भारत में इनदिनों प्रदर्शन चल रहे हैं। औरतों को आजादी देने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर मर्दों के खिलाफ रचनात्मक नारे गढ़े जा रहे हैं। राहुल गांधी भी स्मैश द पैट्रियार्की बोल चुके हैं। मगर कांग्रेस के ही एक नेता अपने ही समुदाय की लड़कियों को यह आजादी नहीं देना चाह रहे कि वह नास्तिकता वाले सोशल मीडिया पेज को फॉलो करें?
क्या कहा कांग्रेस नेता के एम शाजी ने?
29 सितंबर को केरल में कांग्रेस के मंत्री के एम शाजी ने कहा था कि मुसलमान समुदाय अपनी लड़कियों पर ध्यान नहीं दे रहा है। राज्य की मुस्लिम महिलाएं नास्तिकता की तरफ मुड़ रही हैं। राज्य में मुसलमान महिलाओं में सोशल मीडिया पर नास्तिक विचारधारा को प्रमोट करने वाले पेजों को फॉलो करने का चलन बढ़ा है। शाजी ने इसे बहुत ही खतरनाक चलन कहा।
यह हैरान करने वाली बात है कि पैट्रियार्की को स्मैश करने वाले राहुल गांधी को अपने मंत्री शाजी का मुसलमान महिला विरोधी चेहरा नहीं दिखा? उन्हें यह नहीं दिखा कि कैसे मंत्री अपने समुदाय की लड़कियों को भेड़ समझकर हांकना चाहते हैं कि वह सोशल मीडिया पर भी केवल उन्हीं के अनुसार बताए गए पेजों को देखें?
लोकल सेल्फ गवर्नमेंट के मंत्री शाजी कोझिकोड में एक सरकारी कॉलेज में डिपार्ट्मन्ट ऑफ मलयालम द्वारा आयोजित एक चर्चा में अपनी बात रख रहे थे। यह और भी हैरान करने वाली बात है।
एक सरकारी कॉलेज में जाकर प्रगतिशीलता का विरोध क्यों?
शाजी ने यह भी कहा कि मुसलमान लड़कियों में नास्तिकता को लेकर जो परिवर्तन हो रहे हैं, उन्हें केवल प्रगति नहीं कहा जा सकता है। क्या समुदाय को इस विषय की चिंता है कि ये लड़कियां कितनी आगे जा चुकी हैं और वे कितना बढ़ चुकी हैं?
मौलाना रशीदी के भी ऐसे ही विचार
ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के प्रमुख मौलाना रशीदी भी इसी तरह के विचार रखते हैं। उन्होंने इस पर चिंता जताई कि मुसलमान लड़कियां हिंदू लड़कों से शादी कर रही हैं। इस बात की चिंता है कि मुसलमान लड़कियां बहुत तेजी से हिंदू और नास्तिक लड़कों के प्रति आकर्षित हो रही हैं।
रशीदी का कहना है कि कुछ मुसलमान लड़कियां सोशल मीडिया पर हिंदू लड़कों या उनकी प्रोफाइल से प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने साफ कहा कि मुसलमान लड़कियां इसलिए गैर मुस्लिम लड़कों की तरफ आकर्षित होती हैं, क्योंकि मुसलमान परिवार में उन्हें मजहब के उसूलों और बंदिशों के बारे में बताया जाता है, जबकि नास्तिक या हिंदू लड़कों के साथ बात करते समय उन्हें इनका दबाव महसूस नहीं होता। उनका यह भी दावा है कि इसके चलते हजारों की संख्या में मुसलमान लड़कियों ने अपना मजहब छोड़ दिया है। मौलाना ने मुस्लिम लड़कियों और हिंदू लड़कों की शादी को नाजायज बताते हुए कहा कि जब तक हिंदू लड़का इस्लाम नहीं अपना लेता, तब तक यह शादी जायज नहीं मानी जा सकती है।
कुछ प्रमुख सोशल मीडिया पेज, जिनसे मची है हलचल
केरल में पिछले काफी दिनों से एक्स मुस्लिम आंदोलन जोर पकड़ रहा है। Ex-Muslims of Kerala (@keralaexmuslims) पृष्ठ शाजी के बयान के बाद अचानक से ही चर्चा में आ गया। इस पेज पर मुस्लिम लड़कियों के अधिकारों, उनके संपत्ति के अधिकारों और बचपन में ही निकाह और मजहबी मुक्ति की बातें लगातार होती हैं। इस पर काफी संख्या में मुसलमान महिलाएं फॉलोअर्स हैं।
‘एक्स-मुस्लिम ऑफ केरल’ के संस्थापक आरिफ हुसैन के आधिकारिक हैंडल Arif Hussain Theruvath, पर भी होने वाली लाइव डिबेट्स में युवा मुस्लिम महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी जाती है और यही कारण है कि शाजी जैसे लोग चिंतित हैं।
अन्य प्रोफाइल भी हैं। esSENSE Global (@essenseglobalofficial) भी वैज्ञानिक सोच स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देता है। वह ‘Litmus’ जैसे दुनिया के सबसे बड़े नास्तिक सम्मेलनों का आयोजन करता है। उसके पेज और इन आयोजनों में भी युवतियों की संख्या बढ़ रही है।
मौलाना रशीदी की चिंता शायद इंटरनेट पर जो अंतरधार्मिक विवाहों को लेकर पेज बने हैं, उन पर हिन्दू लड़के और मुसलमान लड़कियों के जोड़े देखकर हुई होगी? उनमें हिंदू लड़कियां और मुसलमान लड़कों के भी आंकड़े हैं। उनके ही उदाहरण अधिक हैं। यदि हिन्दू लड़की मुसलमान लड़के से शादी कर प्यार हासिल कर रही है तो वही प्यार हासिल करने की आजादी मुसलमान लड़कियों को क्यों नहीं है?
