स्कॉटलैंड के ग्लासगो में वंदे मातरम् गूंज रहा था। पोडियम से हर दिन बार-बार भारतीय खिलाड़ियों के नाम पुकारे जा रहे थे। भारत की खेल यात्रा को मुड़कर देखने वालों की आंखें नम हो गईं।
क्यों? क्या यह केवल कुछ उपलब्धियों से उमड़ा भावनाओं का ज्वार है? नहीं। वर्ष 2010 याद है? दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल याद हैं?
वर्ष 2000 से 2013 के बीच राष्ट्रीय खेल नीति, नाडा, ग्रामीण खेल योजनाओं और दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयार अवसंरचना ने एक आधार अवश्य बनाया था। किंतु 2010 के राष्ट्रमंडल खेल वित्तीय अनियमितताओं, महंगे ठेकों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों से घिर गए। कैग और शुंगलू समिति ने गंभीर कमियां दर्ज कीं। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी गिरफ्तार हुए और उनके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया।
शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के अधीन हुए कार्यों में अनियमितताओं और प्रक्रियागत कमियों को लेकर जांच रिपोर्टों ने गंभीर प्रश्न उठाए। परिणामस्वरूप दिल्ली सरकार, केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस नीत सरकार और भारतीय खेल प्रशासन, तीनों को तीखी राजनीतिक आलोचना झेलनी पड़ी। इस पूरे प्रकरण ने भारत और उसके खेल प्रशासन की अंतरराष्ट्रीय साख को गहरा आघात पहुंचाया।
इसी पृष्ठभूमि में 2013 के बाद और विशेष रूप से 2014 से प्रारंभ हुई खेल यात्रा को केवल पिछली योजनाओं की निरंतरता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह विश्वास और व्यवस्था के पुनर्निर्माण का संकल्प भी था। चुनौती केवल अधिक पदक जीतने की नहीं थी। चुनौती खेल प्रशासन से जुड़े अविश्वास को समाप्त करने, खिलाड़ी को व्यवस्था के केंद्र में लाने और सार्वजनिक धन को आयोजनों की क्षणिक चमक के बजाय प्रतिभाओं के दीर्घकालीन विकास से जोड़ने की भी थी।
इस कालखंड में दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह रहा कि खिलाड़ी को किसी प्रतियोगिता के समय सहायता पाने वाला अस्थायी लाभार्थी नहीं माना गया। उसके पूरे खेल जीवन को नीति का विषय बनाने की कोशिश हुई।
सितंबर 2014 में प्रारंभ हुई टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, TOPS, ने संभावित ओलंपिक और पैरालंपिक पदक विजेताओं को विदेशी प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं, विशेषज्ञ प्रशिक्षकों, विशेष उपकरणों, चिकित्सा सहायता और मासिक भत्ते से जोड़ना शुरू किया। वर्ष 2018 में इसके पुनर्गठन के बाद तकनीकी और वैज्ञानिक सहायता को अधिक व्यवस्थित स्वरूप मिला।
‘खेलो इंडिया’ ने इस परिवर्तन को आधारभूत स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया। वर्ष 2017 में अलग-अलग योजनाओं को एकीकृत कर प्रतिभा की पहचान, प्रशिक्षण केंद्रों, अकादमियों, खेल विज्ञान और नियमित प्रतियोगिताओं को एक ही ढांचे में रखा गया। जुलाई 2026 तक 1,067 ‘खेलो इंडिया’ केंद्र स्थापित किए जा चुके थे। 267 अकादमियों को सहायता दी जा रही थी और 2,745 चयनित खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा सहायता तथा व्यक्तिगत भत्ता उपलब्ध कराया जा रहा था। वर्ष 2018 से ‘खेलो इंडिया’ की विभिन्न प्रतियोगिताओं में 63,000 से अधिक खिलाड़ी भाग ले चुके हैं।
इस अवधि में स्कूल खेलों के साथ विश्वविद्यालय, शीतकालीन, पैरा, समुद्री, जल और जनजातीय खेलों के लिए भी अलग-अलग राष्ट्रीय मंच विकसित किए गए। इसका राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ भी है। खेलों को कुछ महानगरों, संपन्न परिवारों अथवा परंपरागत खेल राज्यों की सीमाओं से बाहर निकालकर देश की विविध सामाजिक संरचना से जोड़ने का प्रयास किया गया। पैरा खिलाड़ी को केवल सहानुभूति के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पदक की प्रबल संभावना के रूप में स्वीकार किया जाना भी इसी बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
