संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर, 1994 में एक प्रस्ताव पारित कर प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को ‘अंतरराष्ट्रीय मूल निवासी दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। इस तिथि का चयन इसलिए किया गया, क्योंकि 9 अगस्त, 1982 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के ‘वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजिनस पॉपुलेशंस’ की पहली बैठक आयोजित हुई थी। इस दिवस का उद्देश्य विश्व के मूल निवासियों के अधिकारों, संस्कृति, भाषा, परंपराओं और जीवन-पद्धति के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 9 अगस्त का दिन मूल निवासियों के इतिहास में एक पीड़ादायक स्मृति भी समेटे हुए है।
औपनिवेशिक काल के दौरान अमेरिका सहित अनेक देशों में मूल निवासियों पर व्यापक अत्याचार हुए। वर्जीनिया क्षेत्र के पौहटन समुदाय के लोगों पर हुए हिंसक हमलों जैसी घटनाएं उपनिवेशवाद की अमानवीय प्रवृत्ति की प्रतीक हैं। संभव है कि इसी ऐतिहासिक पीड़ा की स्मृति को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिवस के माध्यम से विश्व समुदाय का ध्यान मूल निवासियों के अधिकारों की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया हो।
वास्तव में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और एशिया के अनेक क्षेत्रों में उपनिवेशवादी शक्तियों ने स्थानीय समुदायों को उनकी भूमि, संसाधनों और सांस्कृतिक पहचान से वंचित किया। अनेक स्थानों पर उन्हें विस्थापन, हिंसा और सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। सैकड़ों वर्षों तक चले इस शोषण के परिणामस्वरूप अनेक समुदाय अपनी ही जन्मभूमि में सम्मानजनक जीवन से वंचित हो गए। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में उठाया गया कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
‘आदिवासी’ या ‘मूल निवासी’ शब्द
विश्व स्तर पर ‘इंडिजिनस’ शब्द का अर्थ उन समुदायों से लगाया जाता है जो किसी क्षेत्र के मूल निवासी रहे हैं और जिन पर बाद में आए बाहरी शासकों या उपनिवेशवादी शक्तियों का प्रभुत्व स्थापित हुआ। किंतु भारत में इस अवधारणा को लेकर स्थिति भिन्न है। भारतीय इतिहास और समाज की संरचना पश्चिमी देशों से अलग रही है।
अनेक भारतीय इतिहासकारों और विचारकों का मत है कि भारत में ऐसा कोई प्रमाणित ऐतिहासिक प्रसंग नहीं मिलता जिसमें किसी बाहरी समुदाय ने पूरे देश के मूल निवासियों को विस्थापित कर स्वयं स्थायी रूप से उनका स्थान ले लिया हो। यही कारण है कि भारत के संविधान में कहीं भी ‘आदिवासी’ या ‘मूल निवासी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।
संविधान ने इन समुदायों के लिए ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribe) शब्द का उपयोग किया है। संविधान के अनुच्छेद 342 तथा पांचवीं और छठी अनुसूची के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों को विशेष संवैधानिक संरक्षण, प्रतिनिधित्व, आरक्षण तथा जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं।
‘मूल निवासी’ की वैश्विक परिभाषा नहीं
भारत ने 13 सितंबर, 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की मूल निवासियों के अधिकारों संबंधी घोषणा का समर्थन किया, किंतु साथ ही अपना स्पष्ट दृष्टिकोण भी रखा। भारत सरकार ने कहा कि भारत के सभी नागरिक इस देश के मूल निवासी हैं और यहां की अनुसूचित जनजातियों की स्थिति उन देशों के मूल निवासियों जैसी नहीं है, जहां उपनिवेशवाद ने स्थानीय समाज को व्यापक रूप से विस्थापित किया था।
