विकास की दौड़ में संकटग्रस्त पर्यावरण और भारतीय संस्कृति से समाधान की राह
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होम संघ @100 पंच परिवर्तन पर्यावरण

विकास की दौड़ में संकटग्रस्त पर्यावरण और भारतीय संस्कृति से समाधान की राह

धरती की सीमाएं अब टूट चुकी हैं। Earth Overshoot Day 2025 इस वर्ष 24 जुलाई को ही आ गया। यानी सालभर के लिए जितने संसाधन धरती पुनः उत्पन्न कर सकती थी, मानवता ने उन्हें सात महीने में ही समाप्त कर दिया।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Mahak Singh
Sep 28, 2025, 01:15 pm IST
in पर्यावरण, पर्यावरण

धरती की सीमाएं अब टूट चुकी हैं। Earth Overshoot Day 2025 इस वर्ष 24 जुलाई को ही आ गया। यानी सालभर के लिए जितने संसाधन धरती पुनः उत्पन्न कर सकती थी, मानवता ने उन्हें सात महीने में ही समाप्त कर दिया। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह असंतुलन हमारे अस्तित्व को सीधी चुनौती है। “Earth Overshoot Day” बताता है कि हम प्राकृतिक संसाधनों की सीमा को समय से पहले ही पार कर जाते हैं। 24 जुलाई 2025 को ही Earth Overshoot Day आ गया यानी इस दिन तक हमने वर्ष भर के लिए पृथ्वी जो संसाधन पुनर्जीवित कर सकती है, वे खत्म हो चुके होते हैं, और बाद की खपत “ऋण” में होती है। 2024 में इस दिन 1 अगस्त था यानी हम अगस्त में ही पर्यावरणीय बजट से बाहर निकल जाते हैं। इस आंकड़े का मतलब स्पष्ट है: हम जितना ग्रह से ले रहे हैं, उसे वापस देने की हमारी क्षमता से कहीं अधिक है।

  • ग्लोबल वार्मिंग, समुद्र स्तर वृद्धि, तीव्र मौसम परिवर्तन, वर्षा अनियमितता, सूखे और बाढ़- ये सभी विकास की कीमत हैं।
  • जनसंख्या दबाव-बढ़ती जनसंख्या संसाधन संकट को और गहरा करती है- भूमि, जल और ऊर्जा पर असहनीय दबाव डालती है। लेकिन असली समस्या असमान उपभोग भी है। कुछ वर्ग अत्यधिक उपभोग करते हैं, जबकि गरीबों को मूल आवश्यकताएँ भी नहीं मिल पातीं।
  • क्या वह विकास, जो हमारी जड़ें, हमारी सांस्कृतिक पहचान और पृथ्वी को नष्ट कर दे- वास्तव में विकास है? यदि विकास का पैमाना “कितना अधिक आप ले सकते हो” बन जाए, तो वह चरम विरोधाभासी हो जाता है।

पर्यावरण क्यों है जीवन का आधार

  • जीवन के मूलभूत संसाधन- ऑक्सीजन, जल, भोजन, ऊर्जा- ये सभी सीधे पर्यावरण से ही प्राप्त होते हैं। स्वच्छ हवा और स्वच्छ जल मनुष्य, पशु एवं पौधे सभी के लिए अनिवार्य हैं।
  • जल–मृदा–भूमि संतुलन- पेड़-पौधे मिट्टी को बाँधे रखते हैं, मृदा क्षरण रोकते हैं। वर्षा चक्र, वायु संतुलन और जलधाराएँ — ये सभी वन और भू-रचना पर निर्भर हैं।
  • जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र- प्रत्येक जीव की एक भूमिका होती है; एक कड़ी में बाधा आए तो पूरा संतुलन बिगड़ता है। प्राकृतिक नियंत्रण, परागण और कीट नियंत्रण- सब जैव विविधता पर निर्भर हैं।
  • मानव स्वास्थ्य एवं समृद्धि- प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और कई उष्णकटिबंधीय रोग बिगड़े पर्यावरण से ही जन्म लेते हैं। सुंदर वातावरण, हरियाली और शांत जीवन मनोबल तथा उत्पादकता बढ़ाते हैं।
  • आर्थिक एवं सामाजिक स्थिरता- कृषि, मत्स्य पालन, पर्यटन जैसे क्षेत्र पर्यावरण पर आधारित हैं; पर्यावरण संकट बढ़े तो आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं और अस्थिरता बढ़ती है।
  • उदाहरण: अनियमित वर्षा/बाढ़ से फसल क्षति, आपूर्ति-श्रृंखला बाधाएँ और कीमतों में उछाल। इसलिए, पर्यावरण केवल “सुंदरता” या “इकाई” नहीं- जीवन-दायिनी आधार है।
  • भारतीय परंपरा: जीवनशैली प्रकृति के साथ जुड़ी थी।
  • भारत की सांस्कृतिक धारा सदियों से प्रकृति के साथ सहजीवन (symbiosis) की वाणी कहती आई है। हमारी परंपराएँ — त्यौहार, रीति-रिवाज, पहनावा, भोज, विवाह-संस्कार और पूजा-पाठ सभी प्रकृति-सापेक्ष रहे हैं।

