न्यायपालिका देश के लोकतंत्र का सबसे सर्वोच्च एवं मजबूत स्तंभ है, जिस पर हर नागरिक का अटूट भरोसा टिका हुआ है। ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ की तर्ज पर यदि न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले लोग पूरी तरह पारदर्शी और योग्य प्रक्रिया से नहीं चुने जाएंगे, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से विश्वास डगमगाने लगेगा।
’विदित हो कि कोलेजियम प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित वह व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) एवं चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह तथा उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश एवं दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण की अनुशंसा करता है। यह व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से न्यायालय के निर्णयों द्वारा विकसित हुई है।’
न्यायमूर्ति भुइयां का यह तल्ख बयान तब आया जब कोलेजियम के पिछले तीन प्रस्तावों में जजों की पदोन्नति को लेकर कोई स्पष्ट आधार या कारण नहीं बताया गया। यह सवाल सिर्फ एक संस्थागत प्रक्रिया का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर न्यायिक नैतिकता, पारदर्शिता और आम जनता के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
‘न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति-जनविश्वास’
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा केवल संविधान से प्राप्त शक्तियों, न्यायालय भवनों या उसके आदेशों की बाध्यता से नहीं बनती। उसकी वास्तविक शक्ति उस विश्वास में निहित है जो सामान्य नागरिक न्यायाधीशों की योग्यता, निष्पक्षता और नैतिकता पर करता है। न्यायाधीश नागरिक की स्वतंत्रता, सम्मान, संपत्ति और मौलिक अधिकारों का संरक्षक होता है। वह सरकार के निर्णयों और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की संवैधानिक समीक्षा करने की शक्ति रखता है। इसलिए यह जानना हर नागरिक और सार्वजनिक हित का विषय है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण पदों पर किसे, किन योग्यताओं और किन कारणों के आधार पर नियुक्त किया गया है। न्यायमूर्ति भुइयां की यह चेतावनी किसी बाहरी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि न्यायपालिका के भीतर से आई एक स्वस्थ संस्थागत पुकार है।
’भारतीय न्याय-दृष्टि’
भारत में न्याय की अवधारणा आधुनिक न्यायालयों और अंग्रेजी कानूनों से बहुत पुरानी है। प्राचीन भारतीय चिंतन में न्याय को केवल लिखित नियमों का पालन नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, विवेक और लोककल्याण का समन्वय माना गया है। महाभारत के सभा पर्व में एक प्रसिद्ध प्रसंग है, जिसमें वर्णन किया गया है कि वह सभा सभा नहीं जहां अनुभवी लोग न हों, वे अनुभवी भी नहीं जो धर्म न कहें, वह धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो और वह सत्य नहीं जिसमें छल मिला हो। यह संदेश आज भी संस्थाओं की सत्यनिष्ठा पर सटीक बैठता है।
रामायण में राजधर्म का केंद्र प्रजा का विश्वास रहा है। राजा हरिश्चंद्र की कथा सत्य के लिए सर्वस्व त्यागने का आदर्श प्रस्तुत करती है, जबकि विक्रमादित्य की न्यायप्रियता बताती है कि समाज में न्याय करने वाले व्यक्ति में ज्ञान के साथ निष्पक्षता और नैतिक साहस भी देखता है। ये प्रसंग यह सिखाते हैं कि न्याय होना ही पर्याप्त नहीं, न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।
न्यायालयों से संवैधानिक न्यायपालिका तक
आधुनिक भारतीय न्यायपालिका का संस्थागत ढांचा मुख्य रूप से ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित हुआ। वर्ष 1726 के चार्टर के अंतर्गत कलकत्ता, मद्रास और बंबई में मेयर न्यायालय स्थापित किए गए। बाद में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट और फिर भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के आधार पर उच्च न्यायालयों की नींव रखी गई। स्वतंत्रता के बाद 26 जनवरी 1950 को वर्तमान सर्वोच्च न्यायालय अस्तित्व में आया। संविधान ने न्यायपालिका को संविधान और मौलिक अधिकारों का संरक्षक बनाया। अनुच्छेद 124 और अनुच्छेद 217 क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं। संविधान के मूल पाठ में कोलेजियम शब्द का कोई उल्लेख नहीं है, बल्कि यह प्रणाली बाद में अदालती फैसलों (जजेज केस) के जरिए विकसित हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना था।
अपारदर्शिता का संकट
कोलेजियम का उद्देश्य सही होने के बावजूद इसकी कार्यप्रणाली पर लंबे समय से गंभीर सवाल उठते रहे हैं। मुख्य आलोचना यह है कि चयन के मानदंड स्पष्ट नहीं हैं, योग्य उम्मीदवारों के तुलनात्मक मूल्यांकन की जानकारी नहीं मिलती और कई बार यह समझना कठिन होता है कि किसी वरिष्ठ को छोड़कर कनिष्ठ को क्यों चुन लिया गया।
3 अक्टूबर 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कोलेजियम के प्रस्ताव अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। किंतु केवल अनुशंसित नाम प्रकाशित करना और चयन के ठोस आधार या कारण न बताना पारदर्शिता का अधूरा रूप है। नाम का प्रकाशन केवल परिणाम बताता है, जबकि कारणों का प्रकाशन यह बताता है कि निर्णय न्याय संगत क्यों है।
ऐतिहासिक और चर्चित न्यायिक प्रकरण (तीन प्रमुख संदर्भ)
न्यायिक आचरण और नियुक्तियों की इस बहस के बीच तीन ऐतिहासिक अदालती फैसले न्यायिक नैतिकता की मिसाल माने जाते हैं।
*दया शंकर बनाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1987) , इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि न्यायाधीश अपने पद की गरिमा के खिलाफ मामूली कार्रवाई भी नहीं कर सकते। यानी उनका आचरण हर संदेह से परे होना चाहिए।
*हाई कोर्ट ज्यूडिशियल ऑफिसर एसोसिएशन बनाम रमेश चंद्र पालीवाल (1998), इस निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि जजों को संन्यासियों जैसा व्यवहार करना चाहिए, जिनकी कोई इच्छा या आकांक्षा न हो।
*तारक सिंह बनाम ज्योति बसु (2005), इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि जजों को स्वयं उच्च मानकों के अनुशासन का अनुकरण करना चाहिए, क्योंकि उन पर कोई अन्य बाहरी प्राधिकरण वैसा अनुशासन लागू नहीं कर सकता।
’कारण’ किसी निर्णय की आत्मा क्यों होते हैं?
