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मिशनरी धुरी पर मार्को

अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का असर अक्सर उनके औपचारिक एजेंडे से कहीं आगे तक जाता है, जहां संकेत और संदर्भ ज्यादा गहरी कहानी कहते हैं, अमेरिकी विदेश मंत्री का हालिया दौरा भी कुछ ऐसा ही नजर आता है

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Jun 10, 2026, 06:45 am IST
in विश्व
कोलकाता स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय में मार्को रुबियो और उनकी पत्नी जेनेट डी. रुबियो

कोलकाता स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय में मार्को रुबियो और उनकी पत्नी जेनेट डी. रुबियो

भारत के दौरे पर आए अमेरिका के विदेश मंत्री के लिए पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। भारत के साथ ठंडे होते संबंधों में गर्मी पैदा करना या मिशनरी कार्य। लेकिन मार्को रुबियो ने भारत में आते ही कोलकाता स्थित मदर टेरेसा के मिशनरीज ऑफ चैरिटी से मुलाकात को ज्यादा महत्वपूर्ण समझा। उनका भारत यात्रा में पहला पड़ाव यहीं था। कोई कह सकता है कि रुबियो कैथोलिक हैं, यह उनकी आस्था का मामला है। पर जब आप विदेश मंत्री होते हैं, आपकी हर बात, हर मुलाकात में संकेत और संदेश होते हैं। रुबियो का संदेश था, चर्च पहले।

कोलकाता ही पहले क्यों? वह इसलिए कि कोलकाता, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य चर्च के विस्तार और “आत्माओं की फसल” काटने की धुरी हैं, उसका प्रक्षेपण केंद्र हैं। यह उस धुरी का एक सिरा है, जो बांग्लादेश, म्यांमार होते हुए पूर्वोत्तर भारत तक जाती है। यह भारत के पूर्वोत्तर, बांग्लादेश के चटगांव और म्यांमार के क्षेत्रों को मिलाकर ईस्ट तिमोर की तर्ज पर ईसाई राज्य बनाने की साजिश का वह विवादास्पद आरोप है, जो बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने लगाया था। यहीं से शेख हसीना
चर्च और पश्चिमी एजेंसियों के निशाने पर आ गई थीं।

कसा कानूनी शिकंजा

ये उन संस्थाओं का ब्योरा हैं, जो विदेशी चंदे पर भारत में कन्वर्जन गतिविधियों में शामिल रहीं।
वर्ल्ड विजन इंडियार : 2022 में एफसीआरए लाइसेंस सस्पेंड हुआ। 2024 में एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हुआ। यह उत्तरपूर्व में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य की आड़ में कन्वर्जन कराने के आरोपों से घिरी रही। सालाना करोड़ों डॉलर की विदेशी फंडिंग मिलती थी।

इवेंजेलिकल फैलोशिप ऑफ इंडिया : 2023-24 में एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुआ। यह ईसाई संस्थाओं की अंब्रेला बॉडी है। इस पर सांप्रदायिक सहिष्णुता को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया और चर्च ऑक्सिलियरी फॉर सोशल एक्शन का एफसीआरए 2024 में रद्द हो गया। चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया विदेशी चंदे से क्या कर रहा था, समझा जा सकता है। सीएएसए भी सामाजिक सेवा की आड़ में कन्वर्जन में लिप्त थी।

कंपैशन इंटरनेशनल : 2017 में एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुआ। विदेशी फंडिंग बंद हुई, तो यह संस्था भारत ही छोड़कर चली गई।

2020 में वनवासी इलाकों में जबरन कन्वर्जन जैसे आरोपों में घिरी चार संस्थाओं का एफसीआरए लाइसेंस सस्पेंड हुआ। न्यू लाइफ फैलोशिप एसोसिएशन, इवेंजेलिकल चर्चेज एसोसिएशन ऑफ मणिपुर, नॉर्दर्न इवेंजेलिकल लुथेरन चर्च।