केंद्रीय खेल बजट में हुई वृद्धि प्राथमिकताओं के परिवर्तन को भी दिखाती है। युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय का आवंटन वित्त वर्ष 2013/14 के 1,219 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026/27 में 4,479.88 करोड़ रुपये हो गया। यह नाममात्र की वृद्धि है। इसे मुद्रास्फीति समायोजित वास्तविक वृद्धि नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी इससे इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि खेलों को पहले की तुलना में अधिक वित्तीय और राजनीतिक प्राथमिकता मिली है।
इस पूरी यात्रा का एक केंद्रीय संदेश यह भी है कि खिलाड़ी का करियर चयन में असफलता, चोट अथवा सक्रिय प्रतिस्पर्धा की समाप्ति के साथ खत्म नहीं हो जाना चाहिए। शिक्षा, रोजगार, पेंशन, प्रशिक्षक बनने के अवसर, खेल प्रबंधन और सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्प्रशिक्षण को खिलाड़ी कल्याण से जोड़ने का प्रयास इसी संवेदनशीलता का परिणाम है।
खेलों को अब केवल पदक प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को सम्मानजनक जीवन और पेशेवर भविष्य देने वाले क्षेत्र के रूप में देखने की शुरुआत हुई है।
कुछ लोग दिल्ली 2010 के 101 पदकों और ग्लासगो 2026 के 39 पदकों की सीधी तुलना कर सकते हैं। किंतु यह तुलना उचित नहीं है।
दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल 2010 में भारत ने 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य सहित कुल 101 पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। यह भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रमंडल प्रदर्शन था। लेकिन उस संस्करण में 17 खेलों के साथ चार पैरा खेलों की स्पर्धाएं भी शामिल थीं। मेजबान होने के कारण भारत को व्यापक भागीदारी, परिचित परिस्थितियों और घरेलू दर्शकों के समर्थन का लाभ भी मिला था।
इसके विपरीत ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 केवल दस खेलों का संक्षिप्त संस्करण था। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और नौ कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते और पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया। भारत का दल भी केवल 124 खिलाड़ियों का था। इसलिए 101 और 39 को आमने-सामने रखकर यह कहना कि भारत का प्रदर्शन गिर गया, सांख्यिकीय रूप से अधूरा निष्कर्ष होगा।
ग्लासगो में कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी, क्रिकेट और स्क्वैश जैसे वे खेल शामिल नहीं थे, जिनसे भारत ने बर्मिंघम 2022 में संयुक्त रूप से 30 पदक जीते थे। निशानेबाजी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं थी, जबकि ऐतिहासिक रूप से यह राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के सबसे सफल खेलों में से एक रही है।
इस प्रकार वर्ष 2026 में भारत की अनेक परंपरागत पदक संभावनाएं प्रतियोगिता प्रारंभ होने से पहले ही समाप्त हो चुकी थीं।
इसी कारण 2026 के 39 पदकों की संख्या से अधिक उनकी संरचना महत्वपूर्ण है। भारत ने मुक्केबाजी में सात स्वर्ण और तीन रजत सहित दस पदक जीतकर पहली बार इस खेल की पदक तालिका में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। जूडो और पैरा खेलों में भी ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ।
