जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय पत्रकारिता की चर्चा होती है, तब लोकमान्य तिलक (केसरी), महात्मा गांधी (यंग इंडिया, हरिजन), श्रीअरविंद (युगांतर) जैसे अनेक नाम स्मरण हो आते हैं। किंतु आश्चर्य का विषय है कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर का नाम प्रायः इस सूची से अनुपस्थित रहता है।
उनकी उपेक्षा के प्रमुख कारण; उनके अनेक लेख छद्म नामों अथवा अनाम रूप से प्रकाशित हुए; वे किसी पत्रिका के दीर्घकालीन आधिकारिक संपादक नहीं रहे; उनके विचारों का प्रचार विभिन्न सहयोगियों द्वारा अलग-अलग पत्रों में हुआ; तथा उनके अनेक लेख विदेशी पत्र-पत्रिकाओं एवं फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाओं में प्रकाशित होने के कारण भारतीय पाठकों तक उनका समुचित परिचय नहीं पहुंच सका। सावरकर की पत्रकारिता मूलतः मिशनधर्मी थी। भारतीय स्वाधीनता और हिंदुओं का पुनरुत्थान उनके जीवन के दो प्रमुख ध्येय थे, जिन्हें वे परस्पर पूरक मानते थे। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उनके पास स्पष्ट कार्ययोजना, अपने विचारों में अटूट विश्वास तथा उन्हें कार्यरूप देने का अदम्य साहस था। इसी ध्येयनिष्ठा और संकल्पबद्धता को ध्यान में रखते हुए यहां उन्हें ‘संकल्प-पूत पत्रकार’ कहा गया है।
पत्रकारिता का कालखंड
उनकी पहली कविता मात्र दस वर्ष की आयु में जगतहितेच्छु में प्रकाशित हुई। पंद्रह–सोलह वर्ष की आयु में लिखा गया उनका लेख ‘हिंदू संस्कृतिचा गौरव’ नासिक वैभव में संपादकीय के रूप में और अंतिम लेख ‘आत्महत्या आणि आत्मार्पण’ सह्याद्री (1964) में प्रकाशित हुआ था। उनका पत्रकारिता-जीवन लगभग इकहत्तर वर्षों तक विस्तृत रहा। उनकी पत्रकारिता के दो सर्वाधिक सक्रिय चरण रहे-1902 – 1910 : पुणे और लंदन का काल, जिसमें उनकी लेखनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सशस्त्र क्रांति से अनुप्राणित रही। 1924-1937 : रत्नागिरि स्थानबद्धता का काल, जिसमें राजनीतिक प्रतिबंधों के कारण उनका लेखन सामाजिक सुधार, जाति-उच्छेदन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा हिंदू समाज के पुनर्गठन पर केंद्रित रहा। इसके साथ ही छद्म नामों से क्रांतिकारी विचारों का प्रसार भी चलता रहा।
पत्रकारिता की दृष्टि से संपादक, संवाददाता और स्तंभकार-ये तीन प्रमुख भूमिकाएं मानी जाती हैं। सावरकर ने तीनों क्षेत्रों में कार्य किया। इसके अतिरिक्त अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बिना किसी औपचारिक पद के भी वे वैचारिक मार्गदर्शक बने रहे। यही उनके पत्रकार-व्यक्तित्व की विशिष्टता है।
संपादक के रूप में
यद्यपि सावरकर किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के औपचारिक संपादक नहीं रहे, तथापि पुणे में छात्रावास के दौरान उन्होंने ‘आर्यन वीकली’ नामक हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया।
आर्यन वीकली
इस पत्रिका में उन्होंने इतिहास, साहित्य, विज्ञान और राष्ट्रभक्ति से संबंधित अनेक लेख लिखे। कालिदास और भवभूति का तुलनात्मक अध्ययन, रामायण और इलियड पर उनका विवेचन तथा ‘सप्तपदी’ जैसे निबंध उनकी असाधारण अध्ययनशीलता के प्रमाण हैं। सप्तपदी में उन्होंने पराधीन राष्ट्र के स्वतंत्र राष्ट्र बनने की सात अवस्थाओं का विवेचन किया था। शि. ल. करंदीकर के अनुसार, इस विषय पर दिए गए उनके व्याख्यान का प्रभाव भालाकार भोपटकर के ‘राष्ट्रीय सप्तपदी’ लेख में दिखाई देता है (94)। दुर्भाग्यवश आर्यन वीकली का अधिकांश साहित्य आज उपलब्ध नहीं है।
