गत 30 सितंबर को पाञ्चजन्य ने मुंबई के ताजमहल पैलेस होटल में ‘छत्रपति संवाद : मुंबई संकल्प’ का आयोजन किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य वी. भागैय्या से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं संपादित अंश
संघ के शताब्दी वर्ष में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का विदेश प्रवास हुआ है और इससे पहले सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी का भी विदेश प्रवास रहा। इसे किस व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए? क्या यह केवल विदेशों में बसे भारतीयों और हिंदू समाज से संपर्क बढ़ाने का प्रयास है या भारत की सभ्यतागत दृष्टि को लेकर एक व्यापक वैश्विक संवाद भी आकार ले रहा है?
पूजनीय सरसंघचालक जी ने अमेरिका के प्रवास में कहा कि विश्वगुरु बनने के पहले भारत को विश्व बंधुत्व स्थापित करना है। मित्रता सारे विश्व से हो, यह सबसे बड़ी आवश्यकता है। हमारे पूर्वजों ने सारे विश्व में मित्रता और सेवा का भाव पहुंचाया है। मैं पिछले 15 साल से अमेरिका जाता रहता हूं। आपमें भी बहुत लोग गए होंगे। फीनिक्स नगर के पास ग्रैंड कैन्यन नाम का एक पर्वतीय क्षेत्र है। मैं उसे देखने गया था। वहां एक गाइड मुझे दिखा रहा था। उसने तीन पहाड़ों की ओर इशारा करके कहा कि इनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं। मैं तो हंसने लगा। यह 2016 की बात है। उसने कहा, नहीं, आप इसे ध्यान से देखिए।
अमेरिका की एक डॉक्यूमेंटरी है, मैंने वह डॉक्यूमेंटरी देखी। उसमें बताया गया था कि बहुत समय पहले भारत से कुछ महान लोग वहां आए और उन्होंने सभ्यता तथा संस्कृति की शुरुआत की। उनके सम्मान में उन तीन पहाड़ों के नाम ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर रखे गए। यह न संघ ने किया, न आज की सरकार ने। हमारे पूर्वजों ने किया। उस समय न विमान था, न रेलगाड़ी, न मोबाइल और न इंटरनेट। यह भारत का दायित्व है। भारत का स्वभाव है कि वह पूरे विश्व में प्रेम, सेवा, समर्पण और सहकारिता का भाव पैदा करे। इसी उद्देश्य से संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पूजनीय सरसंघचालक जी और माननीय सरकार्यवाह जी का दुनिया के विभिन्न देशों में प्रवास हुआ। वे लोगों से मिले, संवाद किया और विश्व बंधुता स्थापित करने का प्रयास किया। इसे इसी दृष्टि से देखना चाहिए। इसका लाभ देश और दुनिया, दोनों को मिल रहा है।
विदेशों में संघ से प्रेरित संगठनों को लेकर भी जिज्ञासा रहती है। भारत में संघ की शाखा व्यवस्था है, लेकिन विदेशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं। इन संगठनों का मूल उद्देश्य क्या है? भारतीय मूल का व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहते हुए जिस देश का नागरिक है, उसके प्रति अपने नागरिक कर्तव्यों और निष्ठा को किस प्रकार साधता है? क्या दूसरे देश में हिंदू समाज का संगठन उस देश के प्रति उसकी निष्ठा को प्रभावित करता है?
