भारत विभाजन : वह त्रासदी, जिसे याद करते ही आज भी हृदय चीत्कार उठता है!
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होम भारत

भारत विभाजन : वह त्रासदी, जिसे याद करते ही आज भी हृदय चीत्कार उठता है!

1947 का भारत विभाजन उन लाखों परिवारों की सामूहिक स्मृति में आज भी गहरी टीस लिए हुआ घाव है, जिसे याद करते ही हृदय चीत्कार उठता है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Aug 14, 2026, 08:29 am IST
inभारत
भारत के विभाजन के दौरान भारत आ रही एक ट्रेन (फाइल फोटो)

भारत के विभाजन के दौरान भारत आ रही एक ट्रेन (फाइल फोटो)

वे बूढ़ी आंखें आज भी जब बंद होती हैं, तो उनमें अपना घर दिखाई देता है। आंगन में खेलते बच्चे, दरवाजे पर खड़ी मां और वह गली, जहां पड़ोसी धर्म रिश्तों से पहचाने जाते थे, मगर स्मृति की अगली तस्वीर आते ही सब कुछ बदल जाता है; भागते लोगों का काफिला, चीखती भीड़, जलते मकान और वह ट्रेन, जिसमें यात्रियों से ज्यादा मौतें पहुंची थीं। घर पीछे छूट गया, शहर पराया हो गया और नक्शे पर खिंची एक रेखा ने पूरी जिंदगी की पहचान बदल दी। इस्‍लामिक जिहादी सोच ने उनसे वह सब कुछ छीन लिया जो कल तक उनका अपना था, जिसके लिए कई पीढ़‍ियों का संघर्ष था, सामूहिक प्रयास था, अपना घर, अपना द्वार, अपने लोग वे अब बहुत पराए हो चुके थे।

1947 का भारत विभाजन उन लाखों परिवारों की सामूहिक स्मृति में आज भी गहरी टीस लिए हुआ घाव है, जिसे याद करते ही हृदय चीत्कार उठता है। आजादी का सूरज निकला जरूर था, पर उसी सुबह लाखों घरों में विस्थापन, भय और बिछोह का अंधेरा भी लेकर आया। यह इतिहास का सबसे बड़ा मानव विस्थापन था। लगभग 1.5 करोड़ लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। लोग अपने ही पुश्तैनी घरों में विदेशी और शरणार्थी बन गए।विभाजन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में, खासकर पंजाब और बंगाल में भयानक दंगे भड़क उठे।हिंसा में लगभग 5 लाख से 20 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई।लाखों महिलाओं को अगवा किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ और अमानवीय अत्याचार किए गए।

लोग अपनी जमीन, मकान, दुकानें और जमा-पूंजी छोड़कर खाली हाथ भागने पर मजबूर हुए।भगदड़ और हिंसा के बीच हजारों परिवार हमेशा के लिए एक-दूसरे से बिछड़ गए।सर रेडक्लिफ ने बिना जमीनी हकीकत जाने जल्दबाजी में नक्शे पर लकीर खींच दी (रेडक्लिफ लाइन), जिससे कई गांव और घर बीच से बंट गए। ऐसे में ये भारत का विभाजन दर्दनाक बंटवारा था। इसकी टीस और जख्म आज भी दोनों देशों के इतिहास और लोगों के दिलों में मौजूद हैं। भारत सरकार हर साल 14 अगस्त को इसी दर्द को याद करने के लिए ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाती है।

जिन लोगों के लिए उनका गांव ही संसार था, उनके लिए अचानक वही गांव दूसरे देश का हिस्सा बन गया। जिस खेत में पीढ़ियां काम करती आई थीं, वह पीछे छूट गया। जिस दुकान से परिवार का जीवन चलता था, उसका शटर अंतिम बार गिरा और फिर कभी नहीं खुला। विभाजन की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि करोड़ों लोगों के भविष्य का फैसला एक ऐसी सीमा-रेखा से हुआ, जिसे खींचने की प्रक्रिया अत्यंत कम समय में पूरी की गई। सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत-पाकिस्तान सीमा निर्धारण का दायित्व दिया गया। पंजाब और बंगाल में खींची गई रेडक्लिफ रेखा ने गांवों, खेतों, परिवारों और सामाजिक संबंधों को दो देशों में बांट दिया।

इस संदर्भ में हो. वे. शेषाद्री की पुस्तक ‘और देश बट गया’ विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक 27 अध्यायों में स्वाधीनता संघर्ष, मुस्लिम अलगाववाद, द्विराष्ट्र सिद्धांत, कांग्रेस की नीतियों, खिलाफत आंदोलन, जिन्ना के राजनीतिक उभार, प्रत्यक्ष कार्रवाई और अंततः विभाजन की स्वीकृति तक की घटनाओं का विश्लेषण करती है।शेषाद्री ने जिन्ना के आरंभिक राष्ट्रवादी राजनीतिक व्यक्तित्व से लेकर मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता और पाकिस्तान की मांग के केंद्रीय चेहरे तक के परिवर्तन का उल्लेख किया है।

