कथित खोजी पत्रकार तरुण तेजपाल को दुष्कर्म के मामले में दस साल की सजा सुनाई गई है। हालांकि अभी उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए समय दिया गया है। लेकिन, इस पूरे केस की टाइमलाइन पर गौर किया जाए तो कई बातें उभरकर आती हैं। उनमें से एक है फेमिनिस्ट खेमे में चुप्पी!
ऐसा क्यों है कि तहलका के संपादक तरुण तेजपाल की इस सजा को लेकर कथित प्रगतिशील खेमे में कोई भी सकारात्मक हलचल नहीं है। क्यों इस सजा का स्वागत नहीं हो रहा है? क्यों यह नहीं कहा जा रहा कि बलात्कारी को सजा मिली तो बढ़िया हुआ? क्यों इस मामले पर इतना सन्नाटा है?
कौन हैं तरुण तेजपाल और क्या था मामला?
तहलका का नाम लिबरल वर्ग में बहुत ही गर्व से लिया जाता है। तरुण एक संपादक तो थे ही, उपन्यासकार भी थे और उनके संबंध अरुंधती रॉय से भी बहुत अच्छे थे। तरुण ने इसी आड़ में गोवा में हर साल Think Fest करवाना आरंभ किया। इसमें तमाम कथित लेफ्ट लिबरल्स का जमावड़ा होता था और विमर्श का यह मुख्य मंच बन गया था। ऐसा स्थापित किया जाने लगा कि यही मंच है, जिसके विचार इस पूरे देश में गूंजेंगे।
मगर साल 2013 में इसी फेस्ट में कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस लेफ्ट लिबरल खेमे की असलियत सामने ला दी। जिन मूल्यों की बात ये लोग करते थे, उन्हीं मूल्यों के खिलाफ खड़े वे लोग नजर आए। तहलका, जिसमें अन्याय से लड़ने की बात की जाती थी और पीडिताओं को न्याय दिलाने का दम भरा जाता था। नवंबर 2013 में एक पांच सितारा होटल में तहलका, तरुण तेजपाल और कथित लेफ्ट लिबरल की नैतिकता का लिबास उतर गया।
7-8 नवंबर 2013 को गोवा के एक पांच सितारा होटल में उसका थिंक फेस्ट आयोजित हो रहा था। इसी दौरान तरुण पर उन्हीं की एक कनिष्ठ सहकर्मी जो कि उनकी बेटी की सहेली भी थीं, ने लिफ्ट में छेड़छाड़ का आरोप लगाया। उस लड़की ने आरोप लगाया कि तरुण तेजपाल ने लिफ्ट के भीतर यौन उत्पीड़न किया। उसने तहलका की तत्कालीन प्रबंध संपादक शोमा चौधरी को ईमेल भेजा और पूरी घटना की लिखित रूप से शिकायत दर्ज कराई, मगर शोमा चौधरी ने कुछ भी कदम नहीं उठाया। बल्कि इस शिकायत के बाद उस लड़की के चरित्र हनन की शुरुआत हो गई। जैसे ही यह बात मीडिया में बाहर आई, वैसे ही सार्वजनिक और कानूनी प्रक्रियाएं आरंभ हुईं। मगर इस दौरान यह सवाल भी उठे कि आखिर कथित लेफ्ट लिबरल्स इस लड़की के लिए न्याय के लिए आगे क्यों नहीं आए?
22 नवंबर 2013 को गोवा में तरुण तेजपाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A (यौन उत्पीड़न), 376(2)(k) (पद का दुरुपयोग कर बलात्कार) और अन्य धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। तरुण को गिरफ्तार कर लिया गया।
तमाम सुनवाई के बाद वर्ष 2021 में गोवा की विशेष अदालत ने तरुण तेजपाल को बरी कर दिया क्योंकि अदालत को पीड़िता के बयान विरोधाभासी लगे। लेकिन वकीलों ने आरोप लगाए कि कैसे पीड़िता के साथ शुरुआत से ही अन्याय किया गया। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उसका चरित्र हनन करने का प्रयास किया गया कि वह सामान्य लग रही थी और साथ ही उसके अतीत के आधार पर उसे चरित्र हीन घोषित करने का प्रयास किया गया था।
इस पर भी लेफ्ट लिबरल और फेमिनिस्ट समुदाय एकदम मौन रहा, उस लड़की का चरित्रहनन हो रहा था, मगर कोई शोर नहीं था। विशेष अदालत के निर्णय के खिलाफ गोवा सरकार ने अपील करने का फैसला लिया था। मुंबई उच्च न्यायालय में मामले को ले जाया गया और अब उसका निर्णय आया कि तरुण छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न मामले में दोषी हैं।
सजा के बाद क्या बोले तरुण तेजपाल
सजा सुनाए जाने के बाद तरुण तेजपाल ने कहा कि वे वृद्ध हो रहे हैं, इसलिए उनपर रहम किया जाए। वे अब 62 साल के हैं और उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश हुई है। मुंबई उच्च न्यायालय ने उन्हें दस साल की सजा सुनाई है और आत्मसमर्पण और सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
सोशल मीडिया पर चुप्पी
यह और भी विरोधाभासी है कि इतनी बड़ी घटना पर महिलाओं के लिए लड़ने वाले संगठनों और फेमिनिस्ट में भी चुप्पी है। किसी ने भी आगे बढ़कर इस निर्णय का स्वागत नहीं किया। क्या समझा जाए कि उनके लिए अपना एजेंडा और उस एजेंडे को आगे लेकर जाने वाले ही वे लोग हैं, जिनके लिए वे आवाज उठाएंगी और न्याय का जश्न मनाएंगे? क्या न्याय का उत्सव मनाना भी अब एजेंडे और विचार के अंतर्गत ही आएगा कि किसी भी कथित लेफ्ट लिबरल को सजा मिलने पर सन्नाटा ही रहेगा? क्या उसकी पीड़ित महिला नहीं है?”
ये तमाम प्रश्न आज फेमिनिस्ट वर्गों और महिला पत्रकारों से हैं, जो एक महिला पत्रकार के साथ खड़ी नहीं हैं।