भारत का मत है कि उसकी जनजातियां भारतीय समाज का अभिन्न अंग हैं और उन्हें संविधान के माध्यम से विशेष संरक्षण प्राप्त है। डॉ. आंबेडकर ने भी ‘मूल निवासी’ और ‘आदिवासी’ शब्द का विरोध किया था। वास्तव में ‘मूल निवासी’ की कोई सर्वमान्य वैश्विक परिभाषा आज भी उपलब्ध नहीं है। विभिन्न देशों का इतिहास, भूगोल और सामाजिक विकास अलग-अलग रहा है। इसलिए एक ही मानदंड के आधार पर सभी देशों में मूल निवासियों की पहचान करना सरल नहीं है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अवधारणा को विभिन्न देश अपने-अपने ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भों में स्वीकार करते हैं।
भारत की नीति
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने 1989 के कन्वेंशन-169 में मूल निवासियों और जनजातीय समुदायों के अधिकारों पर विशेष बल दिया। इस कन्वेंशन में उनकी संस्कृति, जीवन-पद्धति, परंपरागत ज्ञान, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित जीवन को सम्मान देने की बात कही गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि उनके जीवन और विकास से जुड़े निर्णयों में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत विरोधी तथा विघटनकारी तत्व संयुक्त राष्ट्र के इस दिवस का उपयोग समाज में वैचारिक विभाजन उत्पन्न करने तथा कन्वर्जन को बढ़ावा देने के लिए करते हैं। उनका प्रयास अनुसूचित जनजातियों को व्यापक भारतीय समाज से अलग पहचान देने का रहता है। वहीं भारत सरकार की घोषित नीति है कि यहां के सभी नागरिक मूल निवासी हैं। इसलिए पश्चिमी देशों की ऐतिहासिक परिस्थितियों को भारत पर यथावत लागू करना उचित नहीं है।
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए। 1950 में अनुसूचित जनजातियों को संवैधानिक मान्यता देकर उनके विकास, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गईं। उल्लेखनीय है कि यह व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की 2007 की घोषणा से कई दशक पहले लागू हो चुकी थी। इसलिए भारत में जनजातीय अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है।
कन्वर्जन को बढ़ावा
कुछ चर्च और मिशनरी संगठन 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के रूप में प्रचारित कर कन्वर्जन की गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए भारत में इस दिवस का वही ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है, जो अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में है।
जनजातीय गौरव दिवस
भारत सरकार ने 2021 से महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश शासन और जनजातीय समाज के शोषण के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया तथा जनजातीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का संदेश दिया। उनके योगदान के सम्मान में यह दिवस मनाया जाता है, जिससे देश की नई पीढ़ी जनजातीय समाज के इतिहास, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान से परिचित हो सके।
वर्तमान समय में जनजातीय समाज के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण पर व्यापक कार्य करने की आवश्यकता है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि इस विषय पर होने वाली चर्चा ऐतिहासिक तथ्यों, संवैधानिक व्यवस्थाओं और राष्ट्रीय हितों के संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित हो। भारत की जनजातियां इस देश की सांस्कृतिक विविधता और सभ्यता का अभिन्न अंग हैं। उनके अधिकारों की रक्षा, परंपराओं का संरक्षण और सम्मानजनक विकास भारतीय संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल प्रतिबद्धता है।
अतः 9 अगस्त का अंतरराष्ट्रीय मूल निवासी दिवस विश्व के उन समुदायों के संघर्ष और अधिकारों की स्मृति का प्रतीक है, जिन्होंने उपनिवेशवाद का दंश झेला। वहीं भारत में जनजातीय समाज के सम्मान और राष्ट्रीय योगदान को रेखांकित करने के लिए 15 नवंबर का जनजातीय गौरव दिवस विशेष महत्व रखता है। इसलिए हम भारतीय 15 नवंबर को ही बढ़ावा दें। इसी से हमारी जड़ें पल्लवित और पुष्पित होंगी।
अंतरराष्ट्रीय मूल निवासी दिवस : भारत ने पूजा पश्चिम ने भुलाया

