सहमी हुई है मिशनरी

यह कोई कॉन्सपिरेसी थ्योरी नहीं है। इतिहास गवाह है, चर्च और मिशनरी संस्थाओं के प्रयास साक्षी हैं और साथ ही इस सबको आगे बढ़ाती डीप स्टेट व अमेरिकी खुफिया एजेंसी की करतूतें भी हैं। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद मिशनरी संस्थाएं सहमी हुई हैं। उन्हें पूर्वोत्तर की मिशनरी गतिविधियों पर रोक लगने की आशंका है।

अपनी भारत यात्रा में रुबियो सबसे पहले मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय मदर हाउस और अनाथालय निर्मला शिशु भवन पहुंचे। ध्यान दीजिए, मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर बच्चों को बेचने जैसे संगीन आरोप हैं। 2018 में रांची स्थित निर्मल हृदय शेल्टर की अनिमा इंदीवर और नन सिस्टर कांसिलिया पर सवा लाख रुपये की कीमत में बच्चे को बेचने का आरोप लगा। चार बच्चों को बेचने की पुष्टि हुई। यहां 280 बच्चों के जन्म का रिकॉर्ड गायब पाया गया। यानी इन बच्चों को भी बेचे जाने का संदेह है। बात सिर्फ बच्चों को बेचने भर की नहीं है। मरते लोगों का अंतिम सांस लेने से पहले बपतिस्मा करने जैसे गंभीर आरोप संस्था और मदर टेरेसा पर रहे।

इस पूरे मसले के दो प्रत्यक्ष महत्वपूर्ण पहलू हैं। मिशनरीज ऑफ चैरिटी मदर टेरेसा वाली पहचान के चलते भारत स्थित ऐसी मिशनरी संस्था है, जिसे दुनिया के हर कोने में पहचाना जाता है। पहला पहलू तो यही है कि ईसाई और खासतौर पर मिशनरी मान्यता। एक अन्य पहलू फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) है। विदेश फंडिंग और खासतौर पर संदिग्ध विदेशी फंडिंग को रोकने के लिए बनाया गया यह कानून अब केंद्र सरकार सख्ती से लागू कर रही है। इससे ईसाई मिशनरी संस्थाएं और देश में कट्टर इस्लामिक संस्थाएं व मदरसे चलाने वाले संगठन बहुत ज्यादा बौखलाए हुए हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर होने वाली इस फंडिंग का इस्तेमाल ईसाई मिशनरी संस्थाएं कन्वर्जन की गतिविधियों में कर रही थीं। 2014 के बाद से अब तक बीस हजार से ज्यादा संस्थाओं का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया गया। इनमें 70 प्रतिशत ईसाई संस्थाएं हैं। मिशनरीज ऑफ चैरिटी का एफसीआरए रिन्यूअल 2021 में रद्द कर दिया गया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्च के सौजन्य से बहुत ज्यादा हाय-तौबा हुई। 2022 में इसे बहाल कर दिया गया। लेकिन 2026 में एफसीआरए अमेंडमेंट बिल को लेकर मिशनरी संस्थाएं बहुत डरी हुई हैं। इसमें अनियमितता पर संपत्ति जब्त जैसे प्रावधानों को लाया गया है, जिससे मिशनरी और चर्च संस्थाओं को लगता है कि उनके कन्वर्जन रैकेट पर प्रभाव पड़ेगा।

चर्च की चपेट में पूर्वोत्तर

  •  नागालैंड: 87-88% ईसाई।
  • मिजोरम: 87% ईसाई।
  •  मेघालय: 74-75% ईसाई।
  • मणिपुर: 41% ईसाई (खासकर पहाड़ी इलाकों में कुकी-नागा ट्राइब्स)।
  • अरुणाचल प्रदेश: 30% ईसाई (चर्च बहुत तेजी से काम कर रहा है)।
  •  असम, त्रिपुरा और सिक्किम में 3 से 5 प्रतिशत ईसाई हैं, लेकिन चर्च पूरी ताकत के साथ यहां सक्रिय है।

