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ज्ञान परंपरा : वैदिक परंपरा के ‘वेदमूर्ति’

मात्र 19 वर्ष की आयु में देवव्रत महेश रेखे ने 50 दिन में शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा का दंडक्रम पारायण किया। ऐसी उपलब्धि बहुत ही दुर्लभ ही मानी जाती है। उनकी यह सफलता भारत की सदियों पुरानी मौखिक वेद परंपरा, अनुशासन, परिवार की परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता की शक्ति को प्रमाणित करती है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 17, 2025, 10:21 am IST
inविश्लेषण, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति
‘देवमूर्ति’ देवव्रत महेश रेखे

‘देवमूर्ति’ देवव्रत महेश रेखे

काशी की पवित्र भूमि पर 19 वर्ष के युवा ‘वेदमूर्ति’ देवव्रत रेखे ने अपने एक अद्भुत कार्य से न केवल देश, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। वाराणसी के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में देवव्रत रेखे द्वारा दंडक्रम पारायण न सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि इससे जुड़ी वैदिक परंपरा भी अत्यंत गौरवपूर्ण और दिलचस्प है। इस अनूठी उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देवव्रत की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के वेदब्रह्मश्री महेश चंद्रकांत रेखे के पुत्र देवव्रत ने 30 नवंबर को शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा के लगभग 2,000 मंत्रों का बिना देखे के पाठ पूरा किया। इस पूरी परीक्षा का मूल्यांकन वेदमहर्षि देवेंद्र रामचंद्र गाधिकर ने किया। लगातार 50 दिन तक चलने वाले इस पारायण में केवल तीन बार उच्चारण या पाठ में गलती की अनुमति थी। लेकिन देवव्रत ने एक भी गलती किए बिना यह कठिन परीक्षा पूरी की।

उपलब्धि विशेष क्यों?

दंडक्रम पारायण सबसे कठिन वैदिक साधना है। इसलिए इसे वैदिक पाठ का ‘मुकुट’ माना जाता है। इसमें अनेक वैदिक ऋ चाएं और पवित्र शब्दों का बिना त्रुटि के उच्चारण करना पड़ता है। दंडक्रम में मंत्रों का दो लाख से ज्यादा बार पारायण होता है। इसमें मंत्रों का केवल सामान्य पाठ नहीं होता, बल्कि विशिष्ट शैली में अनुलोम-विलोम रूप में होता है। यानी मंत्रों को उल्टा और सीधा साथ-साथ पढ़ना होता है। दंडक्रम पारायण पूरा करने वाले को ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि दी जाती है। इसमें मानसिक शक्ति और स्मरण क्षमता जरूरी होती है। इसके पाठ से इन दोनों शक्तियों का विस्तार भी होता है। साधक को यह 50 दिन तक लगातार और बिना किसी व्यवधान के पूरा करना पड़ता है। एक ऐसी पीढ़ी, जिसने आद्य शंकराचार्य को देखा नहीं, लेकिन उनकी महान परंपरा से जुड़े एक युवा ‘वेदमूर्ति’ को लगभग 1100 वर्ष बाद देखना वास्तव में एक अलग अनुभूति होती है।

पारायण पूरा करने के बाद देवव्रत के चेहरे का शांत भाव, ओज और उनके गरिमामय व्यक्तित्व को शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। वेदों की पवित्र परंपरा से निकला एक ऐसा कठिन तप गहरी तपस्या और स्मरण शक्ति से ही संभव हो पाता है। देवव्रत महेश रेखे जैसे असाधारण और विलक्षण साधक ने भारत के सनातन इतिहास में 200 साल बाद इसे करके दिखाया है। इससे पूर्व इस कठिन वैदिक पाठ का पारायण नासिक (महाराष्ट्र) में 200 वर्ष पहले ‘वेदमूर्ति’ नारायण शास्त्री ने 100 दिन में किया था।

वेद दुनिया के एकमात्र धार्मिक ग्रंथ हैं, जिनमें उच्चारण (स्वर) की वैज्ञानिक पद्धति है। इसलिए एक भी स्वर में गलती न हो, इसके लिए हमारे ऋ षियों ने आठ तरह के विकृतिपाठ बनाए, जिनमें डंडक्रम सबसे कठिन है। मान लीजिए, किसी मंत्र में पांच शब्द हैं- 1, 2, 3, 4, 5। इसे चार चरणों में पढ़ा जाता है। पहले चरण में 1-2, फिर 1-2। दूसरे चरण में 1-2-3, फिर 3-2, फिर 1-2-3। तीसरे चरण में 1-2-3-4, फिर 4-3-2, फिर 1-2-3-4। चौथे चरण में 1-2-3-4-5, फिर 5-4-3-2, फिर 1-2-3-4-5। इस तरह बिना देखे हर मंत्र को एक खास क्रम में दोहराते हुए देवव्रत ने बिना कोई गलती किए 50 दिन में 2,000 मंत्र पूरे किए।