सबसे पहले यह समझना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व के दूसरे देशों में काम नहीं करता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत तक सीमित है। राष्ट्र यानी राष्ट्रीयता की बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए। लेकिन दुनिया के अनेक देशों में हिंदू रहते हैं। वहां के हिंदू समाज का संगठन होना चाहिए। जो स्वयंसेवक व्यापार, पढ़ाई, विज्ञान या अन्य कारणों से विदेश गए, उन्होंने वहां हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास किया। ये स्वतंत्र और अलग-अलग संगठन हैं तथा उन देशों में उनका हिंदू समाज के नाम पर रजिस्ट्रेशन भी होता है। भारत में हिंदू के नाम पर रजिस्ट्रेशन होना कई बार कठिन हो जाता है। यह एक विचित्र स्थिति है। वहां के हिंदू समाज ने संगठित होकर एकता का प्रयास किया, क्योंकि वहां भी हिंदू समाज धार्मिक, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग संगठित रहा है। उदाहरण के लिए तेलुगु बोलने वाले लोगों के भी चार-पांच संगठन अलग-अलग हो सकते हैं।
इन सबको मिलाकर हिंदू समाज में एकता का प्रयास करना आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से इनका प्रेरणा का संबंध हो सकता है, लेकिन संगठन स्वतंत्र हैं। संघ की अपेक्षा यह है कि जो हिंदू जिस देश में रहता है, वह देश उसकी कर्मभूमि है। वहां के नियमों के अनुसार जीवन जीना और उस देश के प्रति पूरी निष्ठा से काम करना उसका दायित्व है। वहां के हिंदू हिंदुत्व के आधार पर जीवन जिएं। सादगी, प्रेम, करुणा, समर्पण, समन्वय और सहकारिता का भाव रखें। प्रभुत्व और हिंसा का भाव नहीं होना चाहिए। वह देश उनकी मातृभूमि है। इसलिए मातृभूमि के प्रति संवेदना और निष्ठा रहनी चाहिए। संघ की यही अपेक्षा है। सारी दुनिया में जहां-जहां हिंदू हैं, वहां के स्थानीय लोग भी हिंदू समाज को सम्मान के साथ देखते हैं। मैंने स्वयं यह देखा है। हमारे लोग विनम्र, सेवाभावी और परिश्रमी हैं। वे हिंसा में विश्वास नहीं करते। इसी आचरण के कारण वे अपने साथ-साथ भारत के लिए भी सम्मान पैदा करते हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में संघ और हिंदुत्व को लेकर कुछ आलोचनात्मक अभियान दिखाई दिए हैं। इनमें अल्पसंख्यक अधिकार, हिंदू राष्ट्र, जाति व्यवस्था, राजनीति और संघ से प्रेरित संगठनों के प्रभाव जैसे विषय उठते हैं। इनमें कौन से प्रश्न गंभीर विमर्श की मांग करते हैं और किन विषयों पर अधूरी जानकारी या वैचारिक पूर्वाग्रह के कारण धारणाएं बनी हैं? क्या विदेशों में संघ और हिंदुत्व को लेकर अधिक प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता है?
विदेशों में संघ या हिंदुत्व के नाम पर जो विरोध होता है, उसका एक आधार भारत में चलने वाले कुछ आरोपों में है। कुछ लोग विदेशों में जाकर यह कहते हैं कि संघ भारत में अल्पसंख्यकों के विरोध में काम करता है या जहां संघ है वहां अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। यह धारणा गलत है। संसद में भी इस विषय पर चर्चा हुई है। जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहां अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं। जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं, वहां हिंदुओं की सुरक्षा का प्रश्न उठता है। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल और बंगाल तक इसके उदाहरण सामने आते हैं। हिंदुत्व किसी के विरोध में नहीं है। सरसंघचालक जी ने अमेरिका, लंदन और कनाडा में भी कहा कि हिंदुत्व संज्ञा नहीं, विशेषण है। हिंदुत्व समावेशी है। वह किसी के प्रति विरोध का विचार नहीं है और हिंसा में विश्वास नहीं करता। हिंदुत्व में प्रेम, करुणा, तपस्या और शुचिता है। वह सबको जोड़ने वाला विचार है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति और जनजाति के विषय में भी संघ का स्पष्ट मत है। जन्म के आधार पर विषमता को संघ स्वीकार नहीं करता। सरसंघचालक जी ने स्पष्ट कहा है कि यदि किसी शास्त्र में जन्म के आधार पर विषमता का समर्थन मिलता है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद विदेशों में कई बार संघ और हिंदुत्व को लेकर ऐसी धारणाएं प्रचारित की जाती हैं। इसलिए मूल हिंदुत्व क्या है, इसे समझना आवश्यक है।
संघ के शताब्दी वर्ष को लेकर कुछ प्रश्न बार-बार उठते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका, महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध, संविधान के प्रति संघ का दृष्टिकोण, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, अल्पसंख्यकों से संबंध और भाजपा के साथ संघ के संबंध जैसे विषयों पर लंबे समय से बहस होती रही है। क्या शताब्दी वर्ष में ऐसा अवसर नहीं होना चाहिए जब इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रमाण, दस्तावेज और ऐतिहासिक अभिलेखों के साथ समाज के सामने रखे जाएं, ताकि आगे की चर्चा आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रमाणित तथ्यों पर हो?
