बांग्लादेश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की चपेट में है। शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद राजधानी ढाका और कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन भड़क उठे। कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों ने गुस्से में देश के दो सबसे बड़े अखबार प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया। जिसके बाद प्रेस की स्वतंत्रता और मानवाधिकार की गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
हादी की हत्या और उसकी पृष्ठभूमि
32 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी बांग्लादेश के जुलाई आंदोलन से उभरकर सामने आया एक था। वो इंकलाब मंच के संयोजक और प्रवक्ता था, जो पारंपरिक राजनीतिक वर्चस्व और सत्ता के खिलाफ मुखर था। ढाका विश्वविद्यालय से शिक्षित हादी ने न केवल सत्तारूढ़ अवामी लीग बल्कि सभी राजनीतिक दलों की आलोचना की। उसका मकसद देश में कट्टरपंथी शक्ति को आगे बढ़ाना था। साथ ही उसका प्लान भारत के नार्थ ईस्ट के सातों राज्यों को भारत से अलग करने का था।
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बता दें 12 दिसंबर 2025 को हादी ढाका के मोटिजील इलाके में नकाबपोश हमलावरों के निशाने पर आया। रिक्शा में जा रहे हादी को सिर में गोली लगी, और गंभीर रूप से घायल उसे सिंगापुर ले जाया गया, जहां छह दिन बाद उसकी मृत्यु हुई। हादी की हत्या ने पूरे देश में मजहबी विरोध-प्रदर्शन और खूनी हिंसा को जन्म दिया।
अखबारों पर हमला और पत्रकारों की सुरक्षा
वहीं हादी की मौत के बाद ढाका में मजहबी कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों ने सरकारी और निजी इमारतों को निशाना बनाया। सड़कों पर मजहबी उन्मादी लड़कों की भीड़ हाथों में लाठी डंडे लेकर इस्लामिक नारे लगते नजर आए। प्रोथोम आलो के कार्यकारी संपादक सज्जाद शरीफ ने इसे बांग्लादेशी मीडिया के इतिहास की सबसे काली रात बताया।
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उन्होंने कहा कि पत्रकारों को इमारत छोड़कर जान बचानी पड़ी और अगले दिन का अखबार प्रकाशित नहीं हो सका।
अल्पसंख्यक समुदाय पर असर
बता दें कि मजहबी भीड़ ने ढाका से चटगांव तक कई जगह आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा फैलाई। इस दौरान अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर भी हमला हुआ। भालुका में 30 वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को भीड़ ने पकड़कर पीटा और सरेआम पेड़ पर लटका कर आग लगा दी। इस घटना के बाद से ही बांग्लादेश में मानवाधिकारों के हनन और अल्पसंख्यक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े होते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक अस्थिरता और चुनावों पर प्रभाव
बता दें कि देश 12 फरवरी 2026 के राष्ट्रीय चुनाव की तैयारी में था, लेकिन हादी की हत्या ने बांग्लादेश की पहले से नाजुक राजनीतिक स्थिति को और अस्थिर कर दिया। जिसके बाद उपजी हिंसा ने चुनाव की प्रक्रिया पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल दिया। साथ ही शेख हसीना सरकार के पतन के बाद ढाका में बढ़ते पाकिस्तानी प्रभाव और ISI की गतिविधियों को भी उजागर किया।
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बांग्लादेश में लहराए जा रहे हैं ISIS के झंडे
वहीं इस मजहबी हिंसा के बीच एक बार फिर धनमंडी 32 आवास के बचे हुए हिस्से को गिराने की कोशिश की, और खुलेआम ISIS के झंडे लहराए। जिसका वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफोर्म एक्स पर जमकर वायरल हो रहा है। जिसके बाद बंगलदेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनुस की मंशा पर भी सवाल उठने लगे है।
क्योंकि जब इन चरमपंथियों ने पहली बार घर पर हमला किया था, तो यूनुस ने न तो इसे बचाने के लिए कदम उठाए और न ही यह सुनिश्चित किया कि दोषियों को सज़ा मिले। इसके बजाय, मोहम्मद यूनुस ने भीड़ की हिंसा को कम करके आंका और शेख हसीना पर भी आरोप लगाया, और दावा किया कि उनके भाषणों ने भीड़ को उकसाया था।
बांग्लादेश में लहराए जा रहे हैं ISIS के झंडे
कथित शांतिदूत मोहम्मद यूनुस अपने घर पर पैर-पसार कर सो रहे हैं, और इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों को देश नियंत्रण करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने एक बार फिर धनमंडी 32 आवास के बचे हुए हिस्से को… pic.twitter.com/pfQhPI6RIH
— Shivam Dixit (@ShivamdixitInd) December 20, 2025
अब सवाल यह है..? उन्हें वापस आकर बची हुई इमारत को नष्ट करने की कोशिश करने के लिए किसने उकसाया..? उसी समूह ने द डेली स्टार और प्रोथोम आलो के दफ्तरों पर हमला क्यों किया..? इस बार इन हमलों के पीछे कौन था?