पूर्वोत्तर में खासी पैठ

मिशनरीज ऑफ चैरिटी समेत इन तमाम संस्थाओं की भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में खासी पैठ है। मिशनरीज ऑफ चैरिटी के दुनिया भर में 750 से ज्यादा केंद्र हैं। अकेले कोलकाता में इसके 19 होम्स हैं। उत्तरपूर्व में इस संस्था के 20 से 25 केंद्र हैं। असम में गुवाहाटी में दो, सिलचर, तेजपुर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, नागांव, जोरहाट, बोंगाईगांव, गोलपाड़ा, तामुलपुर, सोजोंग आदि में दस से ज्यादा सेंटर चल रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश में नाहरलागुन, पालिन, बोरदुरई और खोंसा में मिशनरीज ऑफ चैरिटी के सेंटर हैं। हिंसाग्रस्त मणिपुर के इम्फाल और मोरेह में यह संस्था अपने केंद्र बनाकर सक्रिय है। नगालैंड के दीमापुर, मिजोरम के कोलासिब, त्रिपुरा के अगरतला और कुमारघाट जैसे सुदूर आदिवासी इलाकों में यह मिशनरी संस्था सक्रिय है। हाल के पश्चिम बंगाल चुनाव पर भी दुनिया के तमाम देशों की नजर थी। पश्चिम बंगाल उत्तरपूर्वी भारत में मिशनरी कार्यों के लिए लॉन्चपैड का काम करता है।

यहां स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए संकरा गलियारा निकलता है, जो भारत के इस हिस्से से इकलौता जमीनी लिंक है। इस लिंक पर कब्जा असल में पूर्वोत्तर में निर्बाध गतिविधियों का रास्ता खोलता है। हाल ही में यहां तृणमूल कांग्रेस की हार और भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत से दुनिया के तमाम देशों में जहां हलचल हुई, वहीं ईसाई मिशनरी संस्थाएं सहम गई हैं। एफसीआरए के बाद यह मिशनरियों पर दूसरी सबसे बड़ी चोट है। अब इस धुरी के एक सिरे पर पूर्वोत्तर में सुरक्षा बल और एफसीआरए का जाल है और दूसरे सिरे पर पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी सरकार।

कोलकाता ईसाई मिशनरी गतिविधियों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है। यहां से फंडिंग ही नहीं, मिशनरी प्रशिक्षण भी होता है। नन तैयार की जाती हैं। राहत सामग्री के नाम पर कुख्यात चावल की बोरियां यहीं से पूर्वोत्तर के राज्यों को जाती हैं। 18वीं और 19वीं शताब्दी में यह ईसाई मिशनरियों के लिए बेस कैंप रहा। सेरामपुर मिशनरी बेस था। कई मिशनरी कोलकाता से ही गुवाहाटी या जोरहाट पहुंचते थे। अमेरिकन बैपटिस्ट मिशन के मिशनरी यहीं से नगालैंड पहुंचे और वहां की डेमोग्राफी बदल डाली। पूर्वोत्तर के ईसाईकरण का मुख्य कमांड सेंटर कोलकाता ही रहा है।

इसकी की अगली कड़ी बांग्लादेश का चटगांव पहाड़ी क्षेत्र है। बंदरबन और रंगामाटी इलाकों में ऐतिहासिक रूप से चिन-कुकी-जो समुदाय रहते हैं। ये मिजोरम और मणिपुर के कुकी-जो समुदाय से अपने नस्लीय और ईसाई कनेक्शन के कारण गहरे जुड़े हैं। यहां बैपटिस्ट चर्च के साथ अमेरिका से जुड़े एनजीओ सक्रिय हैं। 2024 में तत्कालीन बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से इस इलाके को ईसाई राज्य बनाने की साजिश का आरोप लगाया था।