अवश्य होना चाहिए। लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि जो सोए हैं उन्हें जगाया जा सकता है, जो जागे हैं उन्हें भी समझाया जा सकता है, लेकिन जो जागते हुए भी सोने का नाटक करते हैं, उन्हें उठाना कठिन है। इस देश में जो चर्चा होती है, उसमें बहुत लोगों को तथ्य मालूम हैं। दस्तावेज भी उपलब्ध हैं। फिर भी निहित स्वार्थ, मतिभ्रम या विदेश से प्रेरणा के कारण कुछ लोग वही प्रश्न बार-बार उठाते हैं। अनुसूचित जाति के विषय में संघ का आचरण स्पष्ट है। संघ में स्पृश्य-अस्पृश्य का कोई भेद नहीं है। डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर 1939 में पुणे में संघ की शाखा में आए थे। उन्होंने संघ के काम की प्रशंसा भी की थी। हिंदू राष्ट्र के विषय में भी स्पष्टता आवश्यक है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ धार्मिक राज्य नहीं है।
भारत में अशोक के काल को छोड़ दें तो भारत की राज्य व्यवस्था कभी केवल पंथ के आधार पर नहीं चली। शिवाजी महाराज का शासन भी किसी एक रिलीजन के आधार पर नहीं था, वह धर्म के आधार पर था। राष्ट्र का अर्थ केवल राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ राष्ट्र भी है। इसलिए हिंदू राष्ट्र को धार्मिक राज्य के अर्थ में देखना सही नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन की बात करें तो डॉ. हेडगेवार जी बचपन से ही वंदे मातरम आंदोलन से जुड़े थे और इसके कारण उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया था। बाद में गांधी जी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में जेल भी गए। संघ की स्थापना के बाद भी सरसंघचालक का दायित्व अलग रखते हुए एक नागरिक के रूप में वे स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए।
संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में न्यायालय का निर्णय सामने है। लालकिले में हुए मुकदमे में न्यायमूर्ति आत्माचरण ने निर्णय दिया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गांधी जी की हत्या से कोई संबंध नहीं था। सावरकर जी को न्यायालय ने दोषमुक्त किया था। बाद में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री रहते संसद में भी इस विषय पर प्रश्न हुआ और संघ के संबंध में यही बात सामने आई। इसके बावजूद यदि वही आरोप बार-बार दोहराए जाते हैं तो उसके पीछे तथ्य की कमी नहीं, बल्कि अन्य कारण हैं। संघ को कुचलने के अनेक प्रयास हुए, लेकिन संघ आज भी समाज में काम कर रहा है। दस्तावेज उपलब्ध हैं, अभिलेखागार में सामग्री है, प्रकाशित पुस्तकें हैं और न्यायालय के निर्णय हैं। इसलिए शताब्दी वर्ष में इन विषयों को प्रमाण के साथ सामने रखना निश्चित रूप से उपयोगी होगा।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के किशोर जीवन से जुड़ा वंदे मातरम् का प्रसंग संघ के इतिहास का रोचक अध्याय है। विद्यार्थी जीवन में अंग्रेज अधिकारी के निरीक्षण के समय वंदे मातरम् के उद्घोष के कारण उन्हें विद्यालय छोड़ना पड़ा था। आज वंदे मातरम् पर समय समय पर उठने वाले विवादों के बीच संघ इसे केवल राष्ट्रगीत के रूप में देखता है, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के रूप में या भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के व्यापक प्रतीक के रूप में?