भारतीय परंपरा का संदेश

भारत में पर्यावरण संरक्षण कोई नया विचार नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा था। भारतीय दर्शन में प्रकृति को “माता” माना गया है। वेदों और उपनिषदों में जल, वायु, भूमि, अग्नि और आकाश को देवतुल्य दर्जा मिला है।

  • ऋग्वेद- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” (पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।)
  • अथर्ववेद- “शं नो भूमि: शं अन्तरिक्षं, शं नो द्यौः।” (पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग हमें कल्याण दें।)
  • यजुर्वेद- “आपः शुभे भवतु नः।” (हे जल! हमारे लिए शुभकारी बनो।)
  • गीता (6.29)- “सर्वभूतस्थ आत्मानम् सर्वभूतानि चात्मनि इक्षते।” — सभी प्राणियों में आत्मा का दर्शन।
  • त्यौहारों में प्रकृति-पूजा- वृक्ष-पूजा, नदी-पूजा, सूर्य-उपासना, वायु व अग्नि-पूजन।
  • जनजातीय प्रथाएँ- भारत के जनजातीय समाजों में पर्यावरण-प्रेम केवल आस्था नहीं, जीवन-रीति है।
  • बिश्नोई समुदाय (राजस्थान)- गुरु जंभेश्वर के 29 नियम; खेजड़ली (1730) में 363 लोगों का बलिदान।
  • उत्तर-पूर्व (मेघालय, नागालैंड)-Sacred Groves जहाँ कटाई/शिकार निषिद्ध; जैव-विविधता के जीवित भंडार।
  • भील और गोंड (मध्य भारत)- पेड़ काटने से पहले क्षमा-याचन की परंपरा।
  • लद्दाख/हिमालय- जल-स्रोतों को देवता मानकर अतिदोहन वर्जित।
  • प्रकृति-पूजक व्यवस्था: भारतीय उदाहरण।
  • वृक्ष-पूजा – तुलसी, पीपल, वट, नीम को देवस्वरूप मानना।
  • नदी-पूजा- गंगा, यमुना, नर्मदा को “माँ” कहना।
  • पर्वत एवं वन-पूजा- गिरिराज गोवर्धन, अरण्य देवियाँ, वनदेवता।
  • त्योहार- छठ (सूर्य व जल-उपासना), वट सावित्री (वट-पूजा), मकर संक्रांति (सूर्य व ऋतु-सम्मान)।
  • विकास की अंधी दौड़: कितना “विकास” वास्तव में हानिकारक?
  • विकास और पर्यावरण संतुलन की जो गाथा सामने है, वह चिंताजनक है।
  • अतिप्रयोक्तावाद- जरूरत से अधिक उत्पादन और खपत।
  • उद्योग, वाहन, निर्माण- संसाधनों का अत्यधिक दोहन।
  • वनों की कटाई, खनन, असंतुलित कृषि — पर्यावरणीय संतुलन का क्षय।
  • परिणाम- ग्लोबल वार्मिंग, समुद्र-स्तर वृद्धि, तीव्र मौसम-घटनाएँ, अनियमित वर्षा, सूखा-बाढ़।
  • जनसंख्या-दबाव- भूमि, जल और ऊर्जा पर बोझ बढ़ाता है; पर असली समस्या असमान उपभोग भी है — कुछ वर्ग अत्यधिक उपभोग करते हैं, जबकि गरीबों को मूल आवश्यकताएँ भी नहीं मिल पातीं।
  • क्या वह “विकास” जो हमारी जड़ों, सांस्कृतिक पहचान और पृथ्वी को ही नष्ट कर दे — वास्तव में विकास है?

