नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में नक्सली हिंसा के खिलाफ मिली सफलता का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद के खिलाफ सफलता मिली है, लेकिन अब दिमागी नक्सल की चुनौती से भी सावधान रहने की जरूरत है। प्रधानमंत्री के इस बयान पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)के सौरव दास ने प्रतिक्रिया दी। सौरव ने प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्य को भ्रामक तरीके से पेश किया।
सौरव दास ने क्या कहा
सौरव दास ने सोशल मीडिया पर कहा कि प्रधानमंत्री जी, “दिमागी नक्सल” या ऐसी कोई भी बात काम नहीं आएगी। आप पढ़े-लिखे युवाओं को आसानी से “नक्सली” वगैरह कैसे कह सकते हैं? सिर्फ इसलिए कि वे आपकी सरकार से सवाल पूछते हैं? यह सरासर अहंकार है! उनकी समस्याओं को हल करने में आपकी पूरी नाकामी है! चेतावनी की घंटी बज चुकी है। अब जागृति का समय आ गया है!
प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्य में पढ़े-लिखे युवाओं या सरकार से सवाल करने वालों को दिमागी नक्सली कहने का कोई उल्लेख ही नहीं है।
नक्सलियों पर प्रधानमंत्री का बयान
नक्सलवाद पर प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी में दशकों पुरानी जो चुनौतियां है, उन चुनौतियों को खत्म करना बहुत अनिवार्य है। नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। अनेक माताओं के दूधमल नौजवानों को छीन लिया, बर्बाद कर दिया, हर मां-बाप के सपनों को चूर-चूर कर दिया। इस नक्सलवाद ने चार-चार दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच करके रखा था, बंदूक के नोक पर दबोच करके रखा था, संविधान की धज्जियां उड़ा दी थी और देश के सामान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा हमारी पुलिस के सुरक्षा बल के जवान शहीद हो गए। युद्ध के अंदर जितने सैनिक मरते हैं, उससे ज्यादा हमारे पुलिस जवानों को जान की बाजी लगानी पड़ी, ताकि देश के सामान्य मानवी को सुरक्षा मिले। इस नक्सलवाद ने धरती को लहूलुहान कर दिया था। 2014 में आपने जब हमें मौका दिया, उसी दिन हमने संकल्प लिया था कि हम देश को नक्सलवाद से मुक्त करेंगे और आज मुझे खुशी है कि नक्सली माओवादी हिंसा आखिरी सांस भी शायद रहने की अब तो ताकत नहीं रही है, पूरी तरह उसे खत्म करने की दिशा में, जहां पर कभी नक्सलवादियों की गोलियां चलती थी, जहां पर कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उसी नक्सल क्षेत्रों में, उसी इलाकों में, नक्सल मुक्त होने के कारण विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा रहा है।
लेकिन इस चुनौती को हमने कम नहीं आंकना है। इस चुनौती से हमें और भी सावधान रहने की जरूरत है। वर्षों तक देश की सत्ता में माओवादी सोच के लोग गलियारों में अपनी जगह बनाकर के बैठे थे। सरकारी कमेटियों में सलाहकार के रूप में भी ये माओवादी सोच ने नीतियों को प्रभावित किया था।
जंगलों में हमें हथियारी नक्सलों का खात्मा बुलाने में उस संकट से देश को मुक्त कराने में सफलता मिली है। लेकिन हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल, यह दिमागी नक्सल मौके की तलाश में है। हिंसा अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव कर रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।
सौरव दास ने वक्तव्य को भ्रामक तरीके से पेश किया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस पूरे अंश में कहीं भी पढ़े-लिखे युवा, सरकार से सवाल करने वाले युवा या सरकार की आलोचना करने वाले युवा को दिमागी नक्सल कहने की बात नहीं है। सौरव दास ने पीएम मोदी के बयान को इस तरह से पेश किया कि मानो उन्होंने देश के पढ़े-लिखे और सरकार से सवाल करने वाले युवाओं को नक्सली कहा हो।
