भारतीय प्रशासनिक कानून में कारणयुक्त निर्णय प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता का अनिवार्य अंग माना जाता है। कारण निर्णय लेने वाले को सावधान रखते हैं, मनमानी पर अंकुश लगाते हैं और न्यायिक समीक्षा को संभव बनाते हैं। यदि कोलेजियम को यह लिखित रूप में बताना पड़े कि किसी उम्मीदवार को न्यायाधीश क्यों चुना गया, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि उस उम्मीदवार की विधिक क्षमता, निर्णय-लेखन, सत्यनिष्ठा और संवैधानिक दृष्टि किस प्रकार श्रेष्ठ पाई गई। कारण प्रकाशित न होने पर योग्य उम्मीदवार यह नहीं समझ पाता कि उसे क्यों छोड़ा गया और आम जनता के मन में यह आशंका बनी रहती है कि कहीं चयन में व्यक्तिगत प्राथमिकताओं ने तो भूमिका नहीं निभाई।
न्यायपालिका की गरिमा
न्यायपालिका की गरिमा केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मानदंडों से भी जुड़ी है। भारत इस विषय मंे जिस ’सिविल और राजनीतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा’ का हस्ताक्षरकर्ता है, उसके अनुच्छेद 14 (1) के अनुसार न्यायालयों और अधिकरणों के समक्ष सभी व्यक्ति समान होंगे तथा उनके विरुद्ध किसी आपराधिक आरोप के निर्धारण या अधिकारों के संबंध में प्रत्येक व्यक्ति को एक सक्षम, स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकरण द्वारा निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। इस संबंध में ‘बंगलौर प्रिंसिपल ऑफ ज्यूडिशियल कंडक्ट (2002)’ यह दस्तावेज दुनिया भर के जजों के लिए आचरण के मानक तय करता है। इसके अनुसार न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, शालीनता, समानता, दक्षता और परिश्रम ही एक आदर्श न्यायाधीश की आधारशिला हैं।
‘न्यायिक नैतिकता और चयन प्रक्रिया का सीधा संबंध’
एक न्यायाधीश की योग्यता केवल किताबों के कानून का ज्ञान नहीं है। उसमें निष्पक्षता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, विनम्रता, संवैधानिक निष्ठा और भाषा की शालीनता भी होनी चाहिए। न्यायाधीश द्वारा दिया गया कोई भी अनुचित या असंयत वक्तव्य केवल उसकी व्यक्तिगत छवि को ठेस नहीं पहुंचाता, बल्कि पूरी न्यायपालिका की साख को प्रभावित करता है। न्यायमूर्ति भुइयां ने इसी संदर्भ में रेखांकित किया है कि अपारदर्शी नियुक्तियों के कारण कई बार ऐसे व्यक्ति भी न्यायपालिका के ऊंचे पदों तक पहुंच सकते हैं, जो बाद में संस्था की गरिमा के अनुकूल आचरण नहीं कर पाते।
विविधता, एनजेएसी प्रयोग और संतुलित पारदर्शिता
प्रतियोगी और योग्यता-आधारित चयन के जरिए जिला न्यायपालिका में बड़ी संख्या में महिलाएं आती हैं, लेकिन कोलेजियम के बंद कमरे वाले मूल्यांकन के कारण उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने वाली महिलाओं और वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व काफी कम रह जाता है। कोलेजियम की कमियों को दूर करने के लिए लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (छश्र।ब्) को 2015 में अदालत ने खारिज कर दिया था, क्योंकि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध था। जबकि वह संसद के दोनों सदनों एवं राज्यों की विधान सभाओं द्वारा अनुशंसित था। न्यायिक नियुक्तियों में संवेदनशील और गोपनीय शिकायतों को सुरक्षित रखते हुए, चयनित उम्मीदवार की सकारात्मक योग्यताओं, पेशेवर उपलब्धियों और निर्णयों की गुणवत्ता का संक्षिप्त सार सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
आत्मसुधार का अवसर
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी को न्यायपालिका पर किसी बाहरी आक्रमण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह संस्था के भीतर से आई एक परिपक्व और आत्ममंथन भरी आवाज है। स्वतंत्रता न्यायपालिका को बाहरी दबावों से बचाती है, जबकि पारदर्शिता उसे आंतरिक मनमानी से सुरक्षित रखती है।
अंततः न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूंजी जनता का अटूट विश्वास है। यह विश्वास तभी बना रह सकता है जब जजों की नियुक्ति प्रक्रिया केवल निष्पक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता को निष्पक्ष दिखाई भी दे। जो न्यायपालिका देश के हर प्रशासनिक अंग से पारदर्शी आदेश और कारण की मांग करती है, उसे अपने सबसे बड़े फैसलों में भी कारण बताने का नैतिक साहस दिखाना होगा। यही प्राचीन भारतीय न्याय बोध, अंतरराष्ट्रीय मानक, आधुनिक संवैधानिकता और लोकतांत्रिक जन विश्वास का सबसे सुंदर संगम होगा।
















