यह श्लोक राष्ट्र-चिंतन और देशभक्ति से प्रेरित आधुनिक संस्कृत सुभाषित साहित्य (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, संस्कृत भारती एवं राष्ट्रीय चेतना के सुभाषित संग्रहों) से उद्धृत है।
श्लोक :
आदौ संघटयेद् राष्ट्रं ततः कक्षित् समुन्नतिम्।
संघशक्तिं विना राष्ट्रकुतोवा कुत उन्नतिः॥
भावार्थ :
सर्वप्रथम राष्ट्र का संगठन करे, तत्पश्चात् समुन्नति की आकांक्षा करे। संगठित शक्ति के बिना राष्ट्र कहाँ और समुन्नति कहां?
आज के युग में प्रासंगिकता :
विकास से पहले स्थिरता और एकजुटता (Unity Before Development): समाज या देश की प्रगति तब तक टिकाऊ नहीं हो सकती जब तक वह अंदर से संगठित न हो। बिना राष्ट्रीय एकता के आर्थिक या तकनीकी विकास केवल कागजी बनकर रह जाता है या गृहकलह की भेंट चढ़ जाता है।
टीमवर्क और सामूहिक शक्ति (Power of Collective Effort): आधुनिक प्रबंधन (Management) और राष्ट्र-निर्माण दोनों में सामूहिक शक्ति का महत्व है। बिखरे हुए प्रयास बड़ा बदलाव नहीं ला सकते; संगठित प्रयास ही किसी देश को महाशक्ति बनाते हैं।
आंतरिक सुरक्षा और अखंडता (Internal Security): आज के समय में जब वैचारिक मतभेद, क्षेत्रवाद और जातिवाद जैसी चुनौतियां देश को बांटने का प्रयास करती हैं, यह श्लोक याद दिलाता है कि बिना संगठित समाज के राष्ट्र का अस्तित्व और समृद्धि दोनों ही खतरे में पड़ जाते हैं।

















