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सीमाओं से परे सरस्वती

मां सरस्वती भारत में वेद ज्ञान, विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री हैं, वहीं जापान में ‘बेंटेन’ के रूप में वही शक्ति संगीत, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री बनकर पूजी जाती हैं

Written byआचार्य मनमोहन शर्माआचार्य मनमोहन शर्मा
May 8, 2026, 08:08 am IST
in विश्व, धर्म-संस्कृति
1.जापान में सरस्वती को स्वर्ण रथ में सवार राक्षस का वध करने वाली भी कहा जाता है, 2. टोक्यो के ललित कला विश्वविद्यालय में 1212 ई.की आठ भुजाओं वाली सरस्वती की एक पेंटिंग रखी हुई है 3. जापान के सात शुभ देवता, एबिसु, दाइकोकु (शिव, महाकाल), बेंज़ाइटन (सरस्वती), बिशामोंटेन (वैश्रवण या कुबेर), फुकुरोक्यू, होटेल जुरोजिन हैं।

1.जापान में सरस्वती को स्वर्ण रथ में सवार राक्षस का वध करने वाली भी कहा जाता है, 2. टोक्यो के ललित कला विश्वविद्यालय में 1212 ई.की आठ भुजाओं वाली सरस्वती की एक पेंटिंग रखी हुई है 3. जापान के सात शुभ देवता, एबिसु, दाइकोकु (शिव, महाकाल), बेंज़ाइटन (सरस्वती), बिशामोंटेन (वैश्रवण या कुबेर), फुकुरोक्यू, होटेल जुरोजिन हैं।

प्राचीन काल-दर्शन और उसकी संस्कृति एशिया के सभी भागों, अफ्रीका के कुछ भागों, अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में थी। इसी प्रक्रिया में जापान में भी इसका विस्तार हुआ। बहुदेववाद की समावेशिता जापानी और भारतीय संस्कृतियों को एकजुट करती है। भारतीय देवी-देवता निश्चित रूप से जापान और भारत के बीच धार्मिक संबंध सुदृढ़ करने में योगदान देते हैं। दोनों देशों की बहुदेववादी और समन्वयवादी प्रकृति में निहित गहरी समानता इन्हें प्राचीन काल से एक-दूसरे के निकट लाती रही है। इससे दोनों देशों के विचारक, लेखक और सामान्य नागरिक प्रभावित हैं।

प्राचीन जापान का शिंटो मत और हिंदू धर्म दोनों ही विभिन्न देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा को प्रोत्साहित करते हैं, जिन्हें एक अमूर्त दिव्य सिद्धांत की अभिव्यक्ति माना जाता है। दोनों देशों में प्राचीन संबंध होने के कारण अनेक भारतीय देवी-देवता कुछ रूपांतरण सहित जापान में पूजे जाते हैं। जापान में व्यापक रूप से पूजे जाने वाले प्रमुख हिंदू देवताओं में डाइकोकुटेन (महाकाल, शिव का एक रूप), बोंटेन (ब्रह्मा), डाइकोकुन्यो (काली), किचिजोटेन (लक्ष्मी), कांगिटेन (गणेश), ताइशाकुटेन (इंद्र), बिशामोंटेन (कुबेर), बेंजईटेन (सरस्वती), काटेन (अग्नि), हूटेन (वायु) और एम्मा-ओ (यम) शामिल हैं। हालांकि इन देवताओं का परिचय बौद्ध मत के माध्यम से हुआ, लेकिन इनमें से कई देवताओं को शिंटो मत में भी शामिल किया गया है, जो जापान में बौद्ध और शिंटो परंपराओं के समन्वय को दर्शाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर यामागुची हिरोइची के अनुसार, “आज जापान में लगभग 80,000 शिंटो मंदिर हैं और लगभग उतनी ही संख्या में बौद्ध मंदिर भी हैं।” प्राचीन जापान के इतिहास में वे पाते हैं कि शिंटो देवताओं को बुद्ध और अन्य बौद्ध देवताओं का अवतार माना जाता था। जापान में वैदिक देवताओं जैसे इंद्र, अग्नि, वरुण आदि की विशाल मूर्तियां बनाने की परंपरा है। हालांकि यह माना जाता है कि वैदिक देवताओं को बुद्ध के मंदिरों में संरक्षक देवताओं के रूप में स्थापित किया जाता है, लेकिन जापानी आध्यात्मिक यात्रा में सरस्वती, महादेवी, लक्ष्मी, गणेश और इंद्र आदि प्रमुख देवताओं की भूमिका है। देवी का स्थान सर्वोच्च शिंटो और बौद्ध दोनों ही मंदिरों में देवी सरस्वती का सर्वोच्च स्थान है।