हम सब भाग्यवान हैं कि हमारे जीवनकाल में संसद के भीतर वंदे मातरम् और जन गण मन दोनों का सम्मान कायम है। वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम का एक मंत्र बन गया था। जिन लोगों ने देश के लिए बलिदान दिया, उन्होंने वंदे मातरम् कहते हुए अपना जीवन समर्पित किया। वंदे मातरम् संघ ने नहीं लिखा। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा। लेकिन यह स्वतंत्रता संग्राम में एक तारक मंत्र बन गया। वंदे मातरम् में भारत की संस्कृति की अभिव्यक्ति है। ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी’, ‘वाणी विद्यादायिनी’ जैसे भावों में शक्ति और ज्ञान दोनों की अभिव्यक्ति है। भारत की भूमि केवल मिट्टी नहीं है। वह हमारी मातृभूमि है। वह माता है। वेदों में कहा गया है-माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। यह भाव हजारों वर्षों से भारत की संस्कृति में है। स्वामी विवेकानंद अमेरिका से लौटे तो उन्होंने भारत की मिट्टी को माथे से लगाया। यह केवल जमीन नहीं, मातृभूमि का भाव है।
वंदे मातरम् इसी सांस्कृतिक भाव को अभिव्यक्त करता है। हम इस भूमि की संतान हैं। भाषा अलग हो सकती है, पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन मातृभूमि एक है। इसलिए वंदे मातरम् भारत के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और सांस्कृतिक विरासत का एक महान मंत्र है। संघ इसी दृष्टि से इसे देखता है।
n डॉ. आंबेडकर और संघ को अक्सर दो विपरीत ध्रुवों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि अस्पृश्यता, सामाजिक समानता और बंधुत्व जैसे विषयों पर दोनों के विचारों में कुछ महत्वपूर्ण संवाद दिखाई देते हैं। डॉ. आंबेडकर और संघ के बीच प्रत्यक्ष संवाद के कौन से प्रमाणित प्रसंग हैं? और जाति व्यवस्था पर डॉ. आंबेडकर की कठोर आलोचना को संघ किस दृष्टि से देखता है?
मैं पहले भी बता चुका हूं कि बाबा साहेब 1939 में पुणे में संघ की शाखा में आए थे। वे संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी से मिले थे। बाद में भी उनका संघ से संपर्क रहा।
दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का बाबा साहेब से बहुत निकट संबंध था। जब बाबा साहेब ने बौद्ध मत स्वीकार किया, तब भी ठेंगड़ी जी ने उनसे संवाद किया। बाबा साहेब का मानना था कि पीड़ित समाज के भीतर बहुत आक्रोश और वेदना है। उन्हें दिशा देना आवश्यक है। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि यदि उन्हें सही दिशा नहीं मिली तो वे वाम विचारधारा की ओर जा सकते हैं। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। हिंदू समाज में कमियां रही हैं। यह मानने के लिए साहस चाहिए। धर्म श्रेष्ठ हो सकता है, लेकिन समाज का आचरण हमेशा श्रेष्ठ रहा हो, ऐसा नहीं है।
भगवद्गीता में कहा गया है, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।’ गुण और कर्म के आधार को छोड़कर केवल जन्म के आधार पर ऊंच-नीच की व्यवस्था करना उचित नहीं है। जातिगत अहंकार और विषमता के विरुद्ध बाबा साहेब ने जो प्रहार किया, वह महत्वपूर्ण है। समाज में जो दोष आया है, उसके लिए समाज को आत्मचिंतन करना चाहिए। संघ का प्रयास है कि विद्वेष पैदा किए बिना, किसी के प्रति दुर्भावना रखे बिना और हिंसा के बिना समाज में एकात्मता आए। विषमता-मुक्त और एकात्मता-युक्त समाज का निर्माण होना चाहिए। बाबा साहेब और डॉ. हेडगेवार दोनों डॉक्टर थे, दोनों महाराष्ट्र से थे, दोनों साधारण परिवारों से आए और दोनों ने बड़े संगठन खड़े किए। उनके जीवन और विचारों के सकारात्मक पक्षों से सीखने की आवश्यकता है।
सामाजिक समरसता आज संघ के पंच परिवर्तन का प्रमुख विषय है। संघ के इतिहास में सामाजिक समता, अस्पृश्यता उन्मूलन, मंदिर प्रवेश, साझा जल स्रोत और साझा श्मशान जैसे विषयों पर कौन से महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं? समरसता को केवल कार्यक्रम के बजाय सामाजिक व्यवहार में कैसे उतारा जा सकता है?
