पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव कई राज्यों की राजनीति पर असर डालने जा रहा है। इसका पहला असर पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य झारखंड पर होता दिख रहा है। झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार पर खतरा मंडराने लगा है। झारखंड की सरकार में वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस पार्टी शामिल हैं। झारखंड ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है और मंत्रिमंडल में भी शामिल है। अन्य दो प्रदेशों—तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होने के बावजूद मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं है।
बंगाल चुनाव में बदला समीकरण : अपनों के खिलाफ ही प्रचार
कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल में पूरी ताकत से विधानसभा का चुनाव लड़ी है। 2006 के बाद कांग्रेस पार्टी ने सर्वाधिक 292 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, मगर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने कांग्रेस पार्टी के बदले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए प्रचार किया है। झारखंड के मुख्यमंत्री और झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन ने कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह दरकिनार करते हुए तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार किया। हेमंत सोरेन ने ऐसा तब किया है जबकि तृणमूल कांग्रेस का झारखंड में एक भी विधायक नहीं है।
विपक्षी गठबंधन में दरार : तेजस्वी और अखिलेश का रुख
हेमंत सोरेन के साथ ही राजद नेता और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार किया है। उत्तर प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव ने भी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया है। वहीं, झारखंड सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता इरफान अंसारी ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किया। यह एक विचित्र राजनीतिक संयोग था जब मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी एक-दूसरे के विरोध में प्रचार कर रहे थे।
क्या कांग्रेस ले पाएगी अपमान का बदला?
झारखंड में कांग्रेस पार्टी के 16 विधायक हैं और झारखंड की हेमंत सरकार कांग्रेस के समर्थन पर ही टिकी हुई है। अगर कांग्रेस पार्टी महागठबंधन से अपना समर्थन वापस ले ले, तो हेमंत सरकार आज ही गिर जाएगी। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल में हेमंत सोरेन द्वारा किए गए अपमान का बदला लेगी या लेने की स्थिति में है? इस सवाल का पहला जवाब यह है कि कांग्रेस पार्टी के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह हेमंत सोरेन सरकार से अपना समर्थन वापस ले सके। हेमंत सोरेन मंत्रिमंडल में कांग्रेस के तीन मंत्री हैं। कांग्रेस नेतृत्व को समर्थन वापस लिए जाने की स्थिति में प्रदेश में पार्टी के टूटने का भय सता रहा है।
सहयोगी दलों की बेरुखी : जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु का हाल
झारखंड ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ कांग्रेस पार्टी को उसके सहयोगी ने मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी दी है। जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ गठबंधन में होने के बावजूद उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस पार्टी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया है। उमर अब्दुल्ला ने निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया है, लेकिन कांग्रेस पार्टी को शामिल नहीं किया, जबकि प्रदेश में कांग्रेस के छह विधायक हैं। तमिलनाडु में भी स्टालिन ने कांग्रेस पार्टी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया है। स्टालिन ने अगली सरकार बनाने की स्थिति में भी कांग्रेस को मंत्रिमंडल में स्थान देने का कोई वादा नहीं किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो, स्टालिन की मंशा अगली सरकार में भी कांग्रेस को जगह न देने की है।
इंडी गठबंधन का भविष्य और कांग्रेस में विचलन
इंडी (I.N.D.I.A.) गठबंधन के सभी दल एक-एक करके कांग्रेस पार्टी से दूरी बनाते जा रहे हैं। आम आदमी पार्टी पहले ही कांग्रेस से दूरी बना चुकी है। उम्मीद के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी का इन पांचों प्रदेशों में से किसी में भी प्रदर्शन सुधरने की उम्मीद नहीं है। कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के मद्देनजर, चुनाव बाद के परिदृश्य में इंडी गठबंधन के दल कांग्रेस के साथ स्पष्ट तौर पर संबंध तोड़ सकते हैं। असम के नौगांव से दो बार के सांसद प्रद्युत बोरदोलोई के पार्टी से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस विचलन की स्थिति में है। पार्टी को भय है कि चुनाव बाद कई और सांसद और राज्यों के विधायक पार्टी का दामन छोड़ सकते हैं।
