भारत के साथ सांस्कृतिक संपर्क

दोनों देशों के सांस्कृतिक संपर्क बहुत पुराने हैं। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार अनेक भारतीय व्यक्तियों का विवरण मिलता है जो जापान गए। इनमें बोधिसेन सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए।

बोधिसेन : इनका जन्म भारत में भारद्वाज गोत्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे चीन गए और वू ताई शान पर्वत पर रहे, जहां उन्हें मंजुश्री बोधिसत्व से आध्यात्मिक प्रेरणा मिली। कई जापानी लोगों के अनुरोध पर, जो राजनयिक वार्ता और अध्ययन के लिए चीन में थे। बोधिसेन 736 ईस्वी में चीन से अन्य बौद्ध भिक्षुओं के साथ जापान आए। जापान के शाही परिवार ने उनका हार्दिक स्वागत किया और उन्हें प्रधान पुजारी (बरमोन) नियुक्त किया।

आंखें खोलने का समारोह

जापान में विशाल मूर्तियां बनवाना धार्मिक कार्य माना जाता था। शासक वर्ग इसे मुख्य रूप से राज्य की शक्ति और समर्थन के साधन के रूप में देखता था। जैसे कि दक्षिण भारत में विशाल गोपुरम बनवाना शक्ति और शौर्य का प्रतीक माना जाता था। तांग राजवंश ने पहले लुओयांग में एक विशाल लोचना बुद्ध प्रतिमा का निर्माण किया था। इसी भावना से प्रेरित होकर सम्राट शोमू ने 741 में नारा के तोदाईजी मंदिर में ब्रह्मांड के आदि बुद्ध, लोचना (वैरोचना) बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा (दैबुत्सु) के निर्माण का आदेश दिया। केगोन बौद्ध पंथ के अनुसार, सम्राट और राज्य, लोचना बुद्ध की सार्वभौमिक, परस्पर संबंधित व्यवस्था का भौतिक स्वरूप थे।

752 ई. में इस दैबुत्सु के लिए ‘नेत्र प्रतिष्ठा समारोह (काइगेन या काइगन)’ हुआ, जो एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन था, जिसमें महारानी कोकेन, सेवानिवृत्त सम्राट शोमू, महारानी कोम्यो और चीन तथा कोरिया के पाएकचे, कुदारा और सिला राज्यों के भिक्षुओं सहित 10,000 अतिथि शामिल हुए थे। इसके अलावा, 4,000 नर्तकों ने भी भाग लिया था। बौद्ध पंथ में भीड़ के सामने, किसी मूर्ति की आंखों को चित्रित करना उसकी ‘जागृति’ का प्रतीक है। वास्तव में, यह एक ऐसा अभिषेक है जो मूर्ति को आध्यात्मिक गुणों से संपन्न करता है, जिससे यह माना जाता है कि मूर्ति जीवित बुद्ध के समान हो जाती है।

यह भारत में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करने जैसा ही है। यहां मूर्ति को शीशा दिखाया जाता है। समारोह में दैबुत्सु की आंखों की पुतलियों में रंग भरने के लिए भारतीय भिक्षु बोधिसेन को चुना गया था। यह हमारे लिए गौरव का विषय है। आज भी बोधिसेन द्वारा प्रयोग की गई कंघी, समारोह के समय प्रयोग किए गए टेम्प्यो काल के कुछ परिधान, मुखौटे और अन्य बर्तन तोदाईजी के पास शोसोइन खजाने में संरक्षित हैं। 25 फरवरी 760 को दाइआन-जी में निधन के बाद उन्हें नारा में भू-समाधि दी गई थी। यह समाधि (कुयोटो) शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित रयोसेन-जी मंदिर के पीछे की पहाड़ी पर स्थित है। रयोसेन-जी की स्थापना उन्होंने स्वयं भारत के गिद्धकूट पर्वत की याद में की थी। इसके बाद अनेक विद्वान जापान गए।

