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ऋग्वेद एवं सरस्वती क्षेत्र में कृषि तकनीक

ऋग्वेद में वर्णित कृषि तकनीक और कृषि के लिए प्रयोग की गई शब्दावली का उपयोग वर्तमान में भी सरस्वती क्षेत्र में किया जा रहा है। क्या वैदिक काल में प्रयोग किए गए कृषि यंत्र सरस्वती-सिंधु संस्कृति में भी प्रयोग हो रहे थे? यदि यह सही है तो हम यह सिद्ध करने में और आगे बढ़ जाएंगे कि वैदिक सभ्यता की निरंतरता ही तथाकथित हड़प्पा सभ्यता थी

Written byआचार्य मनमोहन शर्माआचार्य मनमोहन शर्मा
Jan 8, 2026, 03:49 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में अनेक प्रकार के ज्ञान और विज्ञान समाहित हैं। इसे हमारे पूर्वजों ने बहुत परिश्रम से सुरक्षित रखा है। इसका प्रमाण यह है कि सारे विश्व में पाए जाने वाले विशेषत: भारत की अनेक भाषाओं और लिपियों में उपलब्ध विभिन्न परंपराओं में ऋ ग्वेद की पाण्डुलिपियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। इसमें 10,552 मंत्र हैं। विभिन्न संस्करणों में 50 से भी कम मंत्रों का अंतर है। यह एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि अनेक प्रकार के वैज्ञानिक तथ्यों और तकनीक से परिपूर्ण ग्रंथ है। सरस्वती क्षेत्र अर्थात् सरस्वती नदी के भूगर्भित प्रवाहों के आसपास (लगभग सारे हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात) में कृषि की तकनीक और शब्दावली ऋग्वेद से मिलती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार सरस्वती का एक प्रवाह महाभारत युद्ध से पूर्व उत्तर प्रदेश की ओर जाकर प्रयागराज तक पहुंचता था। इसके पश्चात इसके अधिकतर प्रवाह हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में प्राप्त होते हैं। महाभारत एवं वामन पुराण में पाटन से कुरुक्षेत्र तक बलराम जी की यात्रा का विवरण मिलता है। उनकी यात्रा में वर्णित स्थानों पर आज भी पवित्र घाट प्राप्त होते हैं। सरस्वती नदी का प्रवाह फिरोजशाह तुगलक के समय तक प्रमाणित होता है। इसके पश्चात डच तथा ब्रिटिश मानचित्रों में भी यह नदी दिखाई गई है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. ए. आर. चौधरी के अनुसार, “हरियाणा में प्राप्त अधिकतर पुरा स्थल सरस्वती नदी के भूगत प्रवाहों के 500 मीटर के दायरे में आते हैं।”

ऋग्वेद में सरस्वती

भाषा के दृष्टिकोण से ‘सर’ का अर्थ तेज चलना, नदी तथा जलप्रपात होता है तथा सरस का अर्थ रस सहित या स्वाद सहित, प्रेम से परिपूर्ण तथा सुंदर होता है। अतः सरस्वती तेज चलने वाली मधुर जल से परिपूर्ण नदी है।
इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः।
पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः॥
जो सरस्वती नदी अपने बलवान वेग से पर्वत के तटों को कमलनाल की तरह तोड़ देती है हम उसकी पूजा करते हैं, वह हमारी रक्षा करे। इस प्रकार ऋ ग्वेद में सरस्वती को पूरे वेग से बहने वाली और पर्वतों को विखंडित करने वाली नदी बताया गया है, जिसके बहने पर गर्जन की आवाज निकलती थी। आदि बद्री में विशेष प्रकार की रेत और पत्थर मिलता है, जो उस क्षेत्र में कहीं नहीं है। केवल हिमालय के ऊपरी भागों में है। भूवैज्ञानिक अध्ययनों में सरस्वती नदी के पुरावाहिनियों के पास पाए गए तलछटों में हिमालय से प्राप्त होने वाले खनिज, जैसे इलाइट और क्लोराइट पाए गए हैं। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि ये तलछट हिमालयी स्रोत से आए हैं। अतः ये पत्थर भी सरस्वती नदी द्वारा बहा कर आदिबद्री तक लाए गए थे जैसा कि ऋग्वेद में विवरण मिलता है नदी का बहाव बहुत तेज था।