डॉ. हेडगेवार जी का विचार था कि संपूर्ण हिंदू समाज एक परिवार है। शाखा में इसी आधार पर सभी लोग साथ आते हैं। एक सफाई कर्मचारी भी शाखा में आता है और प्रोफेसर रज्जू भैया भी उसी शाखा के स्वयंसेवक हो सकते हैं। शाखा में भारत माता के नाम पर एकात्मता और समरसता का भाव प्रारंभ से रहा है। लेकिन एक बात समझनी चाहिए कि जो व्यक्ति शाखा में आता है, उसके घर में भी उसी क्षण परिवर्तन आ जाए, इसकी गारंटी नहीं होती। परिवार में पत्नी, माता, पिता, बेटा, बेटी और बहू सभी के व्यवहार में परिवर्तन आने में समय लगता है। यह लंबी प्रक्रिया है। डॉक्टर हेडगेवार जी के समय का एक प्रसंग है।
नागपुर के एक शिविर में कुछ लोगों ने कहा कि वे सबके साथ भोजन नहीं करेंगे। बालासाहेब देवरस ने पहले कहा कि जो नहीं आना चाहते, वे न आएं। डॉक्टर साहब को पता चला तो उन्होंने कहा कि उन्हें बुलाओ। पहले दिन उन्हें अलग भोजन दिया गया और वे अलग बैठे। दूसरे दिन वे सबके साथ आकर बैठ गए। परिवर्तन इसी तरह धीरे-धीरे आता है। पूजनीय श्रीगुरुजी ने भी सामाजिक विषमता को समाप्त करने की आवश्यकता पर स्पष्ट विचार रखा। बाद में 1973 में बालासाहेब देवरस ने पुणे की वसंत व्याख्यानमाला में सामाजिक समता और हिंदू संगठन पर महत्वपूर्ण भाषण दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि समाज में जो आक्रोश है, उसके पीछे सदियों की पीड़ा है और उसे समझना आवश्यक है। इसके बाद सामाजिक समरसता का विषय व्यापक रूप से समाज के सामने आया।
डॉ. आंबेडकर के कालाराम मंदिर आंदोलन का भी उदाहरण है। उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिला था। बाद में 2015 में उसी नासिक में कालाराम मंदिर के महंत के पौत्र ने सार्वजनिक रूप से अपने दादा की गलती के लिए क्षमा मांगी। हजारों लोग वहां उपस्थित थे। पूजनीय मोहन जी भी उस कार्यक्रम में थे। वहां अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के लिए छात्रावास भी चलाए गए। पूज्य पेजावर स्वामी जी ने भी बस्तियों में जाकर लोगों से संपर्क किया, उन्हें दीक्षा दी और कुछ लोगों को संन्यास भी दिया। वेद शिक्षा का काम भी हुआ। समरसता कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। सामूहिक भोजन कर लेना मात्र समरसता नहीं है। सहज आत्मीय संबंध ही समरसता का आधार है।
महिलाओं की भूमिका को लेकर संघ से सबसे अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। संघ में महिलाओं की अलग संगठनात्मक व्यवस्था क्यों है? और संघ की दूसरी सदी में महिलाओं की संगठनात्मक तथा निर्णयकारी भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुरुषों में व्यक्ति निर्माण का काम करता है और राष्ट्रीय सेविका समिति महिलाओं में काम करती है। दोनों स्वतंत्र संगठन हैं। संघ की शाखा में खेल, शारीरिक गतिविधियां और अन्य प्रशिक्षण होते हैं। भारतीय सामाजिक पद्धति में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग संगठनात्मक व्यवस्था रखी गई है। राष्ट्रीय सेविका समिति 1936 से महिलाओं में काम कर रही है। महिलाओं में शारीरिक प्रशिक्षण, योग, खड्ग, संचलन आदि का काम समिति स्वयं करती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका नहीं है। भारत की महिला मातृमूर्ति है। उसमें लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती तीनों के भाव हैं।
विश्व हिंदू परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, सेवा भारती और अन्य अनेक संगठनों में महिलाएं नेतृत्व की भूमिकाओं में हैं। भारतीय मजदूर संघ में कई राज्यों की अध्यक्ष महिलाएं हैं। अखिल भारतीय स्तर पर भी महिलाएं उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे पदों पर काम कर रही हैं। सेवा भारती में भी अखिल भारतीय स्तर पर महिला नेतृत्व की भूमिका है। भारत की परंपरा में महिलाओं ने प्रशासन और नेतृत्व किया है। महाभारत में द्रौपदी का उदाहरण है। वे बड़े आयोजन की व्यवस्था संभालती थीं। रानी अहिल्याबाई होलकर का उदाहरण सामने है।
आज की युवा पीढ़ी प्रश्न करती है, प्रमाण मांगती है और डिजिटल माध्यमों के कारण दुनिया से तत्काल जुड़ी हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उसके सामने विचारों का बहुत बड़ा संसार खोल दिया है। ऐसे युवा को संघ क्या दे सकता है जो उसे इंटरनेट, विद्यालय, बाजार या राजनीतिक संगठन से नहीं मिलता? और दूसरी ओर, नई पीढ़ी संघ की भाषा, कार्यपद्धति और प्राथमिकताओं में क्या परिवर्तन ला सकती है?