श्रद्धानंद
श्रद्धानंद साप्ताहिक वस्तुतः सावरकर के वैचारिक नेतृत्व में संचालित होता था। राजनीतिक कारणों से संपादक के रूप में उनके अनुज डॉ. नारायणराव सावरकर का नाम प्रकाशित किया जाता था, जबकि संपादन और अधिकांश लेखन स्वयं सावरकर करते थे।
इस पत्रिका में क्रांतिकारियों के जीवन-चरित्र, मृत्युलेख, सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता तथा गांधीजी की नीतियों की तार्किक समीक्षा प्रकाशित होती थी। पत्रिका में प्रसिद्ध लेख ‘अत्याचार शब्द का अर्थ’ लेख का अनुवाद सरदार भगत सिंह ने किया था। (भ.द.243)
स्तंभकार के रूप में
सावरकर ने भारत और विदेश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभकार के रूप में लेखन किया। उनका उद्देश्य मात्र घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, आत्मसम्मान और क्रांतिकारी विचारों का प्रसार था।
काल सावरकर की प्रिय पत्रिका थी। वक्तृत्व प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने पर उन्हें यह पत्रिका पुरस्कारस्वरूप मिली थी। बाद में उन्होंने उसमें कार्य करने की इच्छा भी व्यक्त की, यद्यपि ऐसा संभव नहीं हो सका। फिर भी पुणे और लंदन प्रवास के दौरान उनके अनेक लेख काल में प्रकाशित हुए।
विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में योगदान
लंदन और पेरिस से प्रकाशित वंदे मातरम्, Indian Socialist, Talvar, Free Hindustan तथा Gaelic American जैसी पत्र-पत्रिकाओं में सावरकर नियमित रूप से लिखते थे। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता, सशस्त्र क्रांति तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में अपने विचार विश्वभर तक पहुंचाए। कई पत्रों में वे वैचारिक मार्गदर्शक भी रहे।
उन्होंने अपने लेखों का फ्रेंच, जर्मन तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाशित कराया, जिससे भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा। इस दृष्टि से वे भारतीय स्वतंत्रता-संघर्ष के पहले अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों में गिने जा सकते हैं।
यद्यपि गदर पत्र के प्रकाशन के समय सावरकर अंडमान की सेल्युलर जेल में बंद थे, तथापि गदर आंदोलन की वैचारिक प्रेरणा में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। इस पत्र में उनके पूर्व प्रकाशित लेख, ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ तथा उनके विचार निरंतर प्रकाशित होते रहे। इस प्रकार कालापानी में रहते हुए भी उनकी पत्रकारिता अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय बनी रही।
निर्भीक एवं खोजी पत्रकारिता
