17 मई 2026! मध्य प्रदेश के एक नगर धार में यह दिन सनातनी हिंदू समाज की भावनाओं के उद्वेग और वर्षों की तपस्या के प्रतिफल को प्राप्त करने का दिन था। आज धार स्थित भोजशाला का परिसर लगभग 800 वर्ष पश्चात पुनः एक बार वेद मंत्रों से गुंजायमान हो रहा था और इस परिसर की अधिष्ठात्री देवी मां वाग्देवी की प्रतिमा की यहां प्राण-प्रतिष्ठा हो रही थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय में 15 मई को यह व्यवस्था दी गई कि धार नगर स्थित भोजशाला परिसर मूलतः एक मंदिर है और यह कि यहां आगे हिंदू ही पूजा-अर्चना करेंगे। भोजशाला में मां वाग्देवी के नियमित पूजन हेतु दशकों से जनसंघर्ष चल रहा था। 15 मई को यह निर्णय घोषित होते ही सनातन समाज की शतकों की पीड़ा और दशकों का संघर्ष श्रद्धालुओं के आनंदाश्रुओं से व्यक्त हो रहा था।
पाञ्चजन्य की पहल
भोजशाला को राट्रीय मुद्दा बनाने में पाञ्चजन्य की विशेष भूमिका रही। जब भी हिन्दुओं ने इसके लिए आंदोलन किया या न्यायालय मे याचिका दायर की, हमनेे विशेष सामग्री प्रकाशित की। मार्च 2024 में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एएसआई को भोजशाला परिसर का सर्वेक्षण कराने को कहा। इसके बाद हमने एक विशेष आयोजन कर इस मामले को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया। अब परिणाम सबके सामने है।
मां वाग्देवी के मंदिर का यह इतिहास 1034 से प्रारंभ होता है जब मालवा के महाप्रतापी महाराज भोज ने अपनी राजधानी धार नगरी में एक विशाल विद्यालय का निर्माण करवा कर उसमें एक भव्य मंदिर बनवाया, जिसमें वाग्देवी के रूप में मां सरस्वती की अत्यंत सुंदर मूर्ति भी स्थापित करवाई। महाराज भोज स्वयं प्रतापी तो थे ही, विद्वान भी थे। वे कई विषयों के ज्ञाता थे और उनका आग्रह था कि उनके राज्य में शिक्षा के अवसर संपूर्ण प्रजा के लिए एक समान उपलब्ध रहे। उन्होंने अपने राज्य में कई विद्यालय बनवाए और विभिन्न विषयों पर अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्थाएं विकसित कीं। इसी क्रम में धार नगरी में एक विद्यालय परिसर का निर्माण किया गया, जिसमें मां सरस्वती का एक भव्य मंदिर निर्मित किया गया और उसमें वाग्देवी के रूप में सरस्वती की अत्यंत सुंदर मूर्ति स्थापित की गई।
भोजशाला को किया ध्वस्त
कालांतर में 1305 ई. के लगभग, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा मालवा के परमार शासकों को परास्त कर दिया गया और आक्रांताओं की परंपरा के अनुरूप भोजशाला को ध्वस्त कर वहां की मूर्तियों, विग्रह आदि को खंडित कर दिया गया। अगले चार शतक तक मालवा पर मुस्लिम शासकों का ही शासन रहा जिन्होंने धार के नजदीक मांडू गढ़ को अपनी राजधानी बना लिया। पंद्रहवीं शताब्दी में महमूद खिलजी द्वारा मंदिर के ठीक बगल में कमालुद्दीन मौला का मकबरा बनवा दिया गया।
हालांकि जानकारों का दावा है कि कमालुद्दीन मौला की मृत्यु अमदाबाद में हुई थी! आगे चलकर समूचे उत्तर-मध्य भारत पर मुगलों का शासन हो गया। इस दौर में धार और भोजशाला परिसर सामान्यतः उपेक्षित ही रहे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस परिसर को भोजशाला नाम काफी बाद में मिला। प्राचीन शिलालेखों आदि में इसे ‘सरस्वती सदन’ या ‘शारदा सदन’ के नाम से उल्लेखित किया गया है।
पुरातत्व विभाग के अधीन
