तीर्थराज प्रयाग, गंगा, यमुना सरस्वती तीन सरिताओं का संगम। पुराणों के अनुसार जो प्रयाग का दर्शन करके उसका नाम उच्चारण करता है वह पाप मुक्त हो जाता है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार यहां ध्यान और कल्पवास करने से मनुष्य स्वर्ग लोक का अधिकारी हो जाता है। संगम, जहां गंगा की धवल धारा और यमुना का गहरा नीला जल एक दूसरे में मिलते हैं।
करोड़ों श्रद्धालु यहां आस्था की डुबकी लगाते हैं, तो केवल वे दो नदियों को देखते हैं लेकिन विश्वास तीन नदियों का करते हैं। यह तीसरी नदी है सरस्वती, अदृश्य, अनसुनी फिर भी भारतीय आत्मा और स्मृति में जीवंत। सदियों से यह प्रश्न मानव मन को विचलित करता रहा है, यदि सरस्वती नहीं है तो भारत की स्मृति में वह इतनी गहराई से क्यों बहती है ? आखिर वह कहां चली गई?
क्या है पौराणिक मान्यता
लोक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं में ऐसी कथा प्रचलित है कि जब वेदव्यास जी महाभारत की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने गणेश जी से इसे लिखने का आग्रह किया और तय हुआ कि गणेश जी प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझकर लिखेंगे, लेकिन सरस्वती नदी का प्रवाह अत्यंत तीव्र और गर्जना युक्त था, तब महाभारत लेखन में बाधा उत्पन्न होने लगी। सरस्वती से शांत होने का अनुरोध किया गया लेकिन वह शांत नहीं हुई तब उन्हें अदृश्य या भूमिगत होने का श्राप मिला है।
विज्ञान ने भारतीय स्मृति के मौन को सुना
यह केवल लोक कथा नहीं है , यह स्मृति है, संस्कृति है, आस्था है, और आज पहली बार आधुनिक विज्ञान ने भारतीय स्मृति के उस मौन को सुन लिया है। CSIR-NGRI और नमामि गंगे कार्यक्रम की संयुक्त पहल ने प्रयागराज क्षेत्र में भूमिगत प्राचीन नदी-तंत्र को लेकर एक ऐतिहासिक संभावना प्रस्तुत की है। हैदराबाद स्थित CSIR-National Geophysical Research Institute (CSIR-NGRI) के वैज्ञानिकों ने गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में एक लगभग 45 किलोमीटर लंबी प्राचीन दबी हुई नदी (पैलियो-रिवर) का पता लगाया। यह खोज उच्च-रिज़ॉल्यूशन एयरबोर्न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे, ड्रिलिंग और भू-जल अध्ययन के आधार पर की गई। जिस सरस्वती को हजारों वर्षों से हम स्मरण कर रहे थे, मन में भाव लेकर डुबकी ले रहे थे उसकी भूगर्भीय वास्तविकता सचमुच मौजूद हो सकती है।
ये है खोजी गई नदी
वैज्ञानिकों ने जो प्राचीन नदी खोजी है, वह साधारण जलधारा नहीं है। यह लगभग 200 किलोमीटर लंबी है, चार से पांच किलोमीटर चौड़ी और 10 से 15 मीटर नीचे दबी हुई नदी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह नदी प्रयागराज से कौशांबी फतेहपुर और कानपुर के बिल्हौर गजनेर क्षेत्र तक फैली हुई है। फतेहपुर के खागा क्षेत्र में इसकी दो विशाल शाखाएं मिलीं। एक शाखा बिल्हौर की ओर जाती है और दूसरी गजनेर की ओर जाती है। यह कोई सूखी धारा नहीं है। इसके भीतर आज विशाल जलभृत (aqifier) मौजूद है। शोधकर्ताओं ने यह भी संकेत दिया कि यह नदी हिमालय की दिशा तक विस्तारित हो सकती है और गंगा-यमुना प्रणाली से भूगर्भीय रूप से जुड़ी हुई है।
आधुनिक भू भौतिकी की तकनीक का उपयोग
यह खोज किसी साधारण सर्वेक्षण से नहीं हुई है। इसमें धरती के भीतर छिपी इस नदी को खोजने के लिए आधुनिक भू भौतिकी की तकनीक का उपयोग किया है। हेली बोर्न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे में हेलीकॉप्टर के नीचे विशेष सेंसर लगाए गए, यह सेंसर धरती के भीतर विद्युत चालकता मापते हैं , जहां भूमिगत जल या पुरानी नदी धाराएं होती हैं वहां मिट्टी चट्टानों का व्यवहार अलग होता है। इन्हीं संकेतों के आधार पर सरफेस रिवर मैपिंग की।
