नीट परीक्षा पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ चले छात्र आंदोलन ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राजनीतिक दलों के बीच तीखी टकरार को जन्म दिया है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के नाम से प्रसिद्ध यह आंदोलन जंतर-मंतर पर लंबे समय से चल रहा है, जिसमें छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पेपर लीक पीड़ितों को मुआवजे की मांग की है।
सीजेपी आंदोलन को मुख्य रूप से शिक्षा प्रणाली की विफलताओं-पेपर लीक, छात्रों की मौतों और परीक्षा सुधार-पर केंद्रित बताया गया। 6 जून 2026 से जंतर मंतर से प्रारंभ हुआ यह आंदोलन 20 जुलाई को उग्र हो गया, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च निकाला। दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग, पानी की बौछार और लाठीचार्ज का सहारा लिया, जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए। इस आंदोलन में कॉकरोच के नाम पर चन्द्रशेखर के भीम पार्टी के कार्यकर्ता, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हुए थे। कॉकरोच के नाम पर लगभग आधा दर्जन वामपंथी संगठन जंतर मंतर पर सक्रिय दिखे।
21 जुलाई को आंदोलन की सफलता का श्रेय लेने की होड़ आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिखाई दी। जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रदर्शन करने प्रधानमंत्री आवास के बाहर पहुंच गए।
आप ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस के धरने को सीजेपी आंदोलन को कमजोर करने की साजिश बताया। आप सांसद संजय सिंह और नेता आतिशी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और बीजेपी के बीच ‘जुगलबंदी’ है। आतिशी ने ट्वीट कर कहा कि दिल्ली पुलिस ने सीजेपी को 100 मीटर आगे नहीं बढ़ने दिया, लेकिन राहुल गांधी को पीएम आवास तक पहुंचने की अनुमति दे दी। इससे साफ है कि कांग्रेस- बीजेपी एक इकाई की तरह काम कर रहे हैं। संजय सिंह ने राहुल गांधी के प्रदर्शन को सीजेपी को कमजोर करने का तरीका करार दिया।
कांग्रेस पक्ष से जवाब आया। कांग्रेस नेताओं ने आप पर छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। श्रीनिवास बीवी जैसे नेताओं ने संजय सिंह की टिप्पणियों पर सवाल उठाए। जल संकट पर पहले हुए टकराव में कांग्रेस ने आप शासित दिल्ली सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए ‘मटका फोड़’ प्रदर्शन किए, जबकि आप ने इसे बीजेपी के साथ मिलीभगत बताया।
राजनीतिक रणनीति और गठबंधन की अटकलें
यह तकरार 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में देखी जा रही है। यूपी में कांग्रेस-एसपी गठबंधन की चर्चा है, लेकिन आप-एसपी गठबंधन की भी अटकलें हैं। कुछ रिपोर्ट्स में आप और एसपी के बीच संभावित समझौते का जिक्र है, जो कांग्रेस को हाशिये पर डाल सकता है। कांग्रेस ने यूपी में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश की है और पूर्व आप नेता राजेंद्र पाल गौतम को यूपी प्रभारी बनाया है। वे ‘समानता और सम्मान’ की मांग कर रहे हैं।
संजय सिंह पर ‘बिचौलिए’ का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि आप-एसपी तालमेल से दलित-ओबीसी वोट बैंक प्रभावित हो सकता है, जबकि एसपी का यादव-मुस्लिम वोट सुरक्षित रहेगा। चंद्रशेखर आजाद की भीम पार्टी को प्रमोट करने को भी इसी रणनीति से जोड़ा जा रहा है। हालांकि, ये अटकलें तथ्यों पर आधारित नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषण हैं। बीएसपी, बीजेपी और कांग्रेस के पास एससी/एसटी/ओबीसी वोट हैं, और सीजेपी जैसे आंदोलन इन्हें बांट सकते हैं। आप का पंजाब में कोई नुकसान नहीं क्योंकि एसपी वहां मौजूद नहीं।
संजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद एसपी में जाने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। आप का फोकस दिल्ली, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों पर है, जबकि यूपी में उसकी मौजूदगी सीमित है।
देशप्रेम बनाम सत्ता की लालसा
सभी दल लोकतंत्र में मतदाताओं के समर्थन पर टिके हैं और मुद्दों को उठाते हैं। नीट पेपर लीक वास्तविक समस्या है-2026 में परीक्षा रद्द हुई, सीबीआई जांच चल रही है। छात्रों की मांगें वैध हैं: परीक्षा सुधार, सुरक्षा और न्याय।
आप ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम किया है, लेकिन दिल्ली जल संकट में विफलता की आलोचना हुई। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका निभा रही है। सीजेपी का जन्म छात्रों के आंदोलन से हुआ, जिसका राजनीतिक दलों ने फायदा उठाने की कोशिश की।
तथ्य यह है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन सामान्य हैं। इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस-SP सहयोग है, लेकिन आप अलग रास्ता अपनाती रही है। 2027 यूपी चुनाव में वोट बैंक की लड़ाई होगी-यादव-मुस्लिम, दलित, ओबीसी। सीजेपी जैसे आंदोलन युवा वोट को प्रभावित कर सकते हैं। युवाओं के वोट के चक्कर में ही कांग्रेस और आप दोनों एक दूसरे से सोशल मीडिया पर भीड़ गए
केंद्रीय शिक्षा मंत्री की टिप्पणी
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट कहा: “लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छात्रों का राजनीतिक हथियार बनाकर मानसून सत्र के दौरान जानबूझकर व्यवधान पैदा कर रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देकर आम जनता को असुविधा पहुंचाई और सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी की। सरकार ने चर्चा के लिए पूरी तैयार दिखाई, फिर भी कांग्रेस ने लोकतांत्रिक बहस की बजाय राजनीतिक तमाशा चुना। उनका उद्देश्य छात्रों के समाधान नहीं, बल्कि राजनीतिक सुर्खियां बटोरना है। राहुल गांधी के लिए यह छात्रों के बारे में नहीं, बल्कि हर चर्चा का रास्ता खुलने के बाद भी टकराव पैदा करने के बारे में है। हमारी सरकार एनईईटी और युवाओं की हर वैध चिंता पर सदन में चर्चा के लिए 100% प्रतिबद्ध है। भारत के छात्र राजनीतिक अभियान के प्रॉप्स (रंगमंच की सामग्री) बनने के लायक नहीं हैं। उन्हें नारे और अराजकता नहीं, बल्कि निश्चितता, समाधान और जवाबदेही चाहिए।”
मुद्दों पर फोकस जरूरी
नीट सुधार, जल संकट और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे राजनीतिक लाभ से ऊपर हैं। छात्रों की पीड़ा वास्तविक है-20 से ज्यादा मौतें, पेपर लीक। दल इसे हल करने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। संजय सिंह, आतिशी, राहुल गांधी और चंद्रशेखर सभी अपनी राजनीतिक रणनीति चला रहे हैं, लेकिन जनता अंतिम फैसला करेगी।
राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन जब छात्र आंदोलन सत्ता की लड़ाई बन जाता है तो लोकतंत्र कमजोर होता है। सीजेपी, कांग्रेस और आप के रिश्ते सहयोग और टकराव दोनों दिखाते हैं-यह 2027 चुनाव की तैयारी का हिस्सा लगता है। यह टकराव देशप्रेम में कम, सत्ता पाने के लिए अधिक दिखता है। 20 जुलाई को संसद मार्च में छात्रों की कम बल्कि उग्र भीड़ की चर्चा ज्यादा हुई, क्योंकि इसमें पत्थरबाज भी शामिल हुए जिनका छात्रों के हित से कोई लेना-देना नहीं है।
केंद्र और राज्य सरकारें नीट सुधार लागू करें, सीबीआई जांच पारदर्शी हो, और विपक्षी दल जिम्मेदारी से आंदोलन का समर्थन करें न कि राजनीतिक खेल खेलें। भारत की युवा पीढ़ी को राजनीति का शिकार नहीं बनना चाहिए।

