1732 के लगभग पेशवा बाजीराव प्रथम के छोटे भाई चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठों ने मालवा पर कब्जा कर लिया। मालवा के विभिन्न क्षेत्रों में पेशवा बाजीराव द्वारा अपने भिन्न-भिन्न सहयोगियों को कर वसूली के अधिकार देकर स्थापित कर दिया गया जिनमें शिंदे (सिंधिया), होल्कर आदि प्रमुख थे। इसी क्रम में धार क्षेत्र की बागडोर पवारों को सौंपी गई। 1857 तक क्षेत्र पर पवार वंश के नेतृत्व में मराठों का आधिपत्य रहा। 1857 में अंग्रेजों द्वारा मराठों को पराजित कर धार को अपने आधिपत्य में ले लिया गया और पवार उनके प्रतिनिधि बन गए। 1909 में यह परिसर अंग्रेजों के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन ले लिया गया।
नमाज नहीं हो सकती
1935 तक इस परिसर में नमाज अदा करने का कोई स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं है। हालांकि बाद में मुस्लमानों की मांग के चलते धार के राजा द्वारा एक आदेश जारी कर मुसलमानों को परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति प्रदान की गई। नमाज का यह क्रम प्रारंभ होने पर हिंदू समाज द्वारा इसका विरोध भी किया गया। यह भी कहा जाता है कि इस विवाद को हल करने के लिए धार राजा द्वारा मुस्लमानों को एक मस्जिद बना कर दी गई जिसे स्थानीय लोग रहमत मस्जिद कहते हैं। हालांकि इस तथ्य का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
1962 में एक मुस्लिम नागरिक द्वारा भोजशाला परिसर में पांच बार की नमाज अदा करने हेतु न्यायालय में एक दीवानी वाद भी प्रस्तुत किया गया। इस वाद के सिलसिले में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा यह प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया कि यह परिसर सदा से मंदिर ही रहा है और यहां नमाज अदा करने की व्यवस्था नहीं दी जा सकती। हालांकि, वादी द्वारा इस वाद में अपना पक्ष रखा ही नहीं गया और यह वाद न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया। इस दौरान वार्षिक स्तर पर वसंत पंचमी के दिन परिसर में मां सरस्वती का पूजन होता रहा, वहीं 80 के दशक के दौरान मुस्लिम समाज द्वारा शुक्रवार की नमाज भी प्रारंभ कर दी गई।
हिंदुओं ने शुरू किया सत्याग्रह
1987 से हिंदू समाज द्वारा नमाज बंद करवाने एवं प्रतिदिन पूजा करने हेतु सत्याग्रह भी प्रारंभ हो गया। आम हिंदू भोजशाला में नियमित पूजा का एकाधिकार न मिलने की वजह से उद्वेलित भी था और इसीलिए कुछ अवसरों पर यह सत्याग्रह आंदोलन में भी तब्दील हुआ जिसमें प्रशासन द्वारा बल प्रयोग किया गया। 2003 में एक ऐसे ही आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग और गोलीबारी की गई जिससे कुछ व्यक्तियों की मौत भी हो गई थी। इस परिप्रेक्ष्य में 2003 में ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा एक आदेश के माध्यम से यह व्यवस्था दी गई कि प्रति मंगलवार हिंदू परिसर में पूजा करेंगे वहीं प्रति शुक्रवार मुस्लिम वहां नमाज अदा करेंगे। साथ ही वसंत पंचमी के दिन हिंदू सरस्वती पूजन का बड़ा आयोजन करेंगे। यही व्यवस्था अब तक चल रही थी।
एएसआई सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष
- वर्तमान ढांचे के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस ढांचे का निर्माण आग्नेय पत्थरों से बने एक प्राचीन चबूतरे पर हुआ है जो आज भी इस ढांचे को आधार दे रहा है।
- वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययन यह इंगित करता है कि वर्तमान परिसर किसी प्राचीन निर्माण को तोड़ कर और उसे संशोधित कर बनाए गया है।
- खुदाई के दौरान मिली ईंटों से बनी भित्तियां स्पष्टतः 10वीं या 11 वीं सदी में परमार काल में निर्मित हुई थीं।
- सर्वेक्षण में करीब 150 शिलालेख या उनके अवशेष प्राप्त हुए। ये शिलालेख संस्कृत, प्राकृत या नागरी अक्षरों में लिखे हुए हैं। इन लेखों में मदन, माधव, वैद्य, काम, मण्डल जैसे शब्द पढ़ने में आते हैं।