शेख हसीना ने कहा था कि चर्च और पश्चिमी ताकतें मिलकर बांग्लादेश के चटगांव, म्यांमार और भारत के नॉर्थ ईस्ट को मिलाकर ईस्ट तिमोर जैसा मॉडल बनाने की कोशिश कर रही हैं। कहा जाता है कि यहीं से शेख हसीना की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। पश्चिम बंगाल में बिना बाड़बंदी की भारत-बांग्लादेश सीमा मिशनरी और पश्चिमी ताकतों को इस धुरी पर सीधी पहुंच देती रही। अब बाड़बंदी का काम तेज हो जाने से सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों में ही नहीं, चर्च में भी भारी बेचैनी है। आने वाले समय में इस बाड़बंदी को लेकर इस्लामिक और ईसाई ताकतें मिलकर बड़ा बवाल खड़ा कर सकती हैं।
आगे यह धुरी म्यांमार के चिन स्टेट से मिलती है।

यह ईसाई बहुल इलाका भी कुकी-चिन-जो समुदाय का केंद्र है। यहां की ईसाई आबादी को चर्च के साथ तमाम पश्चिमी ताकतों, खासतौर पर अमेरिका, का प्रश्रय है। यहां के कुकी-चिन-जो समुदाय ने पश्चिम से मिले आर्थिक व सैन्य समर्थन के भरोसे चिन नेशनल आर्मी बना ली है। यह ईसाई अलगाववादी संगठन म्यांमार की सैन्य सरकार से लड़ रहा है। यहां भी चर्च और पश्चिमी ताकतें अपने तयशुदा पैटर्न पर काम कर रही हैं। एक तरफ हथियार उपलब्ध कराकर आंतरिक युद्ध करा रही हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया भर में ईसाइयों के दमन का वितंडा खड़ा करके समर्थन जुटाया जा रहा है। चर्च और जिहादी ताकतों का यह तयशुदा पैटर्न है।

यह धुरी आगे सीमा पार करके मिजोरम और मणिपुर तक सीधे जाती है। इस धुरी का अंतिम सिरा पूर्वोत्तर है। मिजोरम मुख्य ट्रांजिट रूट है। संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद टूरिस्ट वीजा पर विदेशी यहां घुसपैठ करते रहे हैं। आगे यह धुरी मणिपुर के कुकी-जो इलाकों तक जाती है। 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरोन वेनडक को गिरफ्तार किया। इसके साथ छह यूक्रेनी भाड़े के लड़ाके पकड़े गए। कथित रूप से अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से जुड़ा मैथ्यू संस ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल नामक संस्था का संस्थापक है। वह लीबिया और सीरिया में भी मिशनरी और सैन्य भूमिकाएं निभा चुका है। इससे पहले नेपाल में एक अन्य अमेरिकी नागरिक डेनियल स्टीफन कॉर्नी गिरफ्तार हुआ था। यह कुकी कैंपों में हथियार और ड्रोन बांटते हुए कई वीडियो में नजर आया। पूरे कुकी इलाके में हिंसा भड़काने और ईसाइयों को भड़काने वाले भाषणों के वीडियो सामने आए।

दरअसल यह सिर्फ मिशनरी या ईसाइयत को फैलाने का मसला नहीं है। डिजाइन पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाके, म्यांमार के क्षेत्र और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़कर एक ईसाई देश के निर्माण का है। इसके लिए मिशनरी और पश्चिमी ताकतें हाथ में हाथ डालकर साथ चल रही हैं। रुबियो का कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय जाना, मीटिंग करना नाहक नहीं है।

 

 

Topics: बांग्लादेशआंतरिक युद्धशेख हसीनाविदेशी फंडिंगपाञ्चजन्य विशेषमार्को रुबियोअमेरिकी विदेश मंत्रीअमेरिकी खुफिया एजेंसीअंतरराष्ट्रीय दौराकंपैशन इंटरनेशनलचिन नेशनल आर्मीम्यांमारघुसपैठ। अलगाववादी संगठन
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