रस्सी का बना गोफण

कृषि उपकरण एवं शब्दावली

  • लांगल (हल) : ऋ ग्वेद (4.57, 10. 101) तथा अथर्ववेद के कृषि सूक्त (3.17) में हमें कृषि के बारे में बहुत सी बातों की जानकारी प्राप्त होती है। ऋ ग्वेद के अनुसार अश्विन देवताओं ने मनु को हल चलाना तथा जौ की खेती करना सिखाया। हल से जोतने के बाद भूमि में बीज डाला जाता था। आरंभ में हल लकड़ी का होता था जिसके अवशेष मिलना असंभव है, परंतु मिट्टी के हल के खिलौने अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। भूमि को जोतने के बाद बीज डाला जाता था। हल के लिए लांगल शब्द का प्रयोग होता था। हल चलाने के लिए दो या अधिक बैलों को जोता जाता था।
  • फाल (फाली,कुश) : हल का वह भाग, जो भूमि में प्रविष्ट होकर मिट्टी को उखड़ता है फाल कहा जाता है। ऋ ग्वेद में फाल को हल में जोड़ने के संदर्भ मिलते हैं और उसकी धार को तेज करने को कहा गया है। यह संदर्भ भी मिलते हैं कि बैलों को हल से मुक्त होने पर फाल हल के अंदर लगी रहती थी। इसका प्रयोग आधुनिक युग में भी किया जा रहा है और संपूर्ण सरस्वती क्षेत्र में इसे फाली कहते हैं। फाल के लिए वेदों में कहा गया है, ‘शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः।’ अर्थात् हल के नीचे लगी फाल खेत को भलीभांति जोतें, किसान बैलों के साथ खुशी से चलें। ऋ ग्वेद में बिल्व तथा उदुम्बर को फलदाय माना गया है। अतः आरंभ में कठोर होने के कारण इन्हीं की लकड़ी से फाल बनती रही होगी। इस विषय में यह भी उल्लेखनीय है कि सतलुज और व्यास नदियों के बीच के दोहा क्षेत्र में 1940 ई. तक लकड़ी की फाल के हल प्रयुक्त किए जाते थे। आर.एस. शर्मा के अनुसार बनारस क्षेत्र में आज भी अनुष्ठान रूप में लकड़ी की फाल से खेतों में रेखाएं खींची जाती हैं। यह हल चलाने से पहले होता है।
  • कुंशी : कुछ इतिहासकारों के अनुसार वैदिक काल में तीखी रेखा खींचने के लिए कुंशी नामक कठोर लकड़ी उपकरण का प्रयोग किया जाता था। कालांतर में हल की लौह निर्मित फाल के रूप में इस शब्द का प्रयोग होने लगा। कुंशी से कुश शब्द बन गया। आज भी हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोहे से निर्मित फाल को कुश कहा जाता है। यह लंबी या तिकोनी होती है। इस प्रकार के तांबे के औजार खुदाइयों में प्राप्त हुए हैं। अथर्ववेद तथा शतपथ ब्रह्मण में 6 से 24 बैलों के हल के संदर्भ मिलते हैं। अतः ऐसे हलों की फाल निश्चित ही लोहे से बनी होगी। कल्प सूत्रों तथा पाणिनी की अष्टाध्यायी में भी लोहे की फाल का उल्लेख मिलता है। तांबे की भट्ठियां बालू, फरमाना, कुणाल तथा जोगन खेड़ा से प्राप्त हुई। फरमाना से प्राप्त कुल्हाड़ी कालीबंगा, मोहनजोदड़ो और चहुजोदड़ो से मिली कुल्हाड़ी जैसी ही है। कुणाल से तांबे की मिश्र धातु भी मिली है।

