"घोषणा की जरूरत नहीं, भारत हिंदू राष्ट्र है": नागपुर में बोले RSS सरसंघचालक; राम मंदिर के शिल्पकारों का हुआ भव्य सम्मान
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“घोषणा की जरूरत नहीं, भारत हिंदू राष्ट्र है”: नागपुर में बोले RSS सरसंघचालक; राम मंदिर के शिल्पकारों का हुआ भव्य सम्मान

नागपुर में डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा अयोध्या राम मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले शिल्पकारों और विशेषज्ञों का सम्मान किया गया। इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भारत के उत्थान और हिंदू राष्ट्र की संकल्पना पर प्रेरक विचार साझा किए।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Apr 28, 2026, 06:35 pm IST
inभारत, संघ को जानें, संघ @100, धर्म-संस्कृति, महाराष्ट्र
RSS Chief Mohan Bhagwat honoring the architects and contributors of Ayodhya Ram Mandir in Nagpur.

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा- राम मंदिर निर्माण में भारत के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है।

नागपुर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति ने श्री क्षेत्र अवधपुरी में प्रभु श्रीरामचंद्र जी के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण, जिन मान्यवरों के मार्गदर्शन में हुआ, उन प्रतिभाओं के सम्मान का कार्यक्रम आयोजित किया। अयोध्या में श्रीराम मंदिर कल्पना से भी अति भव्य बना है। हमको भी अपना काम ऐसे ही करना है। कल्पना से अधिक उत्तम, अधिक भव्य, अधिक सुंदर करना है। ताकि विश्व में धर्म की स्थापना हो। भारत का उत्थान भारत की संतान ही करेगी और कोई देश भारत का उद्धार नहीं करेगा। भारत बड़ा होकर सारी दुनिया का उद्धार करेगा। ये विधि लिखित है। उसको पूर्ण करने में हमारा हाथ लगना चाहिए।

रेशीमबाग स्थित महर्षि व्यास सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत, गोविंददेव गिरी जी महाराज, भय्याजी जोशी (अध्यक्ष, डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति)., श्रीधर जी गाडगे (उपाध्यक्ष, डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति). उपस्थित रहे।

“घोषित करने की जरूरत नहीं, भारत हिंदू राष्ट्र है”

उन्होंने कहा कि मंदिर श्री राम जी की इच्छा से बना, जब तक सबकी लकड़ी नहीं लगती, गोवर्धन नहीं उठता। उनकी करांगुली तब तक काम नहीं करती, जब तक बाकी लोग लकड़ी नहीं लगाते। मंदिर भी ऐसे ही बना। राम मंदिर में भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है। अब विश्व को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना है। राम मंदिर बनने तक हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र है कहने पर हंसने वाले लोग थे। आज हंसने वाले लोग ही कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का देश है। हमको कहते है कि आप घोषित करो। हम कहते है घोषित करवाने की जरूरत नहीं, जो है सो है। सूरज पूरब से उगता है, ये घोषित करना चाहिए क्या? वह पूरब से ही उगता है। तो भारत हिन्दू राष्ट्र है, यह आज सबको मान्य है।

उन्होंने कहा कि विरोध मन में एक जोश पैदा करता है। उपेक्षा एक जिद पैदा करती है कि हम जो कह रहे हैं वो करके दिखाएंगे। लेकिन अनुकूलता में सुखासीनता आती है। अनुकूलता को नकार तो नहीं सकते। देश के लिए लाभ है, समाज के लिए लाभ है। परंतु उसमें अपने मन में समाधान नहीं आना चाहिए। राम राज्य केवल राजा के कारण नहीं होता। प्रजा के कारण भी होता है। मंदिर बनाने में जिन सब लोगों का योगदान हुआ, उस कृतज्ञता का ज्ञापन ही इस सत्कार समारंभ द्वारा हमने किया है। उन्होंने अपना काम किया, हमको अपना काम करना है।

मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन धर्म का उत्थान होने के लिए भारतवर्ष का उत्थान अवश्यम्भावी है। 150 साल पहले योगी अरविंद जी ने घोषित कर दिया है। जैसे-जैसे एक-एक लकड़ी लगेगी, वैसे-वैसे भगवान की करांगुली का बल इस संकल्प के पूर्ति के लिए प्रवाहित होता रहेगा।

