तथा भुगतान प्रणालियों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के बावजूद पिछले पांच वर्षों में भारत की जीडीपी औसतन 8 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ी है। इसके साथ ही देश में गरीबी और बहुआयामी गरीबी में भी तेजी से कमी आई है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण एजेंसियों के आकलन में इन उपलब्धियों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता।
शायद यही कारण है कि इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि भारत की अपनी साख निर्धारण एजेंसी होनी चाहिए, जो दुनिया की प्रमुख एजेंसियों के समकक्ष खड़ी हो सके।
भारतवंशियों ने दरकिनार की रेटिंग
एक ओर जहां वैश्विक साख निर्धारण एजेंसियां भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति को अनदेखा करते हुए उसकी साख रेटिंग कमतर आंकती रही हैं, वहीं विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने अपने व्यवहार से इस आकलन को चुनौती दी है। वैश्विक एजेंसियां जहां भारतीय अर्थव्यवस्था को बीबीबी श्रेणी की रेटिंग दे रही हैं, जिसे अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण माना जाता है, वहीं भारतवंशियों ने 8 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच तीन महीने से भी कम समय में 127 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमाओं के रूप में भारत भेजी।
जानकारों का मानना है कि इसके पीछे भारत के केंद्रीय बैंक और वाणिज्यिक बैंकों के प्रति भारतवंशियों का भरोसा है। उन्हें विश्वास है कि भारतीय बैंकों में उनकी जमाएं सुरक्षित हैं और उन्हें ब्याज तथा मूलधन के भुगतान में किसी तरह का खतरा नहीं है। यह सही है कि इस बार भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों को रुपये के अवमूल्यन के जोखिम से सुरक्षा देने और इसके कारण जमाकर्ताओं को अधिक ब्याज दर देने की व्यवस्था भी जमाओं में हुई अभूतपूर्व वृद्धि का एक प्रमुख कारण रही। लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि साख निर्धारण एजेंसियों की रेटिंग भारतवंशियों के भारत और भारतीय बैंकों के प्रति विश्वास को कमजोर नहीं कर पाई।

















