पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : महिला सुरक्षा तार-तार
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पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : महिला सुरक्षा तार-तार

पश्चिम बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति भयावह है। आंकड़ों में इसकी झलक मिलती ही है, इसे साबित करती घटनाएं भी सामने आती रहती हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 15, 2026, 08:49 pm IST
in विश्लेषण, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में एक महिला मुख्यमंत्री का नेतृत्व होने के बावजूद महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। एनसीआरबी के आंकड़े, अपराध की सघनता और महिला अपराधों के मामले में दोषसिद्धि की खराब दर- ये सारे राज्य में महिला सुरक्षा की चिंताजनक स्थिति का आभास देते हैं। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को दर्ज करने में आनाकानी किस हद तक संस्थागत हो चुकी है, इसका अंदाजा सुर्खियों में रहे मामलों में भी पुलिस के व्यवहार से लग जाता है। स्थिति यह है कि कोलकाता की 68 फीसद महिलाएं खुद को असुरक्षित मानती हैं और 72 फीसद छात्राएं छेड़छाड़ की घटनाओं को रिपोर्ट ही नहीं करतीं जबकि इसे सबसे ‘सुरक्षित शहर’ मना जाता है।

एसिड हमले में शीर्ष पर

एसिड हमला महिलाओं के खिलाफ होने वाले सबसे जघन्य अपराधों की श्रेणी में आता है। इस मामले में पश्चिम बंगाल देश में शीर्ष पर है। स्थिति यह है कि भारत में होने वाले हर 4.3 एसिड अटैक में से 1 पश्चिम बंगाल में होता है। 2023-24 के दौरान देश में कुल 210 एसिड अटैक हुए जिनमें से 48 अकेले पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए। और अगर इसे हम आबादी की तुलना में देखें तो स्थिति और भयावह हो जाती है। उत्तर प्रदेश की आबादी 24 करोड़ है और 2023 में वहां एसिड अटैक के 18 मामले दर्ज किए गए जबकि बंगाल की आबादी 10 करोड़ है लेकिन वहां 48 हमले हुए। यानी उत्तर प्रदेश की तुलना में आबादी आधी से भी कम होने के बावजूद एसिड हमले ढाई गुना अधिक हुए।

बलात्कार और ‘अपराध की सघनता’

बलात्कार के मामले में भी एनसीआरबी के आंकड़े एक अलग तरह की चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2011 में राज्य में बलात्कार के 2,363 मामले हुए थे जबकि 2023 में 1,110 मामले दर्ज किए गए जो मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से कहीं कम है। इसके अलावा 2023 में देश में प्रति एक लाख आबादी पर बलात्कार की दर 4.1 थी जबकि पश्चिम बंगाल में केवल 2.2, लेकिन यह संदेह के घेरे में है और इसके कई कारण हैं।

एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2022-23 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में देश में दोषसिद्धि दर 26.8% रहा, वहीं बंगाल में यह मात्र 3.7% से 4% के बीच है। इसका मतलब है कि राजस्थान की तुलना में बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधी के कानून से बच निकलने की आशंका 7 गुना अधिक है। इसके साथ ही अपराध की सघनता के मामले में भी पश्चिम बंगाल की स्थिति चिंताजनक है। बंगाल में प्रति 100 वर्ग किमी क्षेत्र में बलात्कार की दर 4.7 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 2.8 है। इसका अर्थ है कि भौगोलिक रूप से बंगाल के छोटे दायरे में ज्यादा बलात्कार होता है।

दर्ज नहीं होते मामले

एनसीआरबी ने ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट (2022-2023) में उल्लेख किया है कि पश्चिम बंगाल से प्राप्त आंकड़े “अपूर्ण” या “संदिग्ध” प्रतीत होते हैं। आंकड़ों की संदिग्धता की आशंका आरजी कर और संदेशखाली जैसे चर्चित प्रकरणों से मजबूत होती है। आकड़ों को संदिग्ध बनाने वाला एक और तथ्य है। कोलकाता को ‘सबसे सुरक्षित शहर’ का दर्जा केवल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां 0.0 की दर से अपराध रिपोर्ट किए जाते हैं, जिसे एनसीआरबी “सांख्यिकीय रूप से असंभव” मानता है। ‘कोलकाता विमेंस कलेक्टिव’ की रिपोर्ट एनसीआरबी की आशंकाओं को सही साबित करती है।