अयोध्या : सदियों का संकल्प सिद्धि को प्राप्त हुआ – सरसंघचालक जी

आप ऐसा विचार कीजिए कि 1857 से उत्थान की प्रक्रिया शुरू हो गई। 2014 में लंदन के गार्डियन ने लेख लिखा – ऑन दिस डे द इंडियंस हैव फाइनली सेड गुड बाय टू द ब्रिटिश टेक्निकली। हमने गुड बाय तो 15 अगस्त 1947 को ही कर दिया था, परंतु अभी भी हम निश्चित नहीं थे।

भारत का उत्थान होना है। लेकिन भारत क्या है? कौन सा उत्थान होना है? भारत इंडिया है क्या? इस पशोपेश में सारा समय जा रहा था। इतना बड़ा आंदोलन नहीं होता तो मंदिर बनता क्या? इतना बड़ा आंदोलन हो गया। लेकिन सत्ता में लोग राम मंदिर बनाने वाले नहीं बैठते तो राम मंदिर बनता क्या? राम मंदिर बनने का निर्णय हो गया, लेकिन नींव बनाने वाले नहीं मिलते तो आगे कैसे खड़ा होता? भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है। तब श्री राम की करांगुली ने अपना चमत्कार दिखाया है। यह प्रक्रिया है, ये चलेगी।

उन्होंने कहा कि विश्व को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना है। संघ की 100 साल की यात्रा कैसे चली? संघ के पास तो कुछ नहीं था। ना प्रसिद्धि थी, ना सत्ता थी, ना प्रचार था, ना साधन थे। डॉ. हेडगेवार जी को अनुयायी मिले और एक श्रद्धा व विश्वास ले चले – हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र है। शुरू में लोग हंसते थे, लेकिन आज मान रहे हैं। उस समय सब लोग खिल्ली उड़ाते थे। उस समय के कार्यकर्ताओं के मन में श्रद्धा थी, डॉ. जी के वचनों पर विश्वास था, उसके कारण सब बातों के बावजूद काम करते रहे। पतवार चलाते जाएंगे, मंजिल आएगी…आएगी, मंजिल कब आएगी किसी को पता नहीं, पर पतवार चलाना छूटा नहीं। श्रद्धा विश्वास के साथ शुरू किया और करते रहे।

Ayodhya Ram Mandir: राम मंदिर का सटीक इतिहास

उन्होंने कहा कि श्री राम के गुणों का वर्णन जैसे रामायण में है, राम राज्य के आधार के नाते वैसे राम राज्य की प्रजा कैसी थी, इसका भी वर्णन है। अयोध्या में मंदिर निर्माण हो गया, उसकी व्यवस्था के लिए एक विश्वस्त मंडल बना है। पर अब, प्रत्येक मन की अयोध्या बनाकर राष्ट्र का मंदिर खड़ा करना है, वह काम हम सबको करना पड़ेगा। राम राज्य की प्रजा जैसा आचरण मेरा बने, मेरे परिवार का बने और हमारे कारण अपने समाज में उस आचरण का प्रचार प्रसार हो। प्रत्यक्ष आचरण शुरू हो। यह हम करेंगे तो भगवान की इच्छा तो है ही कि दुनिया को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना चाहिए। कितने जल्दी होगा, यह हमको तय करना है। हम सब लोग लगेंगे तो विश्व में फैले हिन्दू समाज की इतनी शक्ति है कि अगर सोच कर शुरू करेगा तो एक दिन में कर देगा।

छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण के बाद देश में परिवर्तन

भय्याजी जोशी ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण अवसर के बाद देश में एक परिवर्तन की प्रक्रिया गतिमान हुई थी। मुगलों का साम्राज्य समाप्त हुआ। अंग्रेजों का आगमन होना शुरू हुआ था। लेकिन एक संघर्ष का कालखंड लगभग समाप्त हुआ। उसके बाद भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक लंबा अवसर गया, राह देखनी पड़ी। यह परिवर्तन की प्रक्रिया छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण से शुरू हुई वो नित्य गतिमान होती रही और एक-एक कदम भारत आगे बढ़ता गया।

राम मंदिर निर्माण केवल ईंट-पत्थर नहीं, राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक

भय्याजी जोशी ने कहा कि सब प्रकार के आक्रांताओं की निशानियां वेदना दायक रहती है। ऐसे सारे चिन्हों को दूर करने का प्रयास भी एक कालखंड में प्रारंभ हुआ। उसी प्रक्रिया में अयोध्या के राम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर निर्माण किया गया। आक्रांताओं के एक चिन्ह मिटाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। एक संघर्ष लंबा चला है और यह छोटा संघर्ष नहीं है। 400 वर्षों के निरंतर संघर्ष, एक लाख से अधिक लोगों का बलिदान और उसके बाद शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया। उस कानूनी प्रक्रिया के बाद उस स्थान पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

भारत में मंदिरों की कमी नहीं है। राम मंदिर तो स्थान-स्थान पर है। लोग प्रश्न पूछते थे कि राम मंदिर तो इतने स्थानों पर है, अयोध्या की विशेष बात क्या है? तो एक अपमान के कलंक को मिटाए बिना राष्ट्र भाव प्रबल कैसे हो सकता है? और इसलिए राष्ट्रभक्त लोग राष्ट्र का प्रबल भाव अंतकरण में रखने वाले समाज के लोग खड़े हुए। यह मंदिर हिन्दू समाज की पुनः प्रतिष्ठा का प्रतीक है। हिन्दू समाज के सम्मान की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसलिए इस मंदिर का संदर्भ उत्तर प्रदेश अयोध्या वासी यहां तक सीमित नहीं है।

राम मंदिर धर्मध्वज: कौन से खास सामग्री से बना है, जिस पर सालों तक धूप-बारिश का नहीं होगा असर

भगवान राम के जीवन के संदर्भ में तो हम बहुत कुछ बातें जानते ही हैं। आज भी आदर्श व्यवस्थाएं बताते समय राम राज्य की ही कल्पना को रखा जाता है। इसलिए जब कहा गया कि इस मंदिर से राष्ट्र निर्माण का कार्य तो राष्ट्र निर्माण में राज्य की भी एक भूमिका होती है। उस प्रकार का आदर्श हम सबके सामने रहे। यह अयोध्या के मंदिर का संदेश है। इसलिए केवल पत्थरों का और मजदूरों ने बनाया हुआ एक शिल्प के नाते नहीं है। शायद शिल्प के नाते भी अच्छे मंदिर भारत के अंदर होंगे। ये राष्ट्र भाव के प्रगटीकरण का एक प्रतीकात्मक शिल्प हम सबके सामने है।

गत पांच वर्षों से लगातार परिश्रम से इस भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है। स्वाभाविक रूप से जिन्होंने बड़ी ऊर्जा शक्ति लगाई, ऐसे बंधुओं का नागपुर बुलाकर उनके योगदान का सम्मान किया जाए। सम्मान तो प्रतीकात्मक होता है। काम करने वाले आज यहां पर जितने हैं, उससे 100 गुना वहां पर थे। लेकिन एक प्रतीकात्मक रूप में कुछ लोगों को यहां पर निमंत्रित किया गया।

राम मंदिर निर्माण : 1000 साल की मजबूती और बिना लोहे का प्रयोग

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय जी ने कहा कि विचार भी था, विश्वास भी था, लेकिन यह कल्पना नहीं थी कि ऐसा बन जाएगा। यह विचार था कि 1000 साल आयु के लिए मंदिर बनना चाहिए। अब 1000 साल की बिल्डिंग कौन सी होती है? यह तो बात जानकारी में नहीं थी। इतना ही जानते थे कि रामेश्वरम, मदुरई, तंजावुर, कोणार्क 1000 साल से खड़े हैं। उससे भी अधिक आयु से खड़े हैं। तो विचार आया कि 1000 साल के लिए अगर बनाना है तो फिर उसमें लोहा नहीं हो सकता। मंदिर में एक ग्राम लोहे का भी उपयोग नहीं है। जमीन के नीचे भी नहीं है, जमीन के ऊपर भी नहीं है।