पर्यावरण की अनदेखी: संकट के चार आयाम

  • आर्थिक प्रभाव- कृषि पहली चोट झेलती है; अनियमित मौसम से फसलें नष्ट, कीमतें अस्थिर।
  • उदाहरण: बाढ़/ओलावृष्टि के बाद मुआवज़े का बोझ और आपूर्ति-श्रृंखला बाधित।
  • सामाजिक प्रभाव- लू/प्रदूषण से स्वास्थ्य-संकट; जलवायु-जनित पलायन से शहरी अव्यवस्था व असमानता।
  • उदाहरण: भीषण गर्मी के मौसम में हीट-स्ट्रोक मामलों में उछाल, जल-संकट से झगड़े।
  • राजनीतिक प्रभाव- जल-विवाद, पुनर्वास-नीतियों पर दबाव, पर्यावरणीय शरणार्थी।
  • उदाहरण: नदी-जल बँटवारे पर प्रांतीय/सीमापार तनाव।
  • सांस्कृतिक प्रभाव- नदियों-वनों से जुड़े त्योहार/लोकाचार संकट में; हिमालयी अंचलों में पानी की कमी से गाँव खाली।
  • उदाहरण: पारंपरिक जल-मेले/अरण्य-उत्सवों में कमी, पवित्र वनों का क्षरण।
  • पर्यावरण की अनदेखी का अर्थ- आर्थिक अस्थिरता, सामाजिक विषमता, राजनीतिक तनाव और सांस्कृतिक ह्रास। चेतना न आई तो अगली पीढ़ियाँ बंजर और संकटग्रस्त धरती पाएँगी।

भारतीय संस्कृति से समाधान की राह

  • पर्यावरण का संरक्षण केवल “सीखना” नहीं, बल्कि जड़ों से जुड़कर उसे जीना है। भारत की संस्कृति सदैव प्रकृति-आधारित रही है-  नदी को माँ, वृक्षों को देवस्वरूप, पर्वत व पशु-पक्षियों को पूजनीय माना गया। आज आवश्यकता है कि हम इस विरासत को पुनर्जीवित करें, स्व-बोध करें और भारतीयता के तत्वों को क्रियान्वित करें।
  • परिवार की भूमिका (कुटुंब-प्रबोधन) -परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, संस्कारों की पाठशाला है। यदि परिवार जल-बचत, वृक्षारोपण, अपशिष्ट-प्रबंधन और संतुलित उपभोग सिखाए, तो नई पीढ़ी स्वाभाविक रूप से पर्यावरण-मित्र बनेगी। घर में 3R (Reduce, Reuse, Recycle) अपनाएं- कचरा अलग करना, पुनरुपयोग; वृक्ष लगाने/संभालने को पारिवारिक दिवस बनाएँ।
  • नागरिक कर्तव्य: कानूनी ही नहीं, नैतिक भी ,अनुच्छेद 51A(g) नागरिक का कर्तव्य बताता है, पर यह केवल कानून नहीं — नैतिक जिम्मेदारी है। प्रश्न यह है कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरोहर देंगे: हरी-भरी धरती या प्रदूषित मरुभूमि?
  • आत्मा और चेतना – हम मानते हैं कि “कण-कण में आत्मा का वास” है। यदि यह सत्य है तो जीव-जंतुओं, वनस्पति और जलधाराओं का नाश क्यों? उत्तर स्पष्ट है-हमने स्व को पहचाना नहीं और उपभोग की अंधी दौड़ में प्रकृति से कट गए।
  • प्रकृति से जुड़ाव-आज प्रेरणा के लिए लोग “जंगल वॉक/फॉरेस्ट बाथिंग” का सहारा ले रहे हैं; पर सोचिए, यदि जंगल केवल चित्रों/वर्चुअल-रियलिटी में रह जाएँ तो? दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर इसी लापरवाही के प्रतीक हैं, जहाँ विकास की दौड़ ने जीवन का दम घोंट दिया।
  • स्व-जागृति -हम केवल उपभोक्ता नहीं, संरक्षक हैं। अपनी ज़रूरतों का पुनर्मूल्यांकन करें — क्या यह वस्तु सचमुच आवश्यक है? ,ऊर्जा-बचत — संयमित उपयोग, दक्ष उपकरण, सौर ऊर्जा। जल-संरक्षण- वर्षा-जल संचयन, रिसाव रोकना, बेहतर सिंचाई पद्धतियाँ।
  • शिक्षा, नीति और समाज- स्कूल-कॉलेजों में व्यवहारिक पर्यावरण-शिक्षा; वृक्षारोपण, सौर ऊर्जा, जल-पुनर्भरण, प्रदूषण-नियंत्रण; कड़े कानून व प्रभावी निगरानी।
  • सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को जोड़कर सामुदायिक जिम्मेदारी को मजबूत करना।
  • यह समय है- परिवार से लेकर शिक्षा, नीति से लेकर नागरिक-भागीदारी, स्व-बोध से लेकर सामाजिक-आंदोलन तक- हर स्तर पर खड़ा होने का। देर न की तो धरती फिर से हरी-भरी और जीवनदायिनी बन सकती है।
  • हमें अपनी पानी-परंपरा, प्रकृति-आधारित त्योहार, जनजातीय संवेदनशीलता और पहाड़ी समाजों की सरलता से सीखकर ऐसा मॉडल गढ़ना चाहिए जो न केवल भारत, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए संरक्षण का मार्ग बने।
Topics: Climate changeGlobal warmingपाञ्चजन्य विशेषIndian Cultural HeritageEarth Overshoot Day 2025Over-use of natural resourcesEnvironmental imbalanceBiodiversity conservation
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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