मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भी मान लिया है कि भोजशाला मां वाग्देवी का मंदिर है। कोर्ट ने प्रमाणिक हिंदू आस्था पर मुहर लगाई है। शिक्षा की बात करें तो तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय के बाद धारानगरी यानी भोजशाला का उल्लेख होता है। अब मां वाग्देवी की मूर्ति को वापस लंदन से लाने की बात हो रही है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी कहा है कि वह विधिसम्मत तरीके से माता की प्रतिमा वापस भोजशाला लाएंगे।
तक्षशिला और नालंदा जैसी वैभवशाली धारानगरी: राजा भोज और माँ सरस्वती की कथा
भोजशाला के बारे में अनेक विद्वानों का कहना है कि देवी सरस्वती इसी स्थान पर वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थीं। मां सरस्वती की विशेष कृपा से राजा भोज चौंसठ कलाओं में निपुण थे। उन्होंने 84 ग्रंथों की रचना की। राजा भोज की साधना से प्रसन्न होकर देवी सरस्वती ने उन्हें दर्शन दिए थे।
सरस्वती के प्रकाट्य स्थल पर राजा भोज ने देवी के उसी स्वरूप को स्थापित किया, जिस रूप में देवी ने दर्शन दिए थे।
खिलजी का आक्रमण और लंदन पहुंची माँ वाग्देवी की प्रतिमा: डॉ. वाकणकर की खोज
राजा भोज ने अपने शासनकाल 1010-1055 ई. के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया। 1464 में मोहम्मद खिलजी ने धारानगरी पर आक्रमण कर भोजशाला को नष्ट कर मां वाग्देवी की प्रतिमा को खंडित कर परिसर से बाहर कर दिया। 1875 में खुदाई के दौरान मां वाग्देवी की मूर्ति मिली, जो अभी लंदन में है। इसकी पुष्टि इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1961 में अपनी लंदन यात्रा के दौरान की थी।
साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और भोजशाला का अनोखा संबंध
18-19 फरवरी, 2003 को भोजशाला आंदोलन में तीन कार्यकर्ताओं का बलिदान हुआ था। फलस्वरूप 8 अप्रैल, 2003 को हिंदुओं को पूजन-दर्शन का अधिकार प्राप्त हुआ। यह भी बता दें कि 1960 से साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार के चिन्ह को भोजशाला की मां वाग्देवी से लिया गया है।














