बांग्लादेश फिर जल रहा है। दरअसल वहां कट्टरता की आग बुझी ही नहीं थी, सुलग रही थी। वह धीरे-धीरे अपने भीतर जैसे बारूद को इकट्ठा कर रही थी। बांग्लादेश कट्टरता के ऐसे दुष्चक्र में फंसा हुआ है, जिसमें केवल आग ही लगनी है और शेष कुछ भी संभव नहीं है।
फिलहाल वहां भारत विरोधी उस्मान हादी की मौत के बाद आग लगी हुई है, मगर आग तो वह भी थी जो हादी लगाना चाहता था। क्या वह अपने शब्दों से आग नहीं लगा रहा था? क्या वह भारत को जलाना नहीं चाहता था? उसकी मौत के बाद वे मूल्य जल रहे हैं, जो अभी भी बांग्लादेश की बंगाली पहचान को समेटे और सहेजे हुए हैं। वे मूल्य और पहचान जो “अमार सोनार बांग्ला” में रवींन्द्र नाथ टैगोर लिखते हैं।
हादी की मौत के बाद उदिची शिल्पी गोष्ठी को जला दिया गया। राजधानी ढाका की तोपखाना रोड पर स्थित इस संगठन का कार्यालय था। जबकि इसका कुसूर इतना था कि यह आजादी की बात करता है। यह एक प्रमुख प्रगतिशील साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संगठन है। यह लोकतंत्र अर्थात जम्हूरियत की, प्रगतिशीलता की और अभिव्यक्ति की आजादी की बात करता है। शेख हसीना को भगाने वाले लोगों ने इस लोकतान्त्रिक संगठन को भी जला दिया है।
दीपू को मारकर भी शांत नहीं हुए
वास्तविकता यह है कि जो लोग जला रहे हैं, उन्हें जलाना ही है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि लोग इसे समझ नहीं रहे हैं। लोग यह समझ नहीं रहे हैं कि कथित फासीवादी शेख हसीना की सरकार को हटाना इनका लक्ष्य नहीं था। इनका लक्ष्य “अमार सोनार बांग्ला” की मूल भावना को जलाना था।
उन्हें अपनी उस पहचान को जलाना था, जो शेख मुजीबुर्रहमान ने उस मुल्क को दी थी और उन्हें उन बचे-खुचे लोगों को भी जलाना है, जो अमार सोनार बांग्ला की पहचान को अभी तक बनाए रखे हुए हैं। तभी उन्होंने जला डाला दीपू चन्द्रन दास को! दीपू का सरनेम उन्हें अभी तक उसी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ के विषय में बोध देता रहता है, जिसे वे भुलाना चाहते हैं, जिसे वे जलाना चाहते है। दीपू की हत्या के लिए बहाने कुछ भी हो सकते हैं, मगर असली बहाना उन्हें अपनी उस पहचान को ही जलाना है, जो उन्हें यह याद दिलाए कि वे भी कभी दीपू के जैसे रहे होंगे!
वे दीपू को मारकर भी शांत नहीं होते। वे दीपू के घरवालों को उसके अंतिम संस्कार का भी अधिकार नहीं देते हैं, वे डर पैदा करना चाहते हैं, वे बताते हैं कि उनके भीतर अपने इतिहास के अस्तित्व को लेकर किस सीमा तक घृणा है।
भीड़ को कैसे पता किसकी पहचान मिटानी है
कहा जाता है कि भीड़ का कोई मजहब नहीं होता, भीड़ की कोई पहचान नहीं होती है। मगर भीड़ जिसकी कोई पहचान नहीं होती है, उसे यह कैसे पता होता है कि किसकी पहचान पर हमला करना है? किसकी कौन सी पहचान को जलाना है? किसकी पहचान पर शोर मचाना है? उस्मान हादी की पहचान ही यही थी कि वह बांग्लादेश की बांग्ला पहचान और भारत के साथ जुड़ी पहचान को मिटाना चाहता था।
“डेली स्टार” के दफ्तर को जला दिया
भीड़ को यह याद है कि हादी कौन था और हादी क्या कर रहा था और उसकी मौत के बाद अब जैसे वह भीड़ उसके अधूरे सपने को पूरा कर रही है। भीड़ ने “डेली स्टार” के दफ्तर को जला दिया। इससे पहले एक पत्रकार इमदादुल हक मिलन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। ढाका के कारवां बाजार में स्थित प्रोथोम आलो की चार मंजिला इमारत को भी जला दिया गया। वह पूरी तरह से राख हो गई। अब यहां से फिलहाल अखबार नहीं निकल पाएगा। बीबीसी को प्रोथोम आलो के सज्जाद शरीफ ने बताया कि “हमारे दो दफ्तरों में से एक को निशाना बनाया गया। बड़ी संख्या में लोग गेट के सामने आ गए थे, गेट बंद था लेकिन उन्होंने गेट पर हमला किया और तोड़फोड़ की। उस वक्त वहां कई कर्मचारी भी मौजूद थे, किसी तरह उन्हें वहां से सुरक्षित निकाला गया।”
दीपू उतना भाग्यशाली नहीं था
वे सुरक्षित बाहर आ सके, मगर दीपू उतना भाग्यशाली नहीं था और भीड़ का शिकार हो गया। वही भीड़ जिसका कोई नाम या पहचान नहीं होती। डेली स्टार की इमारत भी इतनी भाग्यशाली नहीं रह सकी। डेली स्टार के कार्यालय में आग लगा दी गई। बताया जा रहा है कि हमलावरों ने इमारत की लगभग हर मंज़िल पर हमला किया और तोड़फोड़ के साथ ही कीमती सामान लूट लिया।
बांग्ला पहचान को जला देने की सोच
मगर ये तमाम घटनाएं केवल और केवल उस आग को ही दिखाती हैं, जो बंग भूमि की बांग्ला पहचान को जला देना चाहती है, फिर कारण कुछ भी हो और कारक कुछ भी हो, जल वही रहे हैं, जो इस पहचान को कहीं न कहीं अभी भी जिंदा रखे हुए है।















