Explainer: यूरोप की प्रचंड हीट वेव ओमेगा ब्लॉक जलवायु परिवर्तन और मानव सभ्यता के सामने उभरती नई चुनौती
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Explainer: यूरोप की प्रचंड हीट वेव ओमेगा ब्लॉक जलवायु परिवर्तन और मानव सभ्यता के सामने उभरती नई चुनौती

भारतीयों के लिए यूरोप की यात्रा अर्थात ठंडा मौसम , आइस गेम्स,चारो तरफ बर्फ।  कल्पना करते  ही मन यूरोप यात्रा के लालायित होने लगता है लेकिन आज 2026 का जून महीना यूरोप के इतिहास में सबसे गर्म माह के रूप में दर्ज हो रहा है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Mahak Singh
Jul 1, 2026, 11:30 am IST
in भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI Generated Image)

प्रतीकात्मक तस्वीर (AI Generated Image)

प्रकृति प्रतिशोध नहीं लेती यह केवल संतुलन स्थापित करती है किंतु जब मानव उसे प्रकृति के सहचर और संतुलन को तोड़ देता है तब प्रकृति का उत्तर हिट में बाढ़ सूखा और तूफानों के रूप में सामने आता है।

भारतीयों के लिए यूरोप की यात्रा अर्थात ठंडा मौसम , आइस गेम्स,चारो तरफ बर्फ।  कल्पना करते  ही मन यूरोप यात्रा के लालायित होने लगता है लेकिन आज 2026 का जून महीना यूरोप के इतिहास में सबसे गर्म माह के रूप में दर्ज हो रहा है। पश्चिमी और मध्य यूरोप के अनेक देशों फ्रांस, स्पेन,  इटली, जर्मनी, ब्रिटेन और  बेल्जियम आदि में तापमान के 10 को पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए है।  कई देशों में रेड हीट अलर्ट जारी करना पड़ा, विद्यालय बंद हुए, रेल सेवा  प्रभावित हुई, अस्पतालों में आपातकालीन रोगी संख्या बढ़ गई  और हजारों लोगों को सार्वजनिक शीतलन केन्द्रो  में शरण  लेनी पड़ी। पिछले  7 दिनों में 1000 से अधिक लोग की मृत्यु हो गई है। यह कोई असामान्य गर्मी नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक मौसमी प्रणाली के संयुक्त प्रभाव का परिणाम  है।  प्रश्न उठता है क्या भविष्य में चरम मौसम अपवाद नहीं बल्कि समान स्थिति बनने जा रहा है ??

क्यों जल रहा है यूरोप?

ऐसा माना जाता रहा है कि जलवायु परिवर्तन को सबसे अधिक प्रभाव छोटे द्वीपीय  देश अफ्रीका और आर्कटिक पर पड़ेगा किंतु आज विज्ञान की रिपोर्ट अलग ही कहानी कह रही है।  यूरोप आज विश्व का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है।  यूरोप का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में लगभग 2.4 डिग्री बढ़ चुका जबकि वैश्विक औसत वृद्धि लगभग 1.5  डिग्री सेल्सियस बनी हुई है।

ओमेगा ब्लॉक से बढ़ी गर्मी

यूरोप की वर्तमान हीट वेव का  तात्कालिक कारण ओमेगा ब्लॉक है। पृथ्वी के  ऊपरी वायुमंडल में  लगभग 8 से 15 मिनट की ऊंचाई पर अत्यंत तेज गति से चलने वाली वायु  धारा को जेट स्ट्रीम कहते हैं, जो पश्चिम से पूर्व  की ओर बहती है।  इन्हीं कारण मौसम बदलता है, तो प्रश्न उठता है कि ओमेगा ब्लॉक कैसे बनता है?

कल्पना कीजिए एक राष्ट्रीय राज राष्ट्रीय राजमार्ग पर सभी वहां सामान्य गति से चल रहे हैं अचानक बीच  सड़क पर एक विशाल ट्रक खराब होकर खड़ा हो जाता है तो उसके पीछे आगे बहनों की कतार लग जाती है और यातायात रुक जाता है।  ठीक यही स्थिति आकाश में होती है जेट स्ट्रीम की गति कम हो जाती है और बड़े-बड़े मोड लेने लगती है, तब  बीच में उच्च वायुदाब और  उसके दोनों और निम्न वायुदाब का  क्षेत्र बन जाते हैं। इसकी संरचना यूनानी अक्षर ओमेगा जैसी दिखाई देती है , इसलिए ओमेगा ब्लॉक कहते हैं। यदि बीच में उच्च वायुदाब है तो गर्मी लगातार बढ़ती जाती है ,यदि बीच में निम्न वायुदाब है तो लगातार वर्षा हो जाती है। इसी कारण ओमेगा ब्लॉक को कई वैज्ञानिक वायुमंडल ट्रैफिक जाम भी कहते हैं।