विशेषज्ञों ने कहा कि सीमेंट की आयु 150 साल से ज्यादा नहीं है। उसके बाद वह शक्तिहीन हो जाता है। बाइंडिंग फोर्स खत्म हो जाती है। तो धरती के ऊपर कंक्रीट नहीं है और धरती के नीचे कंक्रीट है तो उसमें सीमेंट न्यूनतम से न्यूनतम है। पत्थर को पत्थर से कैसे जोड़ेंगे? तो जितनी पत्थर की आयु, उतनी आयु तांबा की होती है तो तांबे से जोड़ेंगे। अब यह टेक्निक कौन जानता है? कहीं इस प्रकार की तकनीक का अध्ययन नहीं है। कोई किताब नहीं, कहीं पढ़ाया नहीं जाता। तो यहां जो कुछ हुआ सब एक प्रकार का रिसर्च भी हुआ और कार्य भी हुआ। अगर केवल हम कहेंगे कि ट्रस्ट के माध्यम से हुआ तो शायद हम सच्चाई से बहुत दूर जाएंगे।

श्री राम जन्मभूमि मंदिर राष्ट्रीय गौरव के पुनर्जागरण का प्रतीक : डॉ. मोहन राव भागवत

मंदिर निर्माण का दायित्व एलएंडटी ने लिया, उन्होंने कम से कम 250 वेंडर्स का सहयोग लिया और इन सब वेंडर्स के साथ 6000 कारीगर अपने-अपने स्थानों पर अयोध्या में काम करते रहे। यह समाज के स्वैच्छिक समर्पण से बना हुआ स्थान है।

42 दिन में 10 करोड़ लोगों का समर्पण : जन-जन का मंदिर

चम्पत राय जी ने कहा कि मंदिर निर्माण में सबका योगदान है, 42 दिन में 10 करोड़ लोगों ने योगदान दिया। लगभग एक लाख कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर हाथ फैलाया, और शायद हिन्दुस्तान का पहला प्रयोग माना जाएगा कि 42 दिन में 3000 करोड़ बैंक में आ गया। स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक की कम से कम 25,000 ब्रांच बैंक शाखाओं के माध्यम से धन ट्रांसफर होकर अयोध्या पहुंचा। मंदिर निर्माण के लिए समाज ने धन दिया है।

यह हिन्दुस्तान के गौरव का मंदिर है। आपके सम्मान का मंदिर है और हम सबको अपने को भाग्यशाली ही मानना चाहिए कि हमारे रहते हुए यह काम पूरा हुआ।

राम मंदिर एक पड़ाव है, अभी ‘राम राज्य’ लाने का संकल्प बाकी

गोविंददेव गिरी जी महाराज ने कहा कि डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति ने यद्यपि इसे सम्मान कहा होगा। हम पूज्य डॉक्टर जी के प्रसाद के रूप में उसका स्वीकार करते हैं। पूज्य डॉक्टर जी की प्रेरणा 100 वर्षों से कार्य कर रही है और उसी के फलीभूत हम आज उस ऊंचाई तक पहुंच गए हैं, जहां पहुंचना बहुत कठिन लगता था। बहुत कठिन लगता था क्योंकि वातावरण इस प्रकार का था। भगवान श्री राम का मंदिर बनाने का प्रयास तो हम लोग कर रहे थे। लेकिन ऐसे-ऐसे लोग सत्ता में बैठे थे जो सर्वोच्च न्यायालय में जाकर एफिडेविट दे रहे थे कि भगवान श्री राम काल्पनिक हैं। भगवान श्री राम हुए ही नहीं और रामसेतु भी मैनमेड नहीं है। भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारने, उनको काल्पनिक बताने जैसे वातावरण से यहां तक कि जो अत्यंत कठिन यात्रा हो सकी है। इसका कारण केवल और केवल संघ की शिक्षा और संघ की दीक्षा है। संघ ने हम लोगों को सहना सिखाया। सह करके भी प्रलोभनों से दूर रहना सिखाया। यह सिखाया कि जो कुछ करना है, वह अपने लिए नहीं करना है।

रक्तरंजित सरयू से दीप प्रज्ज्वलित सरयू तक

तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें, इस प्रकार के मंत्र को लेकर प्रयास करने वाले अगणित लोग एक शताब्दी तक काम करते रहे हैं। मंदिर का निर्माण केवल मंदिर निर्माण की प्रक्रिया  आरंभ हुआ, उससे नहीं हुआ है। एक शताब्दी तक जो यज्ञ चला है, उस यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में यह मंदिर खड़ा हुआ है। प्रतिनिधि के रूप में याद करना चाहता हूं। हमारे परम पूज्य अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी, हमारे सभी संतों के प्रतिनिधि हैं, प्रतीक हैं। इसलिए हम अपनी वाणी से उनका पूजन करते हैं। हम अपनी वाणी से उनका अभिनंदन करते हैं।

