डोनाल्ड ट्रंप अपनी ताकत के दम पर दुनिया के देशों पर कब्जा करने की फिराक में है। उनकी इस महत्वाकांक्षा को इस तरह से समझा जा सकता है कि पहले उन्होंने वेनेजुएला पर कब्जा किया। वो ग्रीनलैंड को हथियाना चाहते हैं। अब क्यूबा पर कब्जा करना चाहते हैं। उन्होंने हाल ही में ओवल ऑफिस में एक कार्यक्रम के दौरान साफ-साफ कहा, “मुझे लगता है कि मुझे क्यूबा लेने का सम्मान मिलेगा। किसी न किसी रूप में क्यूबा लेना। चाहे मैं उसे आजाद करूं, ले लूं, सच बताऊं तो उसके साथ मैं कुछ भी कर सकता हूं। वे अभी बहुत कमजोर देश हैं।”
उन्होंने क्यूबा को “असफल राष्ट्र” करार देते हुए दावा किया कि क्यूबा डील करना चाहता है। जल्द ही डील हो जाएगी या फिर जो करना पड़ेगा कर लेंगे। उन्होंने कहा कि ईरान के बाद अगला नंबर क्यूबा का है। उनकी इस बयानबाजी पर क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कानेल ने टीवी पर कहा कि उनके अधिकारी अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिले हैं। उन्होंने इसे “संवेदनशील” प्रक्रिया बताया और कहा कि दोनों तरफ की समस्याओं को गंभीरता से पहचानकर उनके प्रभाव के हिसाब से हल निकालने की कोशिश की जा रही है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की बातचीत में क्यूबा के राष्ट्रपति डियाज़-कानेल को सत्ता से हटाना एक मुख्य मकसद है। यानी बात सिर्फ कूटनीति की नहीं, रिजीम चेंज की लग रही है।
क्यूबा में बिजली संकट और तेल प्रतिबंध
गौरतलब है कि क्यूबा में प्रतिबंधों के कारण स्थिति और खराब हो रही है। ट्रंप ने वेनेजुएला से आने वाले सभी तेल शिपमेंट रोक दिया है। साथ ही क्यूबा को तेल सप्लाई करने वाले किसी भी देश पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है। पहले क्यूबा को वेनेजुएला से रोजाना करीब 35,000 बैरल तेल मिलता था। जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के पकड़े जाने के बाद ये सप्लाई बंद हो गई। हालात इतने खराब हो गए हैं कि तीन महीने से एक भी तेल शिपमेंट नहीं आया। पूरे देश में ऊर्जा राशनिंग चल रही है और लंबे-लंबे बिजली कटौती हो रहे हैं। सोमवार को तो पूरा बिजली ग्रिड ही धराशायी हो गया, जिससे 1 करोड़ लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।
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अमेरिका-क्यूबा का लंबा इतिहास
अमेरिका और क्यूबा का रिश्ता 60 साल से ज्यादा पुराना तनाव भरा है। 1959 में फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका समर्थित सरकार को उखाड़ फेंका। 1961 में CIA की मदद से बे ऑफ पिग्स पर हमला हुआ, जो बुरी तरह फेल हो गया। 1962 में क्यूबन मिसाइल क्राइसिस ने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया। सोवियत संघ ने क्यूबा में मिसाइलें तैनात की थीं, जो फ्लोरिडा से सिर्फ 90 मील दूर है। आखिर में अमेरिका ने क्यूबा पर हमला न करने का वादा किया, जो आज तक कई राष्ट्रपतियों के समय में कायम है।
1962 से अमेरिका का सख्त व्यापार प्रतिबंध लगा हुआ है। बराक ओबामा के समय संबंध थोड़े नर्म हुए थे और सामान्यीकरण की कोशिश हुई। लेकिन ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में कई फैसले वापस ले लिए। अब दूसरे कार्यकाल में वे इससे भी आगे जा रहे हैं और खुलकर रिजीम चेंज व टेकओवर की बात कर रहे हैं।
अमेरिका में भी ट्रंप का विरोध
अमेरिकी सीनेट के डेमोक्रेट्स ने वॉर पावर्स रेजोल्यूशन पेश किया है ताकि ट्रंप बिना कांग्रेस की मंजूरी के क्यूबा में सैन्य कार्रवाई न कर सकें। यानी खुद अमेरिका के अंदर भी इस रणनीति पर असहमति है।कुल मिलाकर अभी स्थिति काफी नाजुक है। क्यूबा सरकार बातचीत कर रही है, वहां के लोग ईंधन की किल्लत में गुजर-बसर कर रहे हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति खुलकर कह रहे हैं कि वे क्यूबा के साथ जो चाहें कर सकते हैं।

