हीट डोम ने बढ़ाई गर्मी

यदि हम किसी उबलते हुए बर्तन के पर ढक्कन रख दे ,तो भाप  बाहर निकल नहीं पाती है और बर्तन के भीतर तापमान बढ़ता जाता है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी से ऊपर उठने वाली  गर्म हवा उच्च वायुदाब के कारण ऊपर नहीं जा पाती है और वह सतह  के निकट ही फंस जाती है। ऊपर से नीचे उतरती हवा सम्पीड़ित और अधिक गर्म हो जाती।  बादलों का निर्माण रुक जाता है , वर्षा नहीं होती और सूर्य का विकिरण  लगातार भूमि को गर्म करता रहता है इस स्थिति को हीट डोम  कहते हैं।

यूरोप की भौगोलिक स्थिति आर्कटिक क्षेत्र के निकट रहती है।  आज आर्कटिक पृथ्वी का सबसे तेज गर्म होने वाला क्षेत्र है, जिसका प्रभाव यूरोप पर पड़ रहा है।  जब आर्कटिक की बर्फ पिघलती है, तब उसकी चमकीली सफेद सफेद समाप्त हो जाती है और नीचे स्वच्छ  पारदर्शी जल दिखाई देता है। सफेद बर्फ सूर्य के विकिरण  को वापस अंतरिक्ष में परिवर्तित करती है, जबकि गहरा जल अधिकांश उष्मा को अवशोषित कर लेता है। इसे एल्बिडो प्रभाव कहा जाता है . एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण है स्वच्छ वायु का विरोधाभास जो सबसे अजीब स्थिति है।  स्वच्छ वायु भी कई स्थिति में तापमान बढ़ा सकती है, वायु में उपस्थित धूल कण सूर्य प्रकाश को परावर्तित कर देते थे लेकिन आज स्वच्छ वायु  के कारण अब अधिक सौर ऊर्जा धरातल तक पहुंचने लगी है और  तापमान में वृद्धि होने लगी। समुद्र भी गर्म हो रहे हैं, यूरोप के चारों से विशेष कर भूमध्य सागर उत्तरी अटलांटिक का तापमान लगातार बढ़ रहा है जिसके कारण यूरोप को हीट वेव को झेलना पड़ रहा  है। अर्बन हीट आईलैंड बड़े शहर पेरिस, रोम ,लंदन, मैड्रिड आदि दिनभर ऊष्मा अवशोषित  करते हैं, और  रात में धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इसके कारण शहरों का तापमान लगातार बढ़ता चला जा रहा है।

प्रश्न उठता है कि 43 डिग्री में भारत सामान्य जबकि यूरोप में आपदा?

भारत  में जब 46 से 48 डिग्री तापमान होता है, तब भी जीवन चलता है, जबकि यूरोप में 40 से 43 डिग्री तापमान  पर आपातकाल घोषित करना पड़ रहा है। यह  जलवायु अनुकूलन का मामला है और इसके कई कारण है। यूरोप के अधिकांश इमारतें ठंडी जलवायु को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, जिसमें उष्मा को रोकने/सोखने  वाली संरचना होती है।  ऐसे घर गर्मियों में भट्टी बन जाते है और भीतर  गर्म तापमान लंबे समय तक बना रहता है।  भारत में पंखे, कूलर एवं  एयर कंडीशनर व्यापक रूप से उपयोग किया इसके विपरीत यूरोप में  घरों और कई सार्वजानिक भवनों में एयर कंडीशनर लग नहीं रहते हैं, लगभग 80% यूरोपीय घरो में ही एयर कंडीशनर का इस्तेमाल नहीं होता।  इसलिए जब अचानक हीट वेव आती है तो उनके बचने के लिए उनके पास उपाय सीमित रह जाते हैं। शरीर की अनुकूलन क्षमता भी यूरोप में ठंडी जलवायु के प्रति है वह इतने अधिक तापमान  के आदी नहीं है, जबकि भारत के लोग इतने तापमान के अभ्यस्त हैं। एक बड़ा कारण है गर्मी में यूरोप में दिन भारत की तुलना में लंबे होते हैं।  सूर्य का प्रकाश यूरोप में लगभग 13 से 15 घंटे तक रहता है जबकि भारत में 12 घंटे। इससे  भूमि को ठंडा होने में कम समय मिलता है और रात्रि में घर गर्म रहते हैं।  रात में तापमान कम न हो तो शरीर को विश्राम नहीं मिलता, निर्जलीकरण बढ़ता है, हृदय एवं श्वसन रोगो का  खतरा बना रहता है और अगले दिन शरीर पहले की तुलना में कमजोर हो जाता है।

