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जी 7, पश्चिम एशिया और भारत के सधे कदम

भू-रणनीतिक विशेषज्ञ इयन ब्रेमर का कहना है कि आगामी वर्षों में वैश्विक मंचों पर भारत का महत्व बढ़ेगा। अगले दो वर्ष में सभी को एहसास होगा कि भारत कितना महत्वपूर्ण है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 24, 2026, 08:00 pm IST
in सम्पादकीय
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

विश्व इस समय ऐसी परिस्थिति से निकल रहा है जहां कोई भी संकट अकेला नहीं रह जाता। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो प्रभाव तेल के दाम पर पड़ता है। समुद्री रास्ते असुरक्षित होते हैं तो व्यापार महंगा होता है। किसी बड़े देश की सैन्य भाषा बदलती है तो छोटे और मध्यम देश अपने विकल्पों को फिर से परखने लगते हैं। इसी पृष्ठभूमि में फ्रांस के एवियन में हुआ जी 7 शिखर सम्मेलन केवल एक सामान्य बैठक नहीं था।

गहराई से देखें तो इसमें नैतिकता के साथ-साथ शक्ति, व्यापार, ऊर्जा और रणनीति भी जुड़ी हुई है। यही आज की विश्व राजनीति की सचाई है। कोई भी बड़ा देश केवल नैतिक कारणों से नहीं चलता। वह अपने हित, अपने मित्र, अपनी मजबूरियां और अपनी सुरक्षा भी देखता है।

इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अच्छे देश और बुरे देश की सरल भाषा में समझना ठीक नहीं है। कोई देश एक मुद्दे पर बहुत नैतिक दिख सकता है और दूसरे मुद्दे पर चुप रह सकता है। कोई देश जलवायु पर उदार भाषा बोल सकता है, लेकिन शरणार्थियों पर कठोर हो सकता है। कोई देश मानवाधिकार की बात कर सकता है, लेकिन अपने मित्र देशों के मामले में वही कसौटी लागू नहीं करता। यही कारण है कि दुनिया में स्थायी नैतिक खेमे कम बनते हैं और मुद्दा आधारित गठबंधन अधिक बनते हैं। किसी एक सवाल पर कुछ देश साथ आते हैं, दूसरे सवाल पर वही अलग-अलग खेमों में चले जाते हैं।

जी 7 का पश्चिम एशिया पर रुख इसी जटिलता को दिखाता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा एक मानवीय प्रश्न भी है, क्योंकि वहां से गुजरने वाले जहाजों में नाविक होते हैं, नागरिक आपूर्ति होती है और कई देशों की रोजमर्रा की जरूरतें जुड़ी होती हैं। लेकिन यह उतना ही रणनीतिक प्रश्न भी है, क्योंकि इसी रास्ते से ऊर्जा बाजार, जहाजरानी, बीमा दरें और एशिया की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं।

भारत की संतुलित कूटनीति

खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। भारत की ऊर्जा जरूरतें इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। भारतीय नाविक समुद्री व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के संबंध अमेरिका से भी हैं, ईरान से भी हैं, अरब देशों से भी हैं और इस्राएल से भी हैं। इसलिए भारत किसी एक पक्ष की तीखी भाषा दोहराकर अपने हितों को संकट में नहीं डाल सकता।यही भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा है। भारत युद्ध का विस्तार नहीं चाहता, लेकिन समुद्री मार्गों की असुरक्षा भी स्वीकार नहीं कर सकता। भारत अमेरिका से सहयोग बढ़ाता है, लेकिन अपनी विदेश नीति को अमेरिका की नीति का हिस्सा नहीं बनाता। भारत अरब देशों से ऊर्जा और निवेश संबंध मजबूत करता है, लेकिन इस्राएल से तकनीक और रक्षा सहयोग भी रखता है। यही संतुलन भारत को आज की दुनिया में गंभीर और भरोसेमंद शक्ति बनाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी 7 के संपर्क सत्र में इसी भारतीय दृष्टि को आगे रखा। भारत ने यह बात स्पष्ट की कि आज ऊर्जा, भोजन, स्वास्थ्य, साइबर सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा अलग-अलग विषय नहीं रहे। ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

भारत बार-बार कहता है कि दुनिया में संसाधनों की कमी से अधिक भरोसे की कमी है। बड़े देश नियमों की बात करते हैं, लेकिन कई बार नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार लागू करते हैं। भारत केवल यह नहीं कहता कि दुनिया को न्यायपूर्ण होना चाहिए। वह ऐसे काम भी करता है जिनसे सामान्य देशों को लाभ हो सके। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा रोधी ढांचा गठबंधन, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन, जीवन शैली आधारित पर्यावरण अभियान, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और आपदा राहत में भारत की सक्रियता इसी सोच को दिखाती है। भारत की नैतिकता का आधार भाषण नहीं, उपयोगिता है। भारत वैश्विक दक्षिण से कहता है कि विकास बाहर से थोपा हुआ ढांचा नहीं होना चाहिए। विकास ऐसा होना चाहिए जो स्थानीय समाज की क्षमता बढ़ाए।

नैतिकता की कसाैटी

यहीं भारत की आवाज कई पश्चिमी देशों से अलग दिखाई देती है। पश्चिम कई बार मानवाधिकार, लोकतंत्र और नियम आधारित व्यवस्था की भाषा बोलता है, लेकिन उसके व्यवहार में चयनात्मकता दिखती है। रूस पर कठोर रुख और मित्र देशों पर नरमी, जलवायु पर बड़े वादे और वित्त पर संकोच, मानवाधिकार पर भाषण और शरणार्थियों पर दीवारें, ये विरोधाभास दुनिया ने बार-बार देखे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पश्चिम की हर बात गलत है। अर्थ केवल इतना है कि नैतिकता और शक्ति को अलग करके नहीं समझा जा सकता।