आजकल मैं अपनी कथा में कहते रहता हूं, मंदिर भव्य बनाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। यह तो हो गया। राम राज्य भी लाएंगे, यह अभी तक हम लोगों का कार्य बाकी है। राम जी का मंदिर यह पूर्णाहुति नहीं है। यह वाक्य का पूर्ण विराम नहीं है। अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र का जो न्यास बनाया गया, उसमें भी यह बात उल्लेखित है कि हम लोगों को आगे जो प्रयास करना है, वह राम राज्य के लिए करना है और इसलिए जिनका सम्मान किया गया, उन लोगों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह अंतरिम है, इंटरवल का प्रसाद है। आगे हम लोगों को अभी तक बहुत काम करना है। यह अब तक का प्रसाद है और आगे के लिए पाथेय है। यह मार्गक्रमण हम लोगों को करना ही होगा।

“यश से ज्यादा, सार्थकता जरूरी”: नागपुर में RSS सरसंघचालक जी ने बताया सफलता का असली मंत्र, गडकरी-फडणवीस भी रहे मौजूद

भगवान श्री राम हमारे राष्ट्र जीवन के सर्वोच्च आदर्श है। आसेतु हिमालय संपूर्ण भारत को बांधने वाला यदि कोई एक शब्द है तो वह शब्द राम ही हो सकता है। प्रभु ने सबको जोड़ कर अपना कार्य किया। लेकिन यह कार्य करते समय भगवान को भी तपना पड़ा। भगवान को भी बहुत बहुत कष्ट झेलने पड़े। उनको भी वनवास सहना पड़ा। इसीलिए राम बन गए। भगवान श्री राम के सारे गुणों की परीक्षा उनके वनवास काल में होती है।

संघ देशभक्ति पढ़ाने वाला एक खुला विश्वविद्यालय है और इसलिए इस देश की सेवा करना, इस देश की भक्ति करना या एकमात्र मंत्र देकर और सारे स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्रों में जो-जो काम करते रहे हैं, उन कामों ने अब रंग लाया है। लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। जो पाया वो अच्छा है, लेकिन जो खोया उसको भी भूल नहीं जाएं। ऐसा विचार करके सतत अभी भी कार्य करते रहना पड़ेगा।

सम्मानित विभूतियाँ : मंदिर निर्माण के मुख्य सूत्रधार

इन विभूतियों का हुआ सम्मान —

  • 1) . श्री नृपेन्द्र जी मिश्र,
  • 2). श्री जगदीश जी आफळे,
  • 3). श्री गिरीश जी सहस्त्रभोजनी,
  • 4). श्री जगन्नाथ जी गुळवे,
  • 5). श्री आशिष जी सोमपुरा,
  • 6). श्री निखिल जी सोमपुरा,
  • 7). श्री अरुण जी योगिराज,
  • 8). श्री जय काकतीकर जी,
  • 9). श्री मनिष जी त्रिपाठी,
  • 10). श्री सत्यनारायण जी पाण्डे,
  • 11). श्री अनिल जी सुतार,
  • 12). श्री केशव जी शर्मा,
  • 13). श्री विनोद जी शुक्ला,
  • 14). श्री राजीव जी दुबे,
  • 15). श्री मनीष जी दाधीच,
  • 16). श्री विनोद जी मेहता,
  • 17). श्री अंकुर जी जैन,
  • 18). श्री राजू कुमार सिंह जी,
  • 19). श्री ए. वी. एस. सूर्या श्रीनिवास जी,
  • 20). श्री नरेश जी मालवीय,
  • 21). श्री परेश जी सोमपुरा,
  • 22). श्री नाथ अय्यर जी,
  • 23). श्री संजय जी तिवारी,
  • 24). श्री शरद बाबू जी,
  • 25). श्री अनिल जी मिश्र,
  • 26). श्री गोपाल जी,
  • 27). श्री चम्पतराय जी,
  • 28). पू. गोविंददेव गिरी महाराज जी,
  • 29). श्री वासुदेव जी कामत,
  • 30). श्री रमजानभाई जी
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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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