भोजशाला का सच: लंदन में डॉ. वाकणकर ने पहचानी मां 'वाग्देवी की मूर्ति'; ज्ञानपीठ पुरस्कार का चिह्न भी इसी से प्रेरित
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भोजशाला का सच: लंदन में डॉ. वाकणकर ने पहचानी मां ‘वाग्देवी की मूर्ति’; ज्ञानपीठ पुरस्कार का चिह्न भी इसी से प्रेरित

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद धार की भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। जानिए इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन में माँ वाग्देवी की प्रतिमा को कैसे पहचाना और इस धरोहर का ज्ञानपीठ पुरस्कार के चिह्न से क्या संबंध है।

Written byShivam DixitShivam Dixit
May 16, 2026, 09:48 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, मध्य प्रदेश
Dhar Bhojshala Madhya Pradesh and Maa Vagdevi Saraswati Statue in London British Museum

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भी मान लिया है कि भोजशाला मां वाग्देवी का मंदिर है। कोर्ट ने प्रमाणिक हिंदू आस्था पर मुहर लगाई है। शिक्षा की बात करें तो तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय के बाद धारानगरी यानी भोजशाला का उल्लेख होता है। अब मां वाग्देवी की मूर्ति को वापस लंदन से लाने की बात हो रही है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी कहा है कि वह विधिसम्मत तरीके से माता की प्रतिमा वापस भोजशाला लाएंगे।

तक्षशिला और नालंदा जैसी वैभवशाली धारानगरी: राजा भोज और माँ सरस्वती की कथा

भोजशाला के बारे में अनेक विद्वानों का कहना है कि देवी सरस्वती इसी स्थान पर वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थीं। मां सरस्वती की विशेष कृपा से राजा भोज चौंसठ कलाओं में निपुण थे। उन्होंने 84 ग्रंथों की रचना की। राजा भोज की साधना से प्रसन्न होकर देवी सरस्वती ने उन्हें दर्शन दिए थे।

सरस्वती के प्रकाट्य स्थल पर राजा भोज ने देवी के उसी स्वरूप को स्थापित किया, जिस रूप में देवी ने दर्शन दिए थे।

खिलजी का आक्रमण और लंदन पहुंची माँ वाग्देवी की प्रतिमा: डॉ. वाकणकर की खोज

राजा भोज ने अपने शासनकाल 1010-1055 ई. के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया। 1464 में मोहम्मद खिलजी ने धारानगरी पर आक्रमण कर भोजशाला को नष्ट कर मां वाग्देवी की प्रतिमा को खंडित कर परिसर से बाहर कर दिया। 1875 में खुदाई के दौरान मां वाग्देवी की मूर्ति मिली, जो अभी लंदन में है। इसकी पुष्टि इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1961 में अपनी लंदन यात्रा के दौरान की थी।

साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और भोजशाला का अनोखा संबंध

18-19 फरवरी, 2003 को भोजशाला आंदोलन में तीन कार्यकर्ताओं का बलिदान हुआ था। फलस्वरूप 8 अप्रैल, 2003 को हिंदुओं को पूजन-दर्शन का अधिकार प्राप्त हुआ। यह भी बता दें कि 1960 से साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार के चिन्ह को भोजशाला की मां वाग्देवी से लिया गया है।

(इनपुट – अमित राव परमार का पूर्व में प्रकाशित लेख)

Topics: Raja Bhoj HistoryDhar Bhojshala caseMaa Vagdevi Statue LondonDr Vishnu Sridhar WakankarGyanpith Award SymbolMadhya Pradesh High Court VerdictMohan Yadav Bhojshala
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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