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इन उठते सवालों से स्पष्ट है कि दुनिया को अभी यह समझना बाकी है कि यह मोहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार की असमर्थता या विफलता नहीं है, बल्कि मोहम्मद यूनुस की इन हमलों में सीधी मिलीभगत है।
ISI का प्रभाव और क्षेत्रीय खतरा
खुफिया रिपोर्टों की माने तो, पाकिस्तान की ISI एजेंसी ने ढाका में एक स्पेशल सेल स्थापित किया है। अक्टूबर 2025 में चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की यात्रा के बाद यह यूनिट सक्रिय हुई। सूत्रों के मुताबिक, इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेशी युवाओं का कट्टरपंथीकरण और मजहबी उग्रवाद को बढ़ावा देना है। साथ ही यह क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की पूर्वी सीमाओं के लिए सीधे खतरे की चेतावनी था।
नागरिकों में असुरक्षा, हवा-हवाई अंतरिम सरकार की बातें
वहीं अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने हादी की हत्या पर भाषणबाजी की और हिंसा के बाद कार्रवाई का वादा तो किया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम ना उठाकर केवल खानापूर्ति की । जिससे नागरिकों और पत्रकारों की सुरक्षा का संकट बढ़ गया है। पत्रकारों की हत्या और मीडिया संस्थानों पर हुए हमले ने बांग्लादेश में अधिकारों का हनन और असुरक्षित पत्रकारिता की गंभीर तस्वीर पेश की है।
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वहीं कार्रवाई की बातें केवल भाषणों में देखी जा रहीं है, जमीनी स्तर पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। मजहबी कट्टरपंथियों की भीड़ सड़कों पर उत्पात मचाते हुए साफ नजर आ रही है। साथ ही चुन-चुनकर अल्पसंख्यकों और उनके प्रतिष्ठानों पर हमला कर उन्हें लुटती दिख रही है।
भारत विरोधी प्रदर्शन कर रहे मजहबी
वहीं हादी की मौत के बाद ढाका विश्वविद्यालय और शाहबाग में मजहबी प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। नारेबाजी, विरोध मार्च और भारत विरोधी प्रदर्शनों ने पूरे शहर को अशांति और भय का माहौल प्रदान किया। कट्टरपंथी समूहों और एनसीपी ने हादी के हत्यारों की वापसी तक भारत स्थित भारतीय उच्चायोग को भी बंद रखने की मांग की। और भारतीय उच्चायोग पर हमले की कोशिश भी की।
मानवाधिकार और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा
बता दें कि इस हिंसा में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया। दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या और आग में झोंकने की घटना ने देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की गंभीर उल्लंघन की चेतावनी दी है। विशेषज्ञ इसे मजहबी कट्टरता और सामाजिक असहिष्णुता का नतीजा मान रहे हैं।
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बांग्लादेश में मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी
अखबारों पर हमले और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि बांग्लादेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। मीडिया संस्थानों पर हुए हमले न केवल पत्रकार सुरक्षा को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में भय और सेंसरशिप का माहौल भी पैदा करता है।
भारत के लिए रणनीतिक खतरे
बता दें कि बंगलदेश में ISI की सक्रियता और पाकिस्तान का बांग्लादेशी युवाओं का कट्टरपंथीकरण भारत के क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक हित के लिए चुनौती पेश करता है। हालंकि NSA अजित डोभाल ने इसे बांग्लादेशी अधिकारियों के सामने उठाया। लेकिन अब भारत की पड़ोसी फर्स्ट नीति और क्षेत्रीय स्थिरता अब इस हिंसा और ISI की गतिविधियों से सीधे प्रभावित हो रही है।
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बांग्लादेश में हादी की हत्या और उसके बाद फैली सुनियोजित मजहबी हिंसा ने दिखाया कि देश में कट्टरपंथ, असुरक्षित पत्रकारिता, राजनेता की सुरक्षा और अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के अधिकारों पर गंभीर खतरा है। यह मानवाधिकार उल्लंघन और मजहबी उग्रवाद की चेतावनी देता है, जिसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी, त्वरित कार्रवाई बेहद आवश्यक है।

