भारत के लिए चेतावनी – जलवायु और भविष्य की नीति

यदि यूरोप  जलवायु परिवर्तन की प्रयोगशाला बन गया तो, भारत भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा का सामने करने वाला देश बनेगा। पिछले दो दशकों में भारत में हीट वेव  निर्मित हो रही है।  भारत में जीविका और सामाजिक असमानता भी सबसे बड़ी चुनौती है।

इस भीषण  में ,किसान , निर्माण श्रमिक, सड़क विक्रेता, रिक्शा चालक, सफाई कर्मचारी, मजदूर, बुजुर्ग ,गर्भवती महिला और छोटे बच्चे  सबसे ज्यादा खतरे में है।  भारत के लगभग 75% श्रमिक खुले वातावरण में कार्य करते हैं। यही कारण की भारत में हीट वेव केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि रोजगार और आय का भी  संकट है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार हीट वेव  का भारत जैसे देशों के प्रति वर्ष जीडीपी के लगभग तीन से पांच प्रतिशत नुकसान हो सकता है। फसल उत्पादकता में कमी हो सकती है , सिंचाई की मांग बढ़ सकती है, उद्योग के कार्य घंटे में कमी आ सकती है, श्रमिकों की उत्पादकता घट सकती है, बिजली की मांग बढ़ सकती है, स्वास्थ्य क्षेत्र में गंभीर खतरे पैदा हो सकते है।

सामाजिक न्याय का विमर्श

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सब पर समान रूप से नहीं पड़ता है। एक संपन्न व्यक्ति एयर कंडीशन चला सकता है, घर में काम कर सकता है लेकिन दैनिक  मजदूर के पास यह सब विकल्प नहीं होते। इसलिए आज जलवायु न्याय और शीतल न्याय जैसी अवधारणाएं भी वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन रही है।  हालांकि भारत सरकार ने  इस हीट वेव से निपटने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया है।  23 से अधिक राज्यों में और 140 से अधिक शहरों ने  एक्शन प्लान तैयार किया है, जिनमें पूर्व चेतावनी ,अस्पतालों की तैयारी, पेयजल व्यवस्था, स्कूलों के समय परिवर्तन आदि जैसे उपाय सम्मिलित  है।

भारत को अब हीट गवर्नेंस के तहत हीट वेव को मौसम विभाग का मामला न मानकर  राष्ट्रीय आपदा के रूप में देखना चाहिए। ब्रिटेन की तरह भारत में भी हिट हेल्थ अलर्ट प्रणाली विकसित होनी चाहिए।  भविष्य  के शहर में अधिक हरित , अधिक छायादार ,अधिक हवादार बनने चाहिए, सफेद रंग की परावर्तक छतो का  निर्माण होना चाहिए। हर शहर में हरित गलियारे,खुले पार्क का विस्तार करना चाहिए। श्रमिकों की सुरक्षा का विशेष ध्यान देना चाहिए, जैसे सर्दियों में रैन बसेरे बनते हैं, वैसे ही गर्मी में पुस्तकालय, सामुदायिक भवन, विद्यालय को कूलिंग  सेंटर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।  हमारी पारंपरिक वास्तु प्रणाली  में  आंगन, बरामदा ,जालियां, ऊंची छत ,चूने  के प्लास्टर  एवं मिट्टी के घर होते थे।  ऐसे इको फ्रेंडली हाउसिंग कि आज  हमें जरूरत है। जलवायु परिवर्तन से विकास की नई परिभाषा निर्मित  हो रही है।  आज विकास का अर्थ केवल सड़क, पुल, भवन, उद्योग नहीं है, विकास वह है जो गर्मी को, सूखे को , बाढ़ को झेल सके और  जो प्रकृति के साथ संतुलन बना सके। 21वीं सदी  की सबसे बड़ी चुनौती युद्ध नहीं बल्कि बदलती जलवायु के साथ मानव सभ्यता का सह-अस्तित्व है।  जो राष्ट्र समय रहते स्वयं को संतुलित कर लेंगे, वही भविष्य का नेतृत्व करेंगे।

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दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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