यह मानना ठीक नहीं है कि पहले युवा प्रश्न नहीं पूछते थे और आज ही प्रश्न पूछते हैं। भारतीय परंपरा में प्रारंभ से प्रश्न पूछने की परंपरा रही है। उपनिषदों को देखिए, वहां प्रश्न हैं। ‘यह क्यों हुआ?’ जैसे प्रश्न पूछे गए हैं। बुद्धिहीनता से किसी बात को मान लेना भारतीय परंपरा नहीं है। प्रश्न करना और प्रमाण देखना हमारी परंपरा है। आज प्रमाण प्रयोगशाला में है, पहले अनुभूति का प्रमाण था। संत-महात्माओं ने अनुभूति की और उसके आधार पर उत्तर दिए। तकनीकी, कंप्यूटर और इंटरनेट एक साधन हैं। प्रश्न यह है कि वे किसके लिए हैं? मनुष्य के लिए हैं। मनुष्य के पास हृदय है, संवेदना है और मानवता है।
आज के युवाओं में संवेदना बहुत है। कुछ संगठित समूहों की गतिविधियों को देखकर पूरे युवा समाज के बारे में धारणा नहीं बनानी चाहिए। संघ का प्रयास है कि युवाओं में सेवा, संयम, समाज के लिए समर्पण और वंचित वर्गों के प्रति संवेदना का भाव विकसित हो। आज आईआईटी, हैदराबाद के विद्यार्थी भी सेवा कार्यों में हमारे साथ काम करते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में जाते हैं। आज के युवा की भाषा में बात करनी होगी। यदि हृदय में निर्मलता हो, निजी स्वार्थ न हो और राजनीतिक दुर्गंध न हो, तो युवा साथ आने के लिए तैयार हैं। आज के युवाओं में देशभक्ति है, संवेदना है और ऊर्जा है। आवश्यकता है कि उस ऊर्जा को सही दिशा मिले। आंदोलन करना गलत नहीं है। संविधान के आधार पर अपनी बात रखना भी लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा नहीं होनी चाहिए।
2047 में स्वतंत्र भारत की शताब्दी के समय आप भारत को किस रूप में देखते हैं? उस समय संघ की भूमिका क्या होगी?
भारत को महान देश बनना चाहिए। संघ की दृष्टि में भारत विश्वगुरु बने, लेकिन विश्वगुरु प्रभुत्व के आधार पर नहीं, पवित्रता और मानवता के आधार पर बने। भारत के समाज में संपूर्ण एकात्मता आनी चाहिए। राष्ट्रीय एकीकरण केवल प्रशासनिक व्यवस्था से नहीं, हृदय और आचरण से होना चाहिए। भारत के लोगों में अपने देश के प्रति भक्ति और श्रद्धा हो तथा जीवन में सादगी हो। प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, लेकिन लालच को नहीं। जब मनुष्य प्रकृति का शोषण करता है तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है और उसके परिणाम आज पूरी दुनिया देख रही है।
2047 तक हमें अपने जीवन में संयम लाना होगा। सुख चाहिए, लेकिन विलासिता की अंधी दौड़ नहीं चाहिए। जहां प्रकृति का शोषण हो रहा है, उसे कम करना होगा और प्रकृति का पोषण करना होगा। इसके साथ आर्थिक विकास भी होना चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था बढ़े, लेकिन ग्रामीण भारत की स्थिति भी बदले। जो युवक और युवती गांव में रहकर मेहनत करते हैं, उन्हें गांव में रहते हुए सम्मानजनक आय का अवसर मिलना चाहिए। संघ के स्वयंसेवक इस दिशा में काम कर रहे हैं। 2047 का भारत ऐसा हो, जिसमें आर्थिक विकास हो, सामाजिक समरसता हो, पर्यावरण का संरक्षण हो, परिवारों में जीवन मूल्य हों और हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिले। संघ के स्वयंसेवक इसी दिशा में अपने स्तर पर काम करते रहेंगे।

