सावरकर साहसपूर्ण पत्रकारिता का सर्वोत्तम प्रमाण मदनलाल धींगरा के अंतिम वक्तव्य का प्रकाशन है । अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त इस वक्तव्य को सावरकर ने डेविड गार्नेट की सहायता से धींगरा की फांसी से एक दिन पूर्व डेली न्यूज में प्रकाशित कराया। बाद में इसका अनेक यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद कर अमेरिका और यूरोप के प्रमुख समाचारपत्रों तक पहुंचाया गया। ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी में रहकर उसकी दमनकारी नीतियों को इस प्रकार चुनौती देना असाधारण साहस का परिचायक था। आधुनिक खोजी पत्रकारिता की दृष्टि से भी यह घटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
वैचारिक प्रबोधन
सावरकर ने किर्लोस्कर, मनोहर, बलवंत आदि पत्रिकाओं में जाति-उन्मूलन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक सुधार तथा हिंदू समाज के पुनर्गठन पर अनेक लेख लिखे। इन लेखों ने समाज में आत्ममंथन की प्रक्रिया को गति दी। यद्यपि इन पत्रिकाओं में उनके क्रांतिकारी राजनीतिक विचारों को अपेक्षित स्थान नहीं मिलता था, तथापि सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बाद में श्रद्धानंद जैसे पत्र का प्रकाशन हुआ। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में सावरकर का विदेश संवाददाता के रूप में योगदान अत्यंत विशिष्ट है। लंदन पहुंचने के एक माह के भीतर ही उन्होंने वहां से विहारी पत्रिका को नियमित वार्तापत्र भेजना आरंभ कर दिया। पहला वार्तापत्र 17 अगस्त 1906 तथा अंतिम 26 सितंबर 1909 को प्रकाशित हुआ। इन वार्तापत्रों में केवल समाचार नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषण, राष्ट्रभक्ति, व्यंग्य, दूरदृष्टि और प्रखर बुद्धि का अद्भुत समन्वय मिलता है।
उनकी वार्तापत्र-शैली की प्रमुख विशेषताएं
1. उपरोध और व्यंग्य
सावरकर की लेखनी तीक्ष्ण व्यंग्य से ओत-प्रोत थी। इंग्लैंड में जगह-जगह लगे ‘Beware of Pickpockets’ के बोर्ड का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा कि यदि संसार के सभी देशों के द्वार पर कोई सूचना लगनी चाहिए, तो वह होगी-‘अंग्रेज जेबकतरों से सावधान।’ इस प्रकार वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर तीखा व्यंग्य करते थे।
2. ओजस्वी भाषा
सावरकर के वार्तापत्र उनके अन्य लेखन की भांति ही ओजस्विता से परिपूर्ण थे। एक वार्तापत्र में वे लिखते हैं-‘इस (भारत) की खेती में हल तुम्हीं (भारतीयों) को चलाना चाहिए। यदि तुम हल चलाओगे, तो यह भूमि सोना उगलेगी; किंतु यदि कोई दूसरा इसमें हल चलाएगा, तो यही भूमि महामारी, अकाल और परतंत्रता उगलेगी। हे हिंदुस्थान! यदि तू ईश्वर की यह शर्त मानेगा, तो वर्षा आए या न आए, तेरी धरती कोहिनूर उगलेगी, मयूरासन उगलेगी, कालिदास उगलेगी और शिवाजी उगलेगी।’ (20-12-1906)
3. सूक्तिपरक शैली
उनके अनेक वाक्य सूक्तियों के समान प्रतीत होते हैं। उदाहरणार्थ-
• ‘स्वतंत्रता के युद्ध केवल कवायद से नहीं, हृदय से जीते जाते हैं।‘
• ‘कभी न मरने का एकमात्र उपाय है-स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए तत्काल मर जाना।‘
ऐसे वाक्य उनकी पत्रकारिता को साहित्यिक ऊंचाई प्रदान करते हैं।
4. स्वतंत्रता की स्पष्ट अवधारणा
जब अधिकांश राष्ट्रीय नेता होमरूल अथवा सीमित स्वराज्य की बात कर रहे थे, तब सावरकर अपने लेखों में स्पष्ट रूप से पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे। इस दृष्टि से वे भारतीय पत्रकारिता में पूर्ण स्वतंत्रता के सबसे प्रारंभिक समर्थकों में गिने जा सकते हैं।
5. ब्रिटिश साम्राज्य का यथार्थ मूल्यांकन