यह प्रदर्शन बताता है कि भारत की खेल क्षमता अब केवल कुश्ती, निशानेबाजी, बैडमिंटन अथवा भारोत्तोलन जैसे पुराने और मजबूत आधारों तक सीमित नहीं है। जूडो और पैरा खेलों जैसे क्षेत्रों में भी प्रतिस्पर्धी गहराई विकसित हो रही है, जबकि मुक्केबाजी में भारत ने अपनी स्थापित क्षमता को एक नए शिखर तक पहुंचाया है।
इसलिए 2010 की उपलब्धि निस्संदेह बड़ी थी, लेकिन वह मेजबानी, व्यापक खेल कार्यक्रम और अधिक पदक अवसरों से भी जुड़ी थी। वर्ष 2026 का प्रदर्शन छोटे दल, सीमित खेल कार्यक्रम और भारत के कई सफल खेलों की अनुपस्थिति में आया है। इस संदर्भ में 39 पदक निराशाजनक संख्या नहीं हैं। वे भारतीय खेल व्यवस्था की बढ़ती विविधता, नए खिलाड़ियों की गुणवत्ता और भविष्य की संभावनाओं का संकेत हैं।
भारत की 2013 के बाद की खेल यात्रा को घोटाले से सुशासन, आयोजन केंद्रित दृष्टिकोण से खिलाड़ी केंद्रित व्यवस्था और आकस्मिक सफलता से संस्थागत तैयारी की ओर बढ़ती यात्रा के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
दिल्ली 2010 ने यह दिखाया था कि विशाल व्यय और भव्य आयोजन अपने आप किसी देश में खेल संस्कृति नहीं बना देते। भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की धारणा पदकों की चमक को भी फीका कर सकती है। इसलिए उसके बाद का संकल्प केवल पदकों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था की विश्वसनीयता को फिर स्थापित करने का भी था।
खेलो इंडिया, TOPS, खेल विज्ञान, राष्ट्रीय प्रतियोगिता प्रणाली, पैरा खिलाड़ियों की मुख्यधारा में भागीदारी और खिलाड़ी के दीर्घकालीन करियर पर ध्यान ने एक नई दिशा बनाई है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी समस्याएं समाप्त हो चुकी हैं।खेल महासंघों की जवाबदेही, निष्पक्ष चयन, स्थानीय मैदानों का रखरखाव, महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा, प्रशिक्षकों की गुणवत्ता और डोपिंग नियंत्रण जैसे विषयों पर लगातार काम करने की आवश्यकता है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि परिवर्तन वास्तविक है और उसके अनेक परिणाम मापे भी जा सकते हैं।
ग्लासगो 2026 के 39 पदक इसी परिवर्तन का एक संकेत हैं। वे दिल्ली 2010 के 101 पदकों के सामने संख्या में छोटे अवश्य दिखाई देते हैं, लेकिन सीमित खेलों, छोटे दल और परंपरागत पदक दिलाने वाले खेलों की अनुपस्थिति में प्राप्त यह सफलता अधिक व्यापक खेल क्षमता की ओर संकेत करती है।
इससे यह आशा मजबूत होती है कि भारत अब केवल अपने अनुकूल माने जाने वाले कुछ खेलों में पदक जीतने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि अनेक खेलों में प्रतिस्पर्धी शक्ति विकसित करने वाला राष्ट्र बनेगा।
हालांकि किसी एक प्रतियोगिता के परिणाम का पूरा श्रेय केवल सरकारी योजनाओं को देना भी उचित नहीं होगा। इन उपलब्धियों में खिलाड़ियों के परिश्रम, उनके परिवारों के त्याग, प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन, राज्यों, खेल महासंघों, सैन्य एवं सार्वजनिक संस्थानों तथा निजी सहयोग की भी निर्णायक भूमिका है। नीतियां वातावरण और संसाधन उपलब्ध कराती हैं। अंततः पदक खिलाड़ी के वर्षों के परिश्रम से आता है।
अतः भारत की वर्तमान खेल यात्रा का सही आकलन पदकों की साधारण गिनती में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के निर्माण में निहित है जो प्रतिभा को खोजती है, खिलाड़ी को संभालती है, असफलता के समय उसका साथ देती है और उसकी सफलता को स्थायी राष्ट्रीय खेल संस्कृति में बदलने का प्रयास करती है।
सो, ग्लास्गो से भारत की गलियों तक इन हजारों-लाखों आंखों के भीग जाने के कारण बहुत साफ हैं, पढ़े जा सकते हैं… और हां, आज इन आंखों में आंसू ही नहीं भविष्य के और बहुत से सपने तैर रहे हैं।
वंदे मातरम!
X@hiteshshankar

