जापान में मां शारदा

देवी सरस्वती, जिन्हें वैदिक काल से ही भारत में उच्च पूजनीय स्थान प्राप्त है, जापान में अत्यंत लोकप्रिय हैं। वहां उन्हें अनेक नामों से जाना जाता है जैसे बेंजाई-टेन (प्रतिभा और धन की देवी), बेंटेउ, बेंटेन (वाणी की देवी), समा, बेंज़ामिनी, म्यो-ओंगाकुतेन, मेओंगतेन, म्यो ऑन-तेन (मधुर स्वर वाली देवी), दाइबेन, दाई-बेंज़ाई-टेन (महान बुद्धि की देवी), दाई-बेंटेन्नो, बायो-टेन, कु-डोकू, मियो-ऑन-तेन्नियो आदि। कुछ विचारकों का मानना है कि जापान में बौद्ध मत जाने से सैकड़ों वर्ष पूर्व ही वहां सरस्वती सहित हिंदू देवी-देवताओं की मान्यता थी। दूसरी से पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी तक, चम्पा देश के हिंदू राजाओं का प्रशांत और हिंद महासागर के विशाल क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव था। चम्पा साम्राज्य में वर्तमान मध्य और दक्षिणी वियतनाम का अधिकांश भाग शामिल था। हिंदू धर्म इसी चम्पा साम्राज्य के माध्यम से जापान पहुंचा। जापान में सरस्वती के दो रूप हैं – सौम्य तथा रौद्र, जो भारतीय वैदिक परंपरा से ही विकसित हैं। सौम्य रूप में सरस्वती लेखकों और चित्रकारों को प्रेरणा देती हैं और इसकी पूजा ज्ञान, संगीत और वाक्पटुता या तर्क-वितर्क की क्षमता के लिए की जाती है। बेंटेन प्रवाहित होने वाली हर वस्तु जैसे संगीत, धन, समय, जल और नदियों की स्वामिनी है।
ऋग्वेद 2.41.16 में कहा गया है कि –
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति।
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि॥
देवी सरस्वती श्रेष्ठ माता, नदी तथा देवी है, वह हमें सुयोग्य एवं समर्थ बनाए। इसी प्रकार ऋ ग्वेद 3.1.12 में मिलता है कि –
महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना। धियो विश्वा वि राजति॥
वह विशाल नदी तथा संगीत, धन, सौभाग्य, सौंदर्य, सुख, वाक्पटुता और ज्ञान की देवी हैं। जापान में भी यह जल (नदी) से संलग्न है। बेंटेन के अधिकांश मंदिर और तीर्थस्थल द्वीपों, नदियों, धाराओं, तालाबों और झीलों, या समुद्र के पास स्थित हैं।

राक्षस का वध करने वाली

रौद्र रूप : ऋग्वेद (6.61.7) के अनुसार,
उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः।
वृत्रघ्नी वष्टि सुष्टुतिम्॥
यहां सरस्वती को स्वर्ण रथ में सवार एवं ‘वृत्रघ्नी अर्थात राक्षस वृत्र का वध करने वाली’ कहा गया है। वृत को अहि अर्थात सांप भी कहा गया है। संभव है कि इसीलिए जापान में उनके साथ ड्रैगन दिखाया जाता है। टोक्यो के ललित कला विश्वविद्यालय में 1212 ई. की आठ भुजाओं वाली सरस्वती की एक पेंटिंग संरक्षित है। वीणा धारण किए हुए बेंटेन के रूप में सरस्वती को एक सुंदर महिला के रूप में चित्रित किया गया है, परंतु हाथ में तलवार धारण किए हुए। उनके साथ देवी करितेमो (हरिति) और केनरोचिचिन (पृथ्वी) तथा दो दिव्य सेनापति भी हैं। एनोशिमा में युद्ध जैसी मुद्रा में बेंटेन की एक छवि है, जिसमें उनके हाथ में तलवार है। समुराई योद्धा इसी रूप में उनकी पूजा करते थे। कई जापानी जनरल अपने दुश्मनों को हराने के लिए भजन गाकर उनसे प्रार्थना किया करते थे।

जापान के सात शुभ देवता- एबिसु, दाइकोकु (शिव, महाकाल), बेंजाइटन (सरस्वती), बिशामोंटेन (वैश्रवण या कुबेर), फुकुरोक्यू, होटेल और जुरोजिन हैं। सरस्वती जापान में भाग्य के सात देवताओं में शामिल होने वाली एकमात्र देवी हैं। इन सात शुभ देवताओं के बारे में माना जाता है कि वे पूरे देश में वर्ष भर यात्रा करते हैं और लोगों के लिए सौभाग्य, समृद्धि और करुणा लाते हैं। वर्तमान में बेंजाइटन जापान की सबसे लोकप्रिय देवियों में से एक हैं।साहित्य में सरस्वती : सुवर्णप्रभा सूत्र (सुवर्ण प्रकाश सूत्र) प्रथम शताब्दी में भारत में लिखा गया था। इसका चीनी भाषा में अनुवाद 417 ई. में धर्मरक्ष द्वारा चार खंडों में किया गया तथा बाद में जापानी में भी अनुवाद हुआ, जिसे ‘कोंकोम्यो-सैशो ओ-क्यो’ कहा जाता है। इस सूत्र का सातवां अध्याय देवी सरस्वती को समर्पित है। यहां उनकी पूजा ज्ञान और सर्वोच्चता की देवी के रूप में की जाती है। नारा स्थित तोदाईजी मंदिर के इतिहास में यह दर्ज है कि सरस्वती और लक्ष्मी की पूजा सर्वप्रथम 722 ई. में शुरू हुई और सदियों तक जारी रही। जापानी सम्राट शोमू (724-749) ने 741 ई. में विपत्तियों, घातक रोगों और दुःख से बचाव के लिए सभी प्रांतों में इस सूत्र के पाठ का आदेश दिया था। प्रसिद्ध कवि मियाको नो योशिका (824-879) प्रेरणा प्राप्त करने के लिए चिकुबुशिमा स्थित सरस्वती मंदिर गए थे और उन्हें स्वप्न में सरस्वती द्वारा उनकी कविता की एक पंक्ति का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। शोको (1205-82) द्वारा रचित विशाल ग्रंथ ‘आसबाशो’ में सरस्वती का वर्णन मिलता है।

