इन दिनों यूरोप भयंकर गर्मी से जूझ रहा है। हजारों लोगों की मौतें हो गई हैं। कई तरह के उपाय हो रहे हैं और उनमें सामूहिक रूप से पानी में बैठना, बाहर रहना, आदि। यह प्राकृतिक आपदा है और कहीं भी आ सकती है। परंतु अब एक दृश्य की कल्पना करते हैं कि बेहद गर्मी है और सड़कें पिघल रही हैं और ट्राम के रास्ते भी पिघल रहे हैं, स्ट्रीट लाइट्स पिघल रही हैं, भयानक गर्मी है और घर पर एसी या पंखा कुछ नहीं है। कुल मिलाकर स्थिति असहनीय है। यही यदि भारत में हो रहा होता तो मीडिया क्या लिखता, यही न कि ‘व्यवस्था हुई फेल, नागरिक कर रहे हाहाकार’!
पश्चिम का मीडिया इसको लेकर तमाम तस्वीरें छापता, बड़े-बड़े लेख आते, बहसें भी होतीं, कुल मिलाकर यह स्थापित किया जाता कि भारत एक पिछड़ा देश है, जहां आपदाओं से लड़ने के लिए संसाधन नहीं है! मगर रुकें जरा! यदि यह सब यूरोप में हो रहा हो? यदि यह सब उसी मीडिया के गढ़ में हो रहा हो, जहां की श्रेष्ठता के घमंड के तले वह भारत को नीचा दिखाने का प्रयास करता है, तो तमाम अव्यवस्थाओं को छिपाया जाएगा। मुख्य फोकस आपदा पर होगा। यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। पेरिस में 1300 से ज्यादा मौतें हो गई हैं। ये सब गर्मी के कारण हो रहा है। क्या आप विश्वास करेंगे कि वहां पटरियां मुड़ गई हैं, सड़कें और ट्रैफिक लाइट्स पिघल गई हैं।
घरों की गलत बनावट
यूरोप के घरों की बनावट इस प्रकार से है कि गर्मी को अवशोषित कर लेते हैं, इसलिए इस भीषण गर्मी में इनदिनों वहां रहना संभव नहीं है और एसी सभी घरों में हैं नहीं! पंखे लगाए नहीं जाते हैं, इसलिए पंखे भी नहीं हैं। एक प्रकार से कहा जाए तो घर तंदूर बने हैं, जहां पर व्यक्ति केवल उबल सकता है। यह वहां के घरों की बनावट की समस्या है, तो यह कह सकते हैं कि शहरी योजना वहां की इस गर्मी में पूरी तरह से विफल हो गई है। जो वीडियो सोशल मीडिया पर आ रहे हैं, वे भयावह हैं।
मीडिया का दोहरा रवैया
अब ऐसे में, वहां का मीडिया इस बात पर फोकस कर रहा है कि कैसे यह आपदा आई है, और कैसे लोग इसका हंसकर सामना कर रहे हैं? मगर कोई भी मीडिया लगभग डेढ़ हजार मौतों को लेकर कोई भी सवाल नहीं कर रहा है? न ही योजना और व्यवस्था पर प्रश्न उठा रहा है? वह यह बहस लगातार नहीं कर रहा कि एक गलत योजना के चलते लोगों का जीवन नर्क बन गया है? न ही सरकार की कोई जबावदेही तय की जा रही है और न ही यह कहा जा रहा है कि कैसी सड़कें बनाईं जो गर्मी ही नहीं झेल पाईं?
भारत के परंपरागत ज्ञान पर उपहास
कुछ दिन पहले भारत में भीषण गर्मी को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में देशवासियों से अनुरोध किया था कि वे गर्मी से अपना बचाव करें और वे पारंपरिक और देसी उपायों से इसका सामना करें। उन्होंने आम पना, सत्तू का शरबत, छाछ (Buttermilk), बेल का रस, और नींबू पानी पीने की सलाह दी थी। ये शरीर को केवल ठंडा ही नहीं रखते, बल्कि इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन भी बनाए रखते हैं। और इसके साथ ही मटके के पानी पर बल दिया था। मगर उस समय इसी औपनिवेशिक मीडिया ने यह कहते हुए खिल्ली उड़ाने का प्रयास किया था कि चूंकि भारत में संसाधनों का अभाव है, इसलिए मोदी जी ने गर्मी से बचाव पर बल दिया है।
मगर यह भारत की जनता है, जो हर वर्ष गर्मी आने से पहले ही गर्मी से बचाव का उपाय करती है और उसके लिए बाहरी संसाधनों पर उसकी निर्भरता कम होती है और देसी उपायों पर अधिक। जैसे गर्मी आते ही सूती कपड़े बाजार में आ जाते हैं, मटकों से बाजार भर जाते हैं और लोग दोपहर में घर से बाहर निकलने से बचते हैं। भारत के इन उपायों को पिछड़ा बताकर अजीब श्रेष्ठता बोध में जीवित रहने वाला पश्चिमी मीडिया, इन दिनों हीटवेव से पीड़ित यूरोप को बेचारा बता रहा है और यह कह रहा है कि लोग सामना कर रहे हैं। वह लोगों की जिजीविषा की प्रशंसा कर रहा है, जबकि व्यवस्था की नाकामियों को छिपा रहा है।
गर्मी के पीछे पश्चिम की नीतियां
यह स्थापित सत्य है कि जिस गर्मी से यूरोप जूझ रहा है, इसके लिए वही जिम्मेदार है। आज भी वहां व्यक्तिगत कार्बन उत्सर्जन भारत की तुलना में बहुत अधिक है। हालांकि भारत को इसके लिए दोषी ठहराते हुए, वह बहुत ही सफाई से अपने अपराध छिपा ले जाता है। आंकड़ों का खेल खेलता है और कहता है कि भारत दुनिया के कुल वार्षिक उत्सर्जन का लगभग 7.5% से 8% उत्सर्जित करता है। जबकि वह यह नहीं बताता है कि भारत में पूरे विश्व की लगभग 18% आबादी निवास करती है, और उसके बाद भारत का कार्बन उत्सर्जन 8% से भी कम है, मगर वहीं पश्चिम में पूरी दुनिया की मात्र 10 या 12% ही आबादी है, और वहां कुल उत्सर्जन 18% से अधिक है। ऐसे में भी पश्चिम का मीडिया यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर जो हीटवेव है, उसका कारण कहीं पश्चिम ही तो नहीं है?
जबकि यह वही मीडिया है, जिसने जब भारत में गर्मी की आशंका व्यक्त की गई थी, तो भारत के प्रधानमंत्री मोदी को यह कहते हुए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की थी कि “विकास परियोजनाओं के चलते भारत में गर्मी हमलावर होगी”। यही बात पश्चिम अपने लिए क्यों नहीं कहता है?
आपदा किसी भी देश में आ सकती है और आती भी है, परंतु एक ही आपदा के लिए भारत के प्रति दृष्टिकोण अलग और पश्चिम के लिए अलग क्यों होता है? पश्चिम को अब अपने श्रेष्ठता के भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए और दूसरों की आपदाओं पर उपहास उड़ाने के स्थान पर भारत जैसे देशों से यह सीखना चाहिए कि आपदाओं का प्रबंधन कैसे किया जाता है, फिर चाहे वह कोविड 19 हो या फिर वर्तमान में हीटवेव! भारत ने आपदाओं को हमेशा पराजित किया है।

