एक मंत्र के दंडक्रम पाठ में लगभग 20-25 मिनट लगते हैं। यदि एक मंत्र पढ़ने में 20 मिनट लगे और कोई व्यक्ति बिना रुके लगातार 12 घंटे 2,000 मंत्र दंडक्रम रूप में पढ़े, तो इसे पूरा करने में कम से कम 55 दिन लगेंगे। पर देवव्रत ने इसे मात्र 50 दिन में पूरा किया। 200 वर्ष पहले महाराष्ट्र के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने इसे 100 दिन में पूरा किया था।

माध्यन्दिन और काण्व, ये शुक्ल यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएं हैं। माध्यन्दिन शाखा में लगभग 40 अध्याय, 1975 मंत्र और और 303 अनुवाक हैं। ये यज्ञ और अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से प्रयोग किए जाते हैं। माध्यन्दिन शाखा में ऋ ग्वेद के मंत्र पद्य मंत्र हैं। माध्यन्दिन संहिता उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रतिष्ठित हुई। महर्षि वैशम्पायन से यजुर्वेद का अध्ययन महर्षि याज्ञवल्क्य आदि ने किया और महर्षि याज्ञवल्क्य से महर्षि मध्यन्दिन ने इसे प्राप्त किया। इसी कारण यजुर्वेद का उपनाम ‘माध्यन्दिन संहिता’ पड़ा।

इसी तरह, दंडक्रम में दो शब्द हैं-‘दंड’ अर्थात् अनुशासन और ‘क्रम’ यानी कर्म या क्रियाएं। इसका शाब्दिक अर्थ है- वैदिक कर्मों का अनुशासनबद्ध पाठ। कहीं-कहीं इसका नाम दंडक्रम न होकर दंड कर्म भी उल्लेखित है। इसके पारायण की शुरुआत इंद्र, अग्नि, सोम, वायु, पृथ्वी आदि देवताओं के आह्वान मंत्रों से होती है।

मानसिक शक्ति और स्मृति का अद्भुत प्रमाण

देवव्रत उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, वह ‘जेन जी’ यानी नई पीढ़ी मानी जाती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इंटरनेट और मोबाइल फोन के अधिक उपयोग से पिछले 20 वर्ष में लोगों की याददाश्त न केवल कमजोर हो रही है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे में देवव्रत जैसे तपस्वी न केवल नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। यह उनकी यह उपलब्धि स्मृति विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, भाषा विज्ञान और भारत की ऐतिहासिक प्रथाओं के क्षेत्र में एक नया अध्याय खोली है। अब पूरे विश्व के सामने स्पष्ट हो गया है कि महान ऋ षियों को क्यों पूजा जाता है।

वेदों को सही तरीके से याद रखने और पढ़ने के लिए एक खास क्रम होता है, जिसे दो भागों में बांटा गया है- प्रकृति पाठ और विकृति पाठ। प्रकृति पाठ में संहिता पाठ, पद पाठ, क्रम पाठ आते हैं। संहिता पाठ में मंत्रों को सीधे जोड़े बिना पढ़ा जाता है, जबकि पद पाठ में मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों को अलग-अलग करके पढ़ा जाता है और क्रम पाठ में मंत्रों के शब्दों को जोड़े और क्रम से पढ़ा जाता है।
इसी तरह, विकृति पाठ व्याकरण और उच्चारण की गलतियों को दूर करने के लिए बनाए गए हैं, जिनमें क्रम बढ़ता जाता है और पढ़ाई कठिन होती जाती है। इनमें मुख्य हैं- जटा पाठ, माला पाठ, शिखा पाठ, लेखा पाठ, दंड पाठ (सबसे कठिन), ध्वज पाठ, रथ पाठ व घन पाठ। देवव्रत ने इस कठिन दंडक्रम पाठ को बिना गलती के पूरा किया, जो मानसिक शक्ति और स्मृति का अद्भुत प्रमाण है।

Topics: मंत्रज्ञान परंपरापारायणपाञ्चजन्य विशेषवैदिक ऋचाएं वैदिक पाठशुक्ल यजुर्वेदसनातन इतिहासmain. FEATUREDदंडक्रम पारायणवैदिक परंपरावेदमूर्तिवेद (Veda)माध्यन्दिन शाखावेद परंपरा
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