रायसोन (1279-1349) ने अपने ग्रंथ ‘ब्याकु-होक्कु-शो’ के अध्याय 199 में उनकी पूजा से संबंधित अनुष्ठानों का वर्णन किया है। इतिहासकार साइतो गेस्शिन ने अपनी पुस्तक ‘तोतो साइजिकी’ में सरस्वती के 131 मंदिरों का उल्लेख किया है। जर्मन विद्वान फिलिप फ्रांज वॉन सीबोल्ड ने भी लिखा है कि 1832 की जनगणना में अकेले टोक्यो (तत्कालीन ईदो) में ही देवी सरस्वती (बेंजाइटेन) के 131 मंदिर और भगवान गणेश के 100 मंदिर थे। यह विवरण जापान में सरस्वती पूजा की व्यापकता और जापानी संस्कृति में उनके गहरे प्रभाव को दर्शाता है।

जापान में, बेंटेन को आमतौर पर एक सुंदर महिला के रूप में दर्शाया जाता है, जो चीनी कुलीन वर्ग के वस्त्र पहने हुए, बीवा (एक प्रकार का वीणा वाद्य यंत्र) बजाती हुई और रत्नजड़ित मुकुट धारण किए हुए दिखाई देती है। सरस्वती को लगभग उन सभी देशों में पूजा जाता है जहां भारतीय विचार पहुंचे हैं। इससे पता चलता है कि हमारी संस्कृति, दार्शनिक और आध्यात्मिक विरासत वैश्विक स्तर पर कितनी विस्तारित हुई है।

देवी सरस्वती की मान्यताओं को लेकर भारत और जापान में बहुत ही समानताएं हैं। भारत में सरस्वती देवी को मुख्य रूप से ज्ञान, विद्या, बुद्धि, कला और तर्क आदि की देवी माना जाता है और इसी प्रकार से जापान में भी इनके बारे में यही मान्यता है। उन्हें लेखकों, संगीतकारों, चित्रकारों और संगीतज्ञों की संरक्षक देवी के रूप में जाना जाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को बहुत बड़ी और उत्तम नदी के रूप में वर्णित किया गया है। उसी प्रकार जापान में भी सरस्वती (बेंटेन) को ‘प्रवाहित होने वाली हर वस्तु जैसे संगीत, धन, समय, जल और नदियों की स्वामी’ माना जाता है। इसलिए उनके अधिकतर मंदिर नदियों, तालाबों, पोखरों और झीलों आदि के किनारे बने हुए हैं। यह मान्यता अभी दोनों देशों में एक समान है।

ऋग्वेद में ही सरस्वती को दुष्टों का संहार करने वाली, वृत्रासुर का वध करने वाली बताया गया है। उसी प्रकार जापान में भी अष्टभुजा वाली सरस्वती देवी की पूजा की जाती है, जो दुष्टों और बुरे मनोविकारों का नाश करने वाली हैं। इस प्रकार दोनों देशों में सरस्वती की मान्यता में अनेक समानताएं हैं। अतः मां सरस्वती दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों में एक शक्तिशाली कड़ी हैं। भारतीय विद्वानों प्रो. सुभाष काक, प्रो. लोकेश चन्द्र, प्रो. जयंति मनोहर आदि ने इन संबंधों पर लिखने में योगदान दिया है।

Topics: हिंदू धर्मतोदाईजी मंदिरभारत-जापानशिंटो मतऋग्वेदधार्मिक प्रकृतिवैदिक संस्कृतिसौम्यपाञ्चजन्य विशेषरौद्र रूपसरस्वती पूजासुवर्णप्रभाहिंदू-बौद्धजापानी संस्कृतिआचार्य बोधिसेनभारतीय भिक्षुबुद्ध प्रतिमासम्राट शोमू
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