1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद अलग राष्ट्र की मांग अधिक स्पष्ट राजनीतिक रूप में सामने आई। 1946 की प्रत्यक्ष कार्रवाई और उसके बाद भड़की हिंसा ने राजनीतिक अविश्वास को सामाजिक हिंसा में बदलने का काम किया। बातचीत का स्थान दबाव ने लिया और राजनीतिक मतभेदों की कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ी।

जब पड़ोसी अचानक अजनबी हो गए

विभाजन का सबसे गहरा घाव था सामाजिक विश्वास का टूटना। पंजाब, सिंध और बंगाल के अनेक हिस्सों में धार्मिक पहचान जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन गई। अमृतसर, लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, कोलकाता और नोआखली सहित अनेक क्षेत्र हिंसा से झुलस उठे। कल तक जो पड़ोसी एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे, अचानक एक-दूसरे से भयभीत होने लगे। नाम पूछा जाने लगा। धर्म पूछा जाने लगा और फिर यह तय होने लगा कि कौन अपना है और कौन पराया। यहीं विभाजन की असली त्रासदी दिखाई देती है।

ट्रेनें, जो यात्रियों के बजाय लाशें लेकर पहुंचीं

विभाजन की स्मृतियों में रेलगाड़ियां एक भयावह प्रतीक बनकर उभरीं। लाखों लोग रेलों के माध्यम से सीमा पार कर रहे थे। पर जब कई ट्रेनें अपने गंतव्य तक पहुंचीं तो उनमें जीवन नहीं, मृत्यु थी। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ में मनो माजरा के माध्यम से विभाजनकालीन पंजाब की बदलती मनः स्थिति को मार्मिक रूप से सामने रखा गया है। विभाजन की त्रासदी का सबसे दर्दनाक अध्याय महिलाओं की पीड़ा है। अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन, परिवारों से बिछुड़ना और ‘इज्जत’ के नाम पर हिंसाइन घटनाओं ने हजारों महिलाओं का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। इस्‍लामिक हिंसा, जिहादी अपनी जितनी हद पार कर सकते थे, वह सभी कुछ इस दौर में होता हुआ देखा गया।

डेढ़ करोड़ विस्थापित

भारत की सीमा में पहुंचना भी विस्थापित परिवारों की त्रासदी का अंत नहीं था। कल तक जिसके पास घर था, वह अब शरणार्थी शिविर में था। जिसके पास खेत था, वह राशन की कतार में खड़ा था। जिसके पास कारोबार था, उसके सामने रोजगार का संकट था। दिल्ली और अन्य स्थानों पर शरणार्थी शिविरों में लोगों ने नए जीवन की शुरुआत की, मगर यही वह मोड़ था, जहां विभाजन की कहानी केवल पीड़ा की कहानी नहीं रही। उजड़े लोगों ने अपने हाथों से फिर संसार खड़ा किया। दुकानें खोलीं, कारोबार शुरू किए, उद्योग खड़े किए और बच्चों को शिक्षा दिलाई। विभाजन ने उनसे घर छीना, लेकिन घर बनाने की इच्छा नहीं छीन सका।इस अर्थ में शरणार्थियों की कहानी भारतीय समाज की अदम्य जीवटता की कहानी भी है।

एक गठरी में बचा पूरा संसार

विस्थापित लोगों के पास सामान कम था, स्मृतियां बहुत थीं। किसी के पास पुराने घर की चाबी थी। किसी के पास पुश्तैनी दस्तावेज। किसी के पास परिवार की तस्वीर। किसी ने घर की मिट्टी संभालकर रख ली। किसी के पास केवल अपने गांव का नाम बचा था। आर्थिक दृष्टि से इन चीजों का मूल्य शायद बहुत कम था, लेकिन भावनात्मक दृष्टि से वही उनका पूरा संसार थीं।

साहित्य ने इतिहास की चीख को शब्द दिए

इतिहास तारीखें दर्ज करता है, साहित्य दर्द दर्ज करता है। सआदत हसन मंटो की ‘टोबा टेक सिंह’ विभाजन की सबसे तीखी मानवीय व्याख्याओं में गिनी जाती है। बिशन सिंह का प्रश्न, वतन आखिर कहां है ? विभाजन से विस्थापित व्यक्ति की पहचान के संकट का प्रतीक बन जाता है।