इसका सर्वेक्षण कोलकाता में महिलाओं की सुरक्षा की वास्तविक स्थिति को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। सर्वे में शामिल 68% महिलाओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे सूर्यास्त के बाद सार्वजनिक पार्कों, बस स्टैंड और कम रोशनी वाली सड़कों पर खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। जबकि 54% महिलाओं ने माना कि आपात स्थिति में वे पुलिस को बुलाने में हिचकिचाती हैं क्योंकि उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं। 72% छात्राओं ने बताया कि लोकल ट्रेनों और बसों में ‘पीक ऑवर्स’ के दौरान छेड़छाड़ की वे सामाजिक डर के कारण रिपोर्ट नहीं करतीं।

वैसे, अपराध रिपोर्ट नहीं करने की बात केवल यह सर्वे नहीं करता। कोलकाता स्थित एक प्रमुख थिंक-टैंक ‘पॉलिसी रिसर्च ग्रुप’ (2025) की रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लगभग 40% अपराध पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंच ही नहीं पाते। इसका मुख्य कारण स्थानीय राजनीतिक बाहुबलियों का खौफ है।

सुंदरवन से दिल्ली के ‘कोठों’ तक

संयुक्त राष्ट्र मादक द्रव्य एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार रीना सुंदरवन के एक छोटे से गांव रहती थी। 2021 में चक्रवात ने उसका घर-खेत बर्बाद कर दिया। स्थानीय एजेंट ने उसे कोलकाता के एक ‘भले परिवार’ में घरेलू सहायिका का काम दिलाने की पेशकश की।
“मुझे बताया गया था कि बाबू के घर में 8,000 रुपये महीना और खाना मिलेगा। लेकिन हावड़ा स्टेशन पहुंचते मेरा फोन छीन लिया गया। मुझे एक अंधेरी वैन में डाला गया और दो दिनों तक नशीली दवाएं दी गईं। जब आंख खुली, तो मैं कोलकाता में नहीं, दिल्ली के जीबी रोड के एक कमरे में थी।”
रीना को एक ‘मैडम’ को 50,000 रुपये में बेच दिया गया था।
“भागने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे सिगरेट से जलाया और कहा कि अब मेरा परिवार मुझे स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि मैं ‘अपवित्र’ हो चुकी हूं।” छह माह बाद, एक एनजीओ और पुलिस के छापे में रीना को छुड़ाया गया।

घरेलू हिंसा राष्ट्रीय औसत से ऊपर

पश्चिम बंगाल में महिलाएं घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 के 2019-21 के आंकड़ों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में 27% महिलाओं ने अपने पति या रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक हिंसा को झेला। बंगाल लगातार उन राज्यों में शीर्ष पर रहता है जहां पतियों द्वारा क्रूरता (धारा 498A) के मामले सबसे अधिक दर्ज होते हैं। एनसीआरबी की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इस धारा के तहत दर्ज कुल मामलों का एक बड़ा हिस्सा अकेले पश्चिम बंगाल से आता है।

मानव तस्करी का केंद्र

पश्चिम बंगाल मानव तस्करी के लिए भारत के सबसे संवेदनशील राज्यों में है। संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स और अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) और नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी की संस्था की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, सुंदरवन के प्रभावित इलाकों और सीमावर्ती जिलों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद) से लड़कियों की तस्करी के आंकड़े देश में सबसे अधिक हैं।

यूएनओडीसी के सहयोग से तैयार विश्लेषण बताते हैं कि भारत में मानव तस्करी के कुल दर्ज मामलों में से लगभग 20% से 25% अकेले पश्चिम बंगाल से होते हैं। यूएनओडीसी ने अपनी रिपोर्ट में लिखाः “गरीबी, बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएं (जैसे चक्रवात) और रोजगार का अभाव तस्करों को ‘आसान शिकार’ उपलब्ध कराते हैं। तस्कर अक्सर ‘फर्जी विवाह’ या ‘शहरी क्षेत्रों में अच्छी नौकरी’ का लालच देकर युवतियों को जाल में फंसाते हैं।” रिपोर्ट का सार यह है कि पश्चिम बंगाल में मानव तस्करी केवल एक ‘अपराध’ नहीं, बल्कि एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ बन चुकी है।

‘एनीमिया’ की राजधानीः असुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी बंगाल की महिलाओं की स्थिति दयनीय है। एनएफएचएस -5 के अनुसार, राज्य की 71% से अधिक महिलाएं एनीमिक हैं। यह आंकड़ा किसी भी विकसित राज्य के लिए शर्मनाक है। इसके अलावा बंगाल के चाय बागानों और ग्रामीण अंचलों में महिलाओं के बीच ‘तीव्र कुपोषण’ के मामले राष्ट्रीय औसत से 15% अधिक पाए गए हैं।
स्रोतः एनसीआरबी की ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट (2022, 2023, 2024), राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की पश्चिम बंगाल रिपोर्ट, यूएन की मानव तस्करी पर रिपोर्ट (भारतीय खंड), 2025

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