सरस्वती स्थल से प्राप्त धातु निर्मित फाल

  • सीरी : हल के लिए सीर शब्द का भी प्रयोग वेदों में मिलता है। कुछ समय पूर्व तक हरियाणा में आपस में मिलकर खेती की जाती थी और सहायक व्यक्ति को सीरी कहा जाता था, क्योंकि वह हल चलाता था।
  • कुदाल : वैदिक काल में भूमि को खोदने के लिए एक यंत्र का प्रयोग किया जाता था जिसे खनित्र (ऋ ग्वेद 1.79.6) कहा जाता था। कालांतर में इसे कुदाल कहा जाने लगा। बोधायन धर्म सूत्र (3.2.2.3) में खुदाल का उल्लेख मिलता है और इसे चलाने वाले को खुदालक लिखा गया है। आज भी सरस्वती क्षेत्र में इसे कुदाल कहा जाता है। वर्तमान में यह लोहे का लंबा पिंड होता है जिसे हाथ में लेकर भूमि खोदी जाती है।
  • अष्ट्रा : हलों को चलाने के लिए हल चालक अष्ट्रा चाबुक का प्रयोग करते थे। इसे अब भी प्रयोग किया जाता है और इस क्षेत्र में अष्ट्रा की जगह सांट्टा कहा जाता है। वर्तमान काल में भी बैलों का हल चलाते समय इसका प्रयोग होता है।
  • युग, युज : हल में एक लंबा मोटा बांस बांधा जाता था, जिसे ईषा कहते थे। इसके ऊपर जूआ रखा जाता था, जो बैलों को आपस में जोड़ता था। इसे युग कहा जाता था। यह युज धातु से बना शब्द है जिसका अर्थ जोड़ना होता है। इसी जोड़ने से जूआ बन गया। गाड़ी तथा हल में जुते हुए बैलों के मिट्टी के खिलौने सरस्वती-सिंधु क्षेत्र में मिले हैं।
  • सिंचाई के साधन : वैदिक काल में सिंचाई के लिए कूप, नहर, तलाब का विवरण मिलता है। खेत में सिंचाई करते हुए किसान तथा नहर खोदने एवं उनके द्वारा सिंचाई की व्यवस्था आदि का उल्लेख प्राप्त होता है। ऋ ग्वेद के पर्जन्य सूक्त में वर्षा, कुएं या बावली का जल, झरनों का जल तथा समुद्र में गिरने वाली नदियों के जल का विवरण है।
    या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वा याः स्वयंजाः।
    समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु॥
    कुएं से जल निकालने के लिए चमस पात्र और मोटी रस्सी का उपयोग होता था और पानी को निकाल कर नाली के द्वारा खेतों में ले जाया जाता था। यह जल सिंचाई और पशुओं के पीने के काम आता था।

  • चमस पात्र : (चडस,कोश) यह चमड़े का होता था और उसकी सहायता से कुएं से पानी निकाल कर खेतों में दिया जाता था, जिसे स्थानीय भाषाओं में चडस कहा जाता है। वैदिक ग्रंथों में इसे चमस पात्र तथा कोश भी कहा गया है।
    प्राय: ऐसे खेत को, जिनकी सिंचाई कोश से कुएं में से जल निकाल कर होती थी, ‘कोशवाह’ कहा जाता था। राजस्थान के प्रतापगढ़ से मिले 17 जुलाई, 942 ईस्वी के एक अभिलेख में पलासिया गांव के उस खेत को ‘कोशवाह’ कहा गया है, जिसको इंद्रादित्य देव मंदिर के लिए भेंट किया गया था। इसका आशय है कि एक कोश के दिन भर में चलने से जितनी भूमि की सिंचाई हो जाए, वह कोसवाह कही जाती थी।
  • फसल रक्षण : पशुओं और पक्षियों को फसलों से भगाने के लिए गोफण गेंद (Sling balls) का प्रयोग किया जाता था। इसे सरस्वती क्षेत्र में अब गोफिया कहते हैं। यह वैदिक शब्द है। खुदाइयों में अनेक स्थानों पर इस प्रकार की गेंद मिली है। गोफण सबसे पहला उपकरण है, जिसकी सहायता से बल को दिशा और दूरी के अनुसार प्रयोग किया जाता था और वस्तुओं को दूर फेंक जा सकता था। यह रस्सी के दो टुकड़ों के बीच में रस्सी का बुना जाल होता है, जिसमें पत्थर रख कर जोर से घुमाने के बाद एक रस्सी छोड़ दी जाती है। इससे पत्थर या मिट्टी का ढेला बहुत दूर जाकर गिरता है। इससे चिड़िया, तोते और अन्य पक्षी, जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं उड़ जाते हैं। इससे किसान की पहुंच दूर तक हो जाती है जिससे कि वह जानवरों से अपनी फसल की रक्षा कर सकता है। यह आज भी प्रयोग होता है। इसे हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र में अब भी गोफिया ही कहते हैं।इसका प्रयोग महाराणा प्रताप की सेना के भीलों ने अकबर तथा महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज की सेना ने औरंगजेब की सेना में डर उत्पन्न करने के लिए पत्थर फेंक कर सफलतापूर्वक किया था। कृषक द्वारा ऊंची आवाज निकाल कर पक्षियों को उड़ाने का उल्लेख भी मिलता है जो अब भी किया जाता है। सायण ने लिखा है कि किसान पक्षियों की तरह आवाज निकालकर उन्हें खेतों से दूर भगाते हैं।
कृषि में काम आने वाले कुछ यंत्र