मि. सीली का हवाला देते हुए सावरकर लिखते हैं- ‘यदि हिंदुस्थान राष्ट्रनिष्ठ बन जाए, तो अंग्रेज एक दिन भी यहां टिक नहीं पाएंगे। इंग्लैंड की दरिद्र नाैसेना हिंदुस्थान को अधिक समय तक अपने नियंत्रण में नहीं रख सकेगा।’ उस समय अधिकांश भारतीय युवा इंग्लैंड की शक्ति से आतंकित और उसके वैभव से अभिभूत थे। ऐसे वातावरण में इंग्लैंड की वास्तविक सीमाओं का बार-बार तथ्याधारित उल्लेख सावरकर की गहरी राजनीतिक समझ, यथार्थपरक दृष्टि और दूरदर्शिता का प्रमाण है।
6. क्रांतिकारियों के बलिदान का सम्मान
मदनलाल धींगरा के बलिदान के पश्चात सावरकर ने उनके विषय में अनेक लेख लिखे। उन्होंने कहीं भी उनके कार्य की निंदा नहीं की, बल्कि उसे राष्ट्रभक्ति, आत्मबलिदान और स्वाधीनता-संघर्ष की प्रेरणादायी घटना के रूप में प्रस्तुत किया।
7. समाचारों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का संचार
सावरकर अपने समाचारों में लंदन की घटनाओं का वर्णन करते हुए भी 1857 के स्वातंत्र्य समर, इंडिया हाउस की गतिविधियों, शिवाजी उत्सव तथा क्रांतिकारी आंदोलन से संबंधित घटनाओं को भारतीय पाठकों तक पहुंचाते थे। इस प्रकार उनकी पत्रकारिता समाचार और राष्ट्रनिर्माण-दोनों का प्रभावी समन्वय प्रस्तुत करती है।
8. अंतरराष्ट्रीय एवं भू-राजनीतिक दूरदृष्टि
लंदन और पेरिस से प्रकाशित तलवार तथा वंदे मातरम् में सावरकर ने यूरोप की राजनीति का सूक्ष्म एवं दूरदर्शी विश्लेषण प्रस्तुत किया। प्रथम विश्वयुद्ध से कई वर्ष पूर्व ही उन्होंने इंग्लैंड-जर्मनी संघर्ष की संभावना व्यक्त कर भारतीयों को उससे उत्पन्न अवसरों के प्रति सचेत किया। उनका मानना था कि साम्राज्यवादी शक्तियों के पारस्परिक संघर्ष का लाभ उठाकर भारत को स्वतंत्रता के लिए संगठित प्रयास करने चाहिए। इस प्रकार उनके लेखन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति को वैश्विक राजनीति से जोड़ा। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी समाचार-पत्रों को दिए गए उनके साक्षात्कार, मदनलाल धींगरा के राष्ट्रकृत्य का समर्थन, उसकी निंदा के लिए आयोजित सभा को विफल करना, मोहनदास गांधी की इंडिया हाउस यात्रा, लंदन में संपन्न शिवाजी उत्सव तथा अन्य समकालीन घटनाओं पर आधारित उनके वार्तापत्र केवल समाचार-वृत्तांत नहीं हैं; वे सावरकर के लंदन-जीवन के सजीव, प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज हैं।
सारांशतः सावरकर की पत्रकारिता ओजस्वी भाषा, प्रखर विश्लेषण, सुस्पष्ट विचार, प्रेरक भावाभिव्यक्ति और राष्ट्रनिष्ठ उद्देश्य का अद्वितीय समन्वय है। उन्होंने इसे केवल समाचार-प्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जागरण, वैचारिक क्रांति, सामाजिक पुनरुत्थान और स्वतंत्रता-संग्राम का प्रभावी अस्त्र बनाया। उनके लेखों में इतिहास की तथ्यपरकता, साहित्य का ओज, राजनीति की दूरदृष्टि और राष्ट्रभक्ति का तेज एक साथ अभिव्यक्त होता है। इसी कारण उनकी पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के वैचारिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण अध्याय है। वे केवल पत्रकार नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म के मिशनधर्मी साधक थे, जिनकी लेखनी आज भी राष्ट्रचेतना को आलोकित करती है।

















