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4 महीने पानी में डूबा रहता है ‘जलकेश्वर नाथ मंदिर’, रहस्यमय शिवालय है यहां

यह शिवालय रामानुजगंज से करीब दो किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत लुर्गी में कन्हर नदी के तट पर स्थित है। इसे जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Lalit Fulara
Aug 12, 2026, 12:05 pm IST
inधर्म-संस्कृति

बलरामपुर। भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि सावन शुरू होते ही जिले के छोटे-बड़े सभी शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सुबह से ही कतार में लगकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इसी आस्था और परंपरा के बीच बलरामपुर जिले में एक ऐसा शिवालय भी है, जो अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और धार्मिक मान्यताओं के कारण लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

पानी में डूब जाता है शिवलिंग…
यह शिवालय रामानुजगंज से करीब दो किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत लुर्गी में कन्हर नदी के तट पर स्थित है। इसे जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की खासियत यह है कि यहां दो स्थानों पर शिवलिंग स्थापित हैं। नदी के बिल्कुल करीब नीचे की ओर स्थित शिवालय बरसात के मौसम में कन्हर नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ पानी में डूब जाता है। वहीं, इसके ऊपर स्थित दूसरे शिवालय में श्रद्धालु इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं।

कन्हर नदी का जलस्तर बारिश के दिनों में बढ़ जाता है। ऐसे में नदी के किनारे सबसे नीचे स्थित जलकेश्वर नाथ मंदिर और वहां स्थापित शिवलिंग पानी में डूब जाता है। नदी का पानी कम होने के बाद शिवलिंग दोबारा श्रद्धालुओं के दर्शन और पूजा के लिए दिखाई देने लगता है।कन्हर नदी, दो शिवालय और चार महीने तक पानी में डूबा रहने वाला शिवलिंग इस स्थान को आस्था, प्रकृति और रहस्य का अनोखा संगम बनाते हैं।

चार महीनों में मां गंगा स्वयं जलकेश्वर नाथ का जलाभिषेक करती हैं
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि कन्हर नदी गंगा के समान पवित्र है और बरसात के चार महीनों में मां गंगा स्वयं जलकेश्वर नाथ का जलाभिषेक करती हैं। यही धार्मिक मान्यता इस स्थान को क्षेत्र के दूसरे शिवालयों से अलग पहचान देती है। जलकेश्वर नाथ मंदिर की एक और खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। कन्हर नदी के एक किनारे छत्तीसगढ़ का रामानुजगंज क्षेत्र है, जबकि नदी के उस पार झारखंड की सीमा शुरू होती है। यही वजह है कि इस शिवालय में केवल स्थानीय श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

महाशिवरात्रि के दौरान जब नदी का जलस्तर जब कम होता है और नीचे स्थित शिवालय तक पहुंच संभव होती है, तब यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। लोग भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कन्हर नदी को उत्तरवाहिनी और गंगा के समान पवित्र माना जाता है। कन्हर नदी का उद्गम जशपुर जिले के क्षेत्र से माना जाता है और आगे चलकर यह सोन नदी में मिलती है।

देश के कोने-कोने से आते हैं श्रद्धालु
सोन नदी का आगे गंगा नदी से संगम होता है। इसी धार्मिक और भौगोलिक संबंध के कारण स्थानीय लोगों में कन्हर नदी के प्रति गहरी आस्था है। स्थानीय निवासी और शिवभक्त रमेश कुमार बताते हैं कि लुर्गी गांव में कन्हर नदी के किनारे भगवान शिव का घाट और मंदिर स्थित है। सावन और शिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग यहां पूजा करने पहुंचते हैं। उनके अनुसार कन्हर नदी के किनारे स्थित इस शिवालय की आसपास के गांवों में काफी मान्यता है। श्रद्धालु मीणा कुमारी भी जलकेश्वर नाथ मंदिर को आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र मानती हैं। उनका कहना है कि गांव और आसपास के क्षेत्र के लोगों की भगवान शिव में गहरी आस्था है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

Topics: जलकेश्वर नाथ मंदिरछत्तीसगढ़ का जलकेश्वर नाथ मंदिरजलकेश्वर नाथ मंदिर की कहानीJalkeshwar Nath TempleLord Shiva TempleJalkeshwar Nath Temple of ChhattisgarhStory of Jalkeshwar Nath Templeभगवान शिव का मंदिरसावनSawan
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