लावण (लामणी) अर्थात फसल काटना

फसलों को काटने के लिए लावण शब्द का प्रयोग किया गया है और वेदों में फसल काटने वाले को लवक कहा जाता था। आज भी सरस्वती क्षेत्र में फसल काटने को लामणी करना कहते हैं।

फसल काटने के लिए ‘दात्र’ का प्रयोग किया जाता था। यह हाथ का यंत्र था जिससे फसल काटी जाती थी। सायण ने इसका अर्थ करते हुए लिखा है- लवनं साधनम् दात्र मणि। यास्क के अनुसार उत्तर में जिसे ‘दात्र’ कहा जाता था पूर्व में उसी को दांती या दांत का जाता था। आज भी दो प्रकार के दांत प्रयोग होते हैं। एक में दांतें होते हैं जिससे गेहूं, मटर, धान, घास आदि काटी जाती है, दूसरा बिना दांत का अर्धचंद्र का होता है जिससे ईख और अरहर जैसे मोटे तने वाले पौधों को काटा जाता है। आज भी फसल काटने के इस यंत्र को दरांती कहा जाता है।

पर्ष (पूलः,पूलकः) : फसल को काटने के बाद उसके छोटे-छोटे गट्ठे बांधे जाते थे। इसके लिए वेद में पर्ष शब्द का प्रयोग किया गया है। कालांतर में संस्कृत साहित्य में पूलं तथा पूलकः शब्द मिलता है। वर्तमान काल में सरस्वती क्षेत्र में इसे पूली कहा जाता है।

ऊखल मूसल : अनाज को कूटकर खाद्य पदार्थ बनाने अथवा धान से चावल अलग करने के लिए आरंभ में पत्थर के ऊखल तथा लकड़ी के मूसल यंत्रों का प्रयोग किया जाता था, जो आज भी किया जा रहा है। अथर्ववेद 9.6.15 में हम इसका उल्लेख पाते हैं, जैसे उलूखल मुसलानि ग्रावाण एव ते।

अन्न भण्डारण : वैदिक काल में स्थिवि में अन्न का भंडारण किया जाता था। अन्न भंडारों में संग्रहित करने के लिए विविध प्रकार के कक्ष बनाए जाते थे। अन्न भंडार के लिए स्थिवि तथा कोष्ठागार शब्द आया है जिसका अपभ्रंश कुठला है। स्थिवि बड़े स्तर पर अन्न भंडारण के लिए प्रयोग किया गया शब्द है। मध्यकाल में सरस्वती क्षेत्र में घरों में अन्न भंडारण के लिए बुखारी शब्द का इस्तेमाल होने लगा। पुरातात्विक खोजों में सरस्वती सिंधु क्षेत्र में भी अन्न भंडार गृह प्राप्त हुए हैं।

कुंए से पानी निकालने का चमडे का पात्र (चमस या चडस )

कोष्ठ या कुसुला

हाथ से बनाए गए कच्ची मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तन कुसूला कहलाते थे। इनमें अधिकतर अनाज रखा जाता था। कुछ वर्ष पूर्व तक पूरे सरस्वती क्षेत्र में इनका प्रयोग किया जाता रहा है। इसे स्थानीय भाषाओं में कुठला कहते थे।

सरस्वती संस्कृति का प्रसार

शतपथ ब्राह्मण (14.1.10) में एक उल्लेख मिलता है कि विवेध माथव ने अग्नि के आदेश पर अपने गुरु गौतम राहुगण के साथ सरस्वती नदी के तट से अपने ब्राह्मण साथियों सहित प्रस्थान किया और मार्ग में स्थित जंगलों को जलाता हुआ सदानीरा नर्मदा के पार पहुंचा। वहां विदेह राज्य की स्थापना की और भूमि को कृषि योग्य बनाया। इस प्रकार हम देखते हैं कि समस्त सरस्वती क्षेत्र में पुरातत्व में कृषि संबंधी जो उपकरण पाए जाते हैं तथा आज भी कृषि संबंधित जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है वे शब्द और उपकरण वैदिक कालीन हैं। अतः स्पष्ट है कि वैदिक संस्कृति का विस्तार ही सरस्वती सिंधु संस्कृति था।

Topics: प्राचीन भारतीय संस्कृतिसरस्वती-सिंधु संस्कृतिप्राचीन वैदिक शब्दपाञ्चजन्य विशेषहड़प्पा सभ्यतासरस्वती नदीवैदिक सभ्यताआदिबद्री
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