मुसलमान लड़कियों की आजादी पर बंदिश क्यों?
यहां पर एक प्रश्न खड़ा होता है कि जो नास्तिक पेज हैं, उनमें तो हर धर्म को नकारने की बात है, मगर उसे लेकर केवल मुसलमान समुदाय का चिंतित होना समझ से परे है और यह कहना कि यह खतरनाक ट्रेंड है, क्या मुसलमान महिलाओं की समझ और सोच पर प्रश्नचिह्न नहीं है? क्या मुसलमान महिलाओं और लड़कियों के उस संवैधानिक अधिकार का हनन नहीं है, जिसमें किसी भी धर्म को मानने या न मानने का व्यक्ति को अधिकार है?
कानून के अनुसार किसी भी वयस्क लड़की को यह अधिकार है कि वह अपने मन का पंथ और जीवनसाथी चुन सके, यदि मुसलमान लड़कियां ऐसा कर रही हैं तो इसे लेकर मंत्री से लेकर मौलाना तक हाहाकार क्यों? यह वही पैट्रियार्की है, जिसे खत्म करने का दावा राहुल गांधी करते हैं, मगर वे अपने ही मंत्री और मौलाना रशीदी से यह नहीं पूछ पाते हैं कि भाई अपने समुदाय की लड़कियों को आप लोग प्यार और शादी की आजादी क्यों नहीं दे रहे हैं?
हर समय संविधान की बात करने वाले राहुल गांधी यह प्रश्न नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर मुसलमान महिलाएं जब संविधान के अनुच्छेद में प्रदत्त किसी भी पंथ को मानने या न मानने की आजादी का पालन कर रही हैं, तो उनके रास्ते में शाजी जैसे लोग बाधा क्यों डाल रहे हैं?
कथित लिबरल और फेमिनिस्ट वर्ग की चुप्पी
30 सितंबर से लेकर अभी तक पूरे सात दिन बीत चुके हैं। मगर मुसलमान महिलाओं की आजादी पर हुए इस हमले को लेकर अभी तक कथित लिबरल और फेमिनिस्ट वर्ग की चुप्पी नहीं टूटी है। उन्होंने हमेशा की तरह अपनी आंखें बंद कर ली हैं। दरअसल जो लोग फेमिनिज़्म को नहीं जानते हैं, उन्हें यह बता दें कि मेरा शरीर मेरी आजादी वाला जो व्यक्तिगत पसंद वाला फेमिनिज़्म होता है, वह इन्टरसेक्शनल फेमिनिज़्म के सामने दम तोड़ देता है।
अब आप कहेंगे कि यह क्या होता है? इंटरसेक्शनल फेमिनिज़्म का अर्थ हुआ कि एक महिला की पहचान केवल उसकी लैंगिक नहीं है, बल्कि उसकी धार्मिक पहचान भी होती है। अब वह जिस समुदाय की धार्मिक पहचान को लेकर आई है, उस समुदाय की स्थिति कैसी है? क्या वह अल्पसंख्यक है या बहुसंख्यक? यदि अल्पसंख्यक है तो अल्पसंख्यक की पहचान उसकी महिला होने की पहचान से बड़ी है और कथित अल्पसंख्यक अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए महिलाओं की व्यक्तिगत आजादी पर बंदिश लगा सकते हैं।
वह इंटरसेक्शनल फेमिनिज़्म जो इस विचार के साथ सामने आया था कि एक अश्वेत महिला को दोहरी मार झेलनी पड़ती है, एक समाज के नस्लवाद से और दूसरा अपने ही समुदाय के कट्टरपंथियों से! मगर उसका विकृत रूप भारत में इस रूप में मिलता है कि कथित अल्पसंख्यक कट्टरपंथी मजहबी पहचान को संरक्षित करने के बहाने अपनी महिलाओं की मूलभूत आजादी को भी कतरने लगते हैं और फेमिनिस्ट इसलिए नहीं बोलती हैं, क्योंकि उन पर अल्पसंख्यक विरोधी या कहें इस्लामोफोबिक होने का टैग लग जाएगा।
यही कारण है कि वे लोग न ही तस्लीमा नसरीन के साथ आती हैं और न ही वे केरल की उन अनाम और असंख्य मुसलमान महिलाओं और लड़कियों के साथ हैं जो नास्तिकता वाले पेज को फॉलो कर रही हैं। न ही वे शाजी और मौलाना रशीदी से आंखों में आंखें डालकर यह पूछ पा रही हैं कि क्या मुसलमान युवतियों को अपने मन का पंथ और प्यार चुनने की आजादी नहीं है। यह चुप्पी साबित करती है कि जब तक अधिकारों की लड़ाई में चयनात्मक दृष्टिकोण (Selective Approach) रहेगा, तब तक पैट्रियार्की को कभी ‘स्मैश’ नहीं किया जा सकता।

















