यह श्लोक प्राचीन सैन्य और प्रशासनिक नीति का हिस्सा होते हुए भी आज के कॉर्पोरेट, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह सटीक है:-
श्लोक-
न संघरुपिणी ज्ञेया सेना बाह्यानुशासना।
समितिर्वा सदस्यानाम् अगृहीतानुशासना।।
भावार्थ –
बाहर से दिखाने वाले अनुशासन मात्र से सेना संगठित स्वरुप वाली नहीं जानी जाती (उसमें आन्तरिक अनुशासन भी आवश्यक) है। वैसे ही सदस्यों की समिति यदि वह अनुशासन में नहीं चलती तो वह भी संगठित समिति नहीं होती।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता-
कार्पोरेट संस्कृति और नेतृत्व : केवल बायोमेट्रिक उपस्थिति, सख्त नियम या दंड के भय से एक बेहतरीन टीम नहीं बनती। यदि कर्मचारी कंपनी के विजन को दिल से स्वीकार नहीं करते (Internal Buy-in), तो वे केवल आदेशों का पालन करेंगे—नवाचार (Innovation) या संकट के समय साथ नहीं खड़े होंगे।
टीम भावना : किसी भी प्रोजेक्ट, खेल या संस्था (समिति) में जब तक सदस्य व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं लेते, तब तक बैठकें और कागजी नियम बेअसर रहते हैं। असली संगठन ‘डंडे के बल’ पर नहीं, ‘साझा लक्ष्य’ पर चलता है।
शासन और नागरिक कर्तव्य : किसी देश या समाज में केवल पुलिस और कानूनों (बाह्य अनुशासन) से व्यवस्था नहीं सुधर सकती। जब तक नागरिक खुद यातायात नियमों, स्वच्छता और नैतिक दायित्वों को अपनी आदत (आन्तरिक अनुशासन) नहीं बनाते, तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।

















