‘कुशल रणनीति से सिमट रहा नक्सलवाद’-विजय शर्मा
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होम साक्षात्कार

‘कुशल रणनीति से सिमट रहा नक्सलवाद’-विजय शर्मा

'सुरक्षा, विकास और विजन सत्र’ में पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा से लंबी बातचीत की, प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश—

Written byतृप्ति श्रीवास्तवतृप्ति श्रीवास्तव
Dec 7, 2025, 09:11 pm IST
inसाक्षात्कार, मध्य प्रदेश
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा

वर्तमान में बस्तर में नक्सलवाद की स्थिति क्या है?
अब बस्तर में नक्सली लगभग सिमट गए हैं। नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर जिले के दक्षिणी हिस्से में और कांकेर जिले के थोड़े से भाग में नक्सली बचे हैं। इस पर भी बातचीत चल रही है। दोनों रास्ते खुले हैं। यदि वे पुनर्वास करना चाहते हैं, तो सरकार उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करेगी। यदि नहीं तो फिर वही होगा, जो ऐसे लोगों के साथ किया जाना चाहिए। नक्सलियों से बार-बार संपर्क कर कहा जा रहा है कि आप वापस आएं, पुनर्वास कर लें।

 इस मामले में सरकार की नीति क्या है?
नीति बहुत स्पष्ट है। केंद्र सरकार एक गोली नहीं चलाना चाहती, राज्य सरकार भी एक गोली नहीं चलाना चाहती। परंतु यह भी सच है कि कोई बंदूक लेकर जंगलों में घूमे, कोई हमारे शिक्षा-दूतों के गले काट दे, कोई विद्यालयों को बम से उड़ा दे, कोई तालाब, नदी या सड़क के किनारे आई.ई.डी. बिछा दे, कोई जनजाति समुदाय के लोगों की नृशंस हत्या करे और उसके साथ कुछ न किया जाए, यह भी संभव नहीं है। ऐसे लोग पुनर्वास करेंगे तो हृदय से स्वागत है, नहीं करेंगे तो समयानुसार सभी का हिसाब-किताब होगा।

छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा से बातचीत करती हुई तृप्ति श्रीवास्तव

नक्सलियों के आत्मसमर्पण के पीछे कारण क्या हैं?
नई सरकार बनने के बाद ही मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया था। सरकार बनने के ठीक बाद जनवरी, 2024 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी भी यहां आए। केंद्र और राज्य सरकार ने साथ बैठकर यह तय किया कि हम एक आयाम पर काम नहीं करेंगे। नक्सलवाद के ढांचे को खत्म करने के लिए सभी स्तरों पर रणनीति बनाई गई। उनका कानूनी आधार क्या है, सामाजिक आधार क्या है, शहरी आधार क्या है, उन्हें कहां से पैसा मिलता है, इन सभी को देखा गया और काम शुरू किया गया। साथ ही यह विश्लेषण किया गया कि वे नक्सली बने क्यों, और उन्हें किस तरह वापस लाया जा सकता है। हमारी पुनर्वास नीति पूरे भारत में सबसे अच्छी नीति कैसे बने, यह भी देखा गया। इन सबका सुपरिणाम दिख रहा है।

बस्तर में सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव पर क्या कहेंगे?
इस समय यह देखने में आता है कि बस्तर के लोगों को खेल और संस्कृति अत्यंत प्रिय हैं। इसी के तहत बस्तर ओलंपिक का आयोजन किया गया। इसमें युवाओं की बड़ी भागीदारी रही। पिछली बार 1,65,000 युवा जुड़े थे, वहीं इस बार 3,91,000 पंजीकरण हुए हैं। यह बताता है कि बस्तर में सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव भी हो रहा है।

बदलाव में ‘बस्तर पंडुम’ अभियान का कितना प्रभाव है?
इस अभियान का बहुत अच्छा प्रभाव दिख रहा है। पिछली बार इसमें बस्तर की जितनी भी जनजातियां हैं, उनके परिधान, वेशभूषा, वाद्य यंत्र, पेय और खाद्य पदार्थ, श्रृंगार की वस्तुएं-सभी को एक मंच पर लाया गया। इसीलिए आज यह नहीं कहा जा सकता कि कोई एक कारक है जिसकी वजह से यह सब संभव हुआ। अनेक स्तरों पर हुए लगातार और समन्वित प्रयासों का परिणाम है कि बस्तर में नक्सलवाद सिमटता जा रहा है।

लंबे समय तक बस्तर आतंक का पर्याय बना रहा, परंतु आज परिवर्तन का दौर है। यह वह क्षण है जब समाज को आगे आकर उस शून्य को भरना है, जो वहां वर्षों से बना हुआ था। वहां के समाज ने जो समय खोया है, उसकी भरपाई भी हमें ही करनी है। यह हम सभी के लिए चुनौती भी है और दायित्व भी। —पूर्णेन्दु सक्सेना,क्षेत्र संघचालक, मध्य क्षेत्र, रा.स्व.संघ

Topics: प्रगतिसुशासन संकल्पस्थानीय युवाआधुनिक विकास नीतिआर्थिक क्षमताएंसेमीकंडक्टर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माणकृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उद्योगनक्सलवादस्टार्टअप इकोसिस्टमविजय शर्मावन-उपज मूल्यवर्धनसांस्कृतिक अस्मितामिलेट-चालित ग्रामीण अर्थव्यवस्थापुनर्निर्माण
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