- दो शिलालेखों पर महाराज भोज द्वारा रचित कविताएं अंकित हैं जिनके प्रारंभ में ‘ॐ सरस्वत्याय नमः’ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ आदि के माध्यम से देवताओं का आवाहन किया गया है।
- एक विशाल लेख पर पारिजात मंजरी नाटिका अंकित है जिसकी रचना मदन द्वारा की गई थी। मदन, धार के परमार वंश के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु थे। इस नाटिका का प्रथम मंचन मां सरस्वती के मंदिर (शारदा देवय: शादमणि) में हुआ था।
- परिसर की दीवारों पर त्रिशूल, शंख, स्वास्तिक आदि बने नजर आते हैं।
- वर्तमान ढांचे में 106 स्तंभ और 82 भित्ति स्तंभ मौजूद हैं, जो स्पष्टतः पूर्ववर्ती स्तंभों का पुनरुपयोग है।
- सर्वेक्षण के दौरान 94 मूर्तियां या मूर्तियों के अवशेष दृष्टिगत हुए हैं। इनमें चतुर्भुज देवताओं की आकृतियां शामिल हैं। इन आकृतियों में गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव आदि देवता पहचाने जा सकते हैं। इनके अतिरिक्त सिंह, हाथी, घोड़ा, नाग, कछुआ, कीर्तिमुख आदि भी नजर आते हैं। इन सभी छवियों को घिस कर नष्ट करने के प्रयास किए गए हैं।
- परिसर में प्राप्त चिन्हों, आकृतियों, मूर्तियों, शिलालेखों आदि से यह स्पष्ट है कि इस परिसर में साहित्यिक गतिविधियां संचालित होती थीं। सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि वर्तमान ढांचा एक पूर्ववर्ती परमार कालीन मंदिर के अवशेषों से बना हुआ है।
सर्वेक्षण का आदेश
इस बीच भिन्न-भिन्न याचिकाओं के संबंध में उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई भी चल रही थी। मार्च, 2024 में उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले के स्थाई निराकरण हेतु एएसआई को अत्यंत स्पष्ट आदेश देते हुए कहा गया कि-भोजशाला परिसर तथा उसके बाहर के 50 मीटर तक की परिधि का जीपीआर-जीपीएस सहित उपलब्ध आधुनिकतम तकनीक का प्रयोग कर सर्वेक्षण किया जाए।
दीवारों, स्तंभों, फर्श, सतह, ऊपरी छत, गर्भ गृह, सहित जमीन के ऊपर और नीचे स्थित सभी स्थाई, अस्थाई, चलित एवं अचलित सभी निर्माणों का वैज्ञानिक अन्वेषण एवं कार्बन डेटिंग प्रक्रिया से उम्र का पता लगाया जाए। इन स्पष्ट निर्देशों के बाद एएसआई द्वारा एक उच्चस्तरीय दल की नियुक्ति कर संपूर्ण परिसर क्षेत्र का सर्वेक्षण करवाया गया जिसमें 98 दिन का समय लगा। इस दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्षों से एक-एक प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। इस प्रकार अत्यंत पारदर्शिता के साथ यह सर्वेक्षण संपन्न हुआ।
इस सर्वेक्षण की लगभग 2200 पृष्ठ की विस्तृत रिपोर्ट एएसआई द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई। स्पष्टतः अत्यंत पारदर्शी, निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक आधार पर किए गए इस सर्वेक्षण से न्यायालय को अपना निर्णय देने के लिए मजबूत आधार प्राप्त हुए। इस स्पष्ट सर्वेक्षण रिपोर्ट के पश्चात माननीय न्यायाधीश स्वयं भी अवलोकन हेतु धार गए, ताकि निर्णय देने के पूर्व वे यथास्थिति को अपनी दृष्टि से देख सकें। यह भी अपने आप में एक असाधारण घटना थी। एएसआई की इस रिपोर्ट के पश्चात न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों को इस रिपोर्ट के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया/आपत्ति आदि दर्ज करने हेतु उचित समय दिया गया तथा उन पर सुनवाई के पश्चात न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला तथा न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी द्वारा एकमत से अपना निर्णय सुनाया गया।


