भीष्म साहनी का ‘तमस’ बताता है कि सांप्रदायिक उन्माद किस तरह सामान्य समाज को हिंसा में धकेल सकता है। अफवाह, उकसावा और राजनीतिक स्वार्थ मिलकर वर्षों के सामाजिक विश्वास को नष्ट कर सकते हैं। क्या विभाजन टाला जा सकता था? यह इतिहास का सबसे कठिन प्रश्न है।

राष्‍ट्रीय चेतना के प्रखर लेखक हो. वे. शेषाद्री की ‘और देश बट गया’ में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या विभाजन अनिवार्य था। पुस्तक की दृष्टि से राष्ट्रीय नेतृत्व की राजनीतिक दृढ़ता और निर्णयों को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है, किंतु इस प्रश्न का कोई एक निर्विवाद उत्तर नहीं है। इतिहासकार ब्रिटिश सत्ता के शीघ्र हस्तांतरण, सांप्रदायिक हिंसा, मुस्लिम लीग की राजनीतिक मांग, कांग्रेस की परिस्थितियों और प्रशासनिक संकट जैसे अनेक कारणों को सामने रखते हैं। जिसमें कि एक निष्कर्ष निर्विवाद है कि विभाजन की कीमत बहुत बड़ी थी और उसका सबसे बड़ा बोझ आम मनुष्य ने उठाया।

स्मृति क्यों जरूरी है?

दरअसल, केंद्र की मोदी (भारत) सरकार का 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” के रूप में याद किया जाना इसी सामूहिक स्मृति को जीवित रखने का प्रयास है। इसका उद्देश्य उन लोगों को स्मरण करना है जिन्होंने विभाजन की भयावह कीमत चुकाई। इन तमाम स्मृतियों को संजोने का अर्थ ह्दय की चेतना और संवेदना है, क्योंकि इतिहास को भूलना यानी अतीत को खोने और उससे सबक न लेते हुए भविष्य के लिए चेतावनी भी है।

एक पीढ़ी ने खोया, दूसरी ने उसकी कहानी संभाली

आज 1947 की प्रत्यक्ष पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है, मगर उनकी कहानियां अभी भी परिवारों में जीवित हैं। किसी पुराने संदूक में घर की चाबी है। किसी तस्वीर में एक घर है। किसी बुजुर्ग की स्मृति में एक गली है। किसी परिवार की कथा में एक छूटा हुआ शहर है।किसी पीले पड़ चुके कागज पर लाहौर का पता है। किसी बुजुर्ग की जुबान पर सिंध के गांव का नाम है। किसी परिवार की स्मृति में वह ट्रेन आज भी चल रही है, जिसमें उनके अपने लोग सवार हुए थे और कभी लौटकर नहीं आए। यही विभाजन की सबसे लंबी यात्रा; स्मृति की यात्रा है।

भले ही नई पीढ़ी ने वह इस्‍लामिक जिहादी विभाजन की हिंसा अपनी आंखों से नहीं देखी है, लेकिन उसने अपने दादा-दादी की आंखों में उसका असर देखा है। यही कारण है कि विभाजन सिर्फ किताबों में नहीं है; वह हजारों परिवारों की मौखिक परंपरा में भी जीवित है।

भारत विभाजन को याद करना इसलिए जरूरी है कि इतिहास सिर्फ यह न बताए कि 1947 में दो देश बने; वह यह भी बताए कि उस राजनीतिक निर्णय के बीच कितने मनुष्य टूटे, कितने परिवार उजड़े और कितनी पीढ़ियों ने अपने भीतर एक खोया हुआ घर संभालकर रखा।

मध्‍य प्रदेश के मुरैना शहर में रह रहे प्रीतम दास चावला ने जब यह कहा- एक मां की आवाज सुनाई देती है; “बच्चों का हाथ मत छोड़ना… पीछे मत देखना।” पर पीछे देखने पर आज भी वही घर दिखाई देता है। वही चौखट। वही आंगन। वही मिट्टी और एक ऐसा दर्द, जिसे समय भी कभी मिटा नहीं सकता, जब वे अपनी कहानी सुना रहे थे, तब उनकी आंखों में आंसू की धारा बह निकली थी, और उनके सामने बैठा एक लेखक भी उस भाव धारा में ह चला था जो विभाजन विभीषिका से जुड़ी हैं, आंसू फिर दोनों ओर बराबर से थे, एक कल की पीढ़ी है, जिसके जीवन का यह भोगा हुआ यर्थाथ है और एक आज 2026 में बैठी पीढ़ी है जो यह महसूस करती है कि काश; कभी भारत-पाकि‍स्‍तान का विभाजन नहीं हुआ होता!
(लेखक केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

Topics: भारत का विभाजनविभाजन विभीषिकाभारत का बंटवारा1947 का बंटवारा
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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