3D भूगर्भी मैपिंग वैज्ञानिकों ने पूरे क्षेत्र का 3D मॉडल तैयार किया, जिससे पता चला कि यह केवल स्थानीय जलधारा नहीं है बल्कि गंगा और यमुना के समांतर बहने वाली स्वतंत्र नदी प्रणाली है। ड्रिलिंग और भूजल परीक्षण के तहत वैज्ञानिकों ने ड्रिलिंग कर मिट्टी और जलभृतों का प्रत्यक्ष परीक्षण भी किया। डॉक्टर सुभाष चंद्र ने स्पष्ट कहा कि इसकी भौतिक उपस्थित पूरी तरह प्रमाणित हो चुकी है इसमें कोई संदेह नहीं है।
वहां मिली, जहां प्राचीन सरस्वती नदी का उल्लेख
सबसे महत्वपूर्ण बात हमें यह समझनी चाहिए कि वैज्ञानिकों ने इसे अभी तक सरस्वती नदी घोषित नहीं किया है, लेकिन वह स्वीकारते हैं कि नदी उसी भूभाग में मिली है जहां प्राचीन सरस्वती नदी का उल्लेख है। इसका आकार गंगा-यमुना के समान है। यह एक स्वतंत्र नदी तंत्र थी। कुल मिलाकर यह खोज सरस्वती संबंधी परंपरागत विश्वासों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करती है और बताती है कि भारतीय संस्कृत में लोक परंपरा, स्मृति और विश्वास केवल कल्पनाएं नहीं होते हैं। आज धर्म और विज्ञान एक दूसरे का विरोध नहीं बल्कि एक दूसरे से संवाद करते हैं। प्रयागराज में स्थित सरस्वती कूप सदियों से श्रद्धा का केंद्र बना रहा है, आज जब वैज्ञानिक भूमिगत जलधारा पहले और चैनलों की पुष्टि कर रहे तो अब सरस्वती कूप केवल प्रतिक नहीं बल्कि एक चेतना युक्त धारा बन गया है।
भूजल स्तर सुधरेगा
प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर, कानपुर के नीचे नीचे मिली विशाल भूमिगत प्राचीन नदी भारत की सभ्यागत स्मृति, भविष्य की जल सुरक्षा, दोनों से से जुड़ी हुई घटना हो सकती है। भारत के गंगा के मैदान में भूजल स्तर बड़ी तेजी से गिर रहा है, खेती संकट में है, भविष्य में जल संघर्ष का केंद्र बिंदु बन सकता है। ऐसे समय में जो भूमिगत पेलिओ चैनल खोजा है वह भूजल स्तर बढ़ा सकता है, सूखे क्षेत्र को पानी मिल सकता है और लाखों लोगों को स्थाई जल स्रोत मिल सकता है। इस प्राप्त भूमिगत जल स्रोत से हम पूरे गंगा बेसिन का जल संतुलन सुधार सकते हैं, गर्मियों में नदी के प्रवाह को सुनिश्चित रख सकते हैं, नदी प्रदूषण को भी नियंत्रण रखने में सहायता मिल सकती है। इससे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा, सिंचाई आसान होगी, मानसून पर निर्भरता कम होगी। विशेषकर कौशांबी, फतेहपुर और कानपुर के क्षेत्र में बड़ा सकारात्मक प्रभाव होगा।
भारत की स्मृति और भविष्य की धारा
आज जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट बढ़ रहा है तो यह भूमिगत जलभृत प्राकृतिक वाटर बैंक की तरह काम करेगा। यह खोज केवल वैज्ञानिक नहीं बल्कि हमारे प्राचीन ग्रंथों महाभारत, पुराणों की प्रमाणिकता को मान्यता प्रदान करती है। इससे भारतीय सभ्यता के विकास ,संस्कृति और प्राचीन बसावटों को समझने में नई दिशा मिलेगी। औपनिवेशिक काल में अक्सर भारतीय ग्रंथों, परंपराओं को मिथक कहा जाता था लेकिन जब आधुनिक तकनीक ने आज उसी क्षेत्र में प्राचीन नदी खोज ली है, तो इससे भारतीय समाज का इतिहास और ज्ञान परंपरा पर विश्वास सुदृढ़ हो गया है। लेकिन इसमें सावधानी रखना भी जरूरी है क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी तक इस भूमिगत नदी को औपचारिक रूप से सरस्वती नदी घोषित नहीं किया है। इसलिए शोध जारी है और अंतिम निष्कर्ष अभी आना बाकी है। इसलिए हमें आस्था और विज्ञान दोनों का सम्मान रखते हुए संतुलित दृष्टि रखनी चाहिए।
इसलिए सरस्वती केवल अतीत की नदी नहीं भारत की स्मृति, उसकी संस्कृति। उसके भविष्य की भी धारा है।
