इसी संदर्भ में अमेरिका द्वारा हिंद प्रशांत कमान से हिंद शब्द हटाकर फिर प्रशांत कमान नाम अपनाना ध्यान देने योग्य घटना है। आधिकारिक रूप से कहा गया है कि कमान का क्षेत्र और काम नहीं बदला है। यह भी कहा गया है कि यह पुराने नाम की बहाली है। फिर भी कूटनीति में शब्दों का महत्व होता है। जब 2018 में हिंद प्रशांत नाम अपनाया गया था, तब इसे भारत और हिंद महासागर की बढ़ती भूमिका की स्वीकृति माना गया था। अब हिंद शब्द हटना यह संकेत दे सकता है कि अमेरिका अपनी सैन्य सोच में फिर प्रशांत केंद्रित ढांचे को अधिक महत्व देना चाहता है।

भारत को इस संकेत से चिंतित नहीं होना चाहिए, किन्तु इसे अनदेखा भी नहीं करना चाहिए। यह भारत विरोधी निर्णायक कदम नहीं है। फिर भी यह याद दिलाता है कि किसी बड़ी शक्ति की भाषा स्थायी गारंटी नहीं होती। आज कोई देश भारत को अपनी रणनीति की भाषा में केंद्र में रख सकता है, कल वह अपने हिसाब से शब्द बदल सकता है। भारत की वास्तविक शक्ति इस बात पर निर्भर नहीं हो सकती कि कोई विदेशी कमान अपने नाम में हिंद शब्द रखती है या नहीं। भारत की शक्ति उसके भूगोल, बाजार, नौसेना, तकनीक, प्रवासी समाज, ऊर्जा मांग, लोकतांत्रिक आधार और वैश्विक दक्षिण में विश्वास से निकलेगी।

संकेतों की रणनीति

रोचक बात यह है कि व्यापक राजनयिक भाषा में मुक्त और खुले हिंद प्रशांत की बात अभी भी बनी हुई है। इसका अर्थ है कि सैन्य नामकरण और कूटनीतिक भाषा हमेशा एक जैसी नहीं होती। एक ओर अमेरिका अपनी कमान के नाम से हिंद शब्द हटाता है, दूसरी ओर जी 7 चीन, ताइवान जलडमरूमध्य, पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर तथा नियम आधारित व्यवस्था के संदर्भ में हिंद प्रशांत की भाषा बनाए रखता है। यह विरोधाभास बताता है कि विश्व राजनीति एक सीधी रेखा में नहीं चलती। अलग मंचों पर अलग संकेत, अलग हित और अलग भाषा काम करती है। भारत को इन्हीं संकेतों को समझते हुए अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखनी होगी।

आज वैश्विक मंचों की शक्ति भी बदल रही है। जी 7 के पास पूंजी,
तकनीक और वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव है। जी 20 अधिक व्यापक आर्थिक मंच है। ब्रिक्स विकसित होते देशों की बेचैनी और वैकल्पिक विकास दृष्टि को व्यक्त करता है।

भारत की विदेश नीति का केंद्रीय सूत्र रणनीतिक स्वायत्तता है। इसका अर्थ तटस्थता नहीं है। इसका अर्थ है कि भारत अपने निर्णय किसी दूसरे देश की सुविधा से नहीं, अपने राष्ट्रीय हित और व्यापक वैश्विक हित के संतुलन से लेगा। भारत अमेरिका से निकटता बढ़ा सकता है, लेकिन अमेरिकी नीति का परिशिष्ट नहीं बनेगा। भारत रूस से संबंध रख सकता है, लेकिन किसी आक्रमण को नैतिक आदर्श नहीं मानेगा। भारत ईरान से संवाद रख सकता है, लेकिन परमाणु प्रसार की अनदेखी नहीं करेगा। भारत इस्राएल से रक्षा और तकनीक सहयोग कर सकता है, लेकिन फिलिस्तीन की मानवीय पीड़ा को भी महत्व देगा। यही संतुलन भारत को गंभीर शक्ति बनाता है।

भारत की वैश्विक नैतिकता का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह केवल विरोध की राजनीति नहीं करता। भारत ऐसे मुद्दे उठाता है जिनसे सबको लाभ हो सकता है। भारत समझता है कि आज की दुनिया में नैतिकता तभी टिकेगी जब वह लोगों के जीवन की ठोस समस्याओं को हल करेगी
।
वर्तमान वैश्विक उथल पुथल भारत के लिए संकट भी है और अवसर भी। पश्चिम एशिया की अस्थिरता, जी 7 की चयनात्मक नैतिकता, अमेरिका की प्रशांत केंद्रित भाषा, चीन का दबाव और वैश्विक दक्षिण की अपेक्षाएं, ये सब भारत को अधिक परिपक्व भूमिका की ओर ले जा रहे हैं। भारत अब केवल संतुलन साधने वाला देश नहीं रह सकता। उसे संतुलन गढ़ने वाली शक्ति बनना होगा। भारत की दिशा यही है कि नैतिकता को शक्ति से अलग न रखा जाए, बल्कि शक्ति को मानव हित से जोड़ा जाए।

भारत कहता है कि समुद्र सबके लिए खुले रहें, ऊर्जा सबके लिए सुरक्षित रहे, तकनीक सबके लिए उपयोगी हो, विकास सम्मानजनक साझेदारी पर आधारित हो और वैश्विक दक्षिण निर्णय की मेज पर सम्मान के साथ बैठे।

यही भारत का हित है। यही भारत की नैतिक स्थिति है। और यही भारत को भविष्य की महत्वपूर्ण, विश्वसनीय और निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

X@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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