जनजातीय पहचान बचाने की पहल
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विशेष रिपोर्ट : जनजातीय पहचान बचाने की पहल

जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट कर मांग की कि जनजातियों की संस्कृति, अस्मिता और आस्था को बचाने के लिए जनजातीय शब्द की स्पष्ट परिभाषा की जाए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 11, 2026, 04:21 pm IST
inभारत, दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जनजाति सुरक्षा मंच का प्रतिनिधिमंडल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जनजाति सुरक्षा मंच का प्रतिनिधिमंडल

गत 24 मई को दिल्ली के रामलीला मैदान में जनजाति सुरक्षा मंच के तत्वावधान में ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ का आयोजन हुआ। (इसकी विस्तृत रिपोर्ट 7 जून के अंक में प्रकाशित हो चुकी है) समागम के बाद 28 मई को जनजाति सुरक्षा मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की। प्रतिनिधिमंडल में वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह, उपाध्यक्ष तेची गुबिन, संगठन मंत्री अतुल जोग, जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत, सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा, आदिम जाति कल्याण संघ के अध्यक्ष प्रकाश उईके सहित अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता शामिल थे।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से प्रतिनिधिमंडल की क्या बात हुई, क्या मांगें रखी गईं, समागम कैसा रहा, इन सबकी जानकारी देने के लिए 29 मई को नई दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता हुई। इसे वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह और जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा ने संबोधित किया। इन दोनों अधिकारियों ने बताया कि भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में 24 मई को ऐतिहासिक लालकिला मैदान में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम 2026 जनजातीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और अस्मिता का विराट राष्ट्रीय प्रतीक बनकर सामने आया।

देशभर के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों से आए लाखों जनजातीय बंधु-भगिनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, लोक नृत्य, वाद्य यंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इस समागम में सम्मिलित हुए। उनका उद्देश्य एक ऐसी न्यायसंगत मांग को फिर से दोहराना था जो पिछले 75 वर्ष से भी अधिक समय से लंबित है।

उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने जनजातीय समाज की आस्था, संस्कृति, प्रकृति-पूजा, जल-जंगल-जमीन और जीवन-पद्धति को भारत की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि यह समागम आने वाले वर्षों में जनजातीय समाज के महाकुंभ के रूप में स्मरण किया जाएगा।

पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए डॉ. राजकिशोर हांसदा। साथ में सत्येंद्र सिंह आदि

मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह समागम केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि 75 वर्ष से लंबित उस न्यायपूर्ण मांग की राष्ट्रीय पुनर्पुष्टि है, जिसकी प्रतीक्षा आज भी देश का समस्त जनजातीय समाज कर रहा है। जनजातीय पहचान केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं, बल्कि पारंपरिक आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों, सामाजिक परंपराओं और सामुदायिक जीवन-पद्धति से जुड़ा प्रश्न है।

मंच ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक आचारों का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभ प्राप्त नहीं होने चाहिए। ‘आस्था का त्याग संस्कृति का त्याग है, और संस्कृति का त्याग पहचान का त्याग है।’ उन्होंने कहा कि यह प्रश्न सर्वप्रथम वर्ष 1970 में स्वर्गीय डॉ. कार्तिक उरांव ने संसद में उठाया था, जिसका उस समय 235 सांसदों ने समर्थन किया था। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए लगभग 20 वर्ष पूर्व जनजाति सुरक्षा मंच की स्थापना की गई थी।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में ‘अनुसूचित जनजाति’ की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है। साथ ही संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में कन्वर्जन के प्रश्न पर स्पष्ट प्रावधान न होने के कारण वर्षों से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसी अस्पष्टता के कारण अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक दर्जे और पारंपरिक जनजातीय पहचान के बीच गंभीर प्रश्न उत्पन्न हुए हैं।

दोनों ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों ने भी यह माना है कि यदि कन्वर्जन के बाद कोई व्यक्ति अपने समुदाय की परंपराओं, सामाजिक आचरण और सांस्कृतिक जीवन-पद्धति से पूर्णतः विच्छिन्न हो जाता है, तो उसकी जनजातीय पहचान के प्रश्न का परीक्षण सक्षम प्राधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। परंतु व्यावहारिक स्तर पर प्रत्येक मामले को अलग-अलग सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के समक्ष ले जाना सामान्य जनजातीय व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन और अव्यावहारिक है। इसलिए इस विषय पर स्पष्ट, सरल और प्रभावी संवैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

उन्होंने स्मरण कराया कि अप्रैल-मई 2009-10 के दौरान 26 राज्यों के 293 जिलों और 26,253 गांवों में व्यापक अभियान चलाकर वयस्क जनजातीय सदस्यों से 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए गए थे। इन हस्ताक्षरों को संबंधित जिलाधिकारियों और राज्यपाल के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को प्रेषित किया था। इसके पश्चात् 18 जनवरी, 2010 को वरिष्ठ जनजातीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति से भेंट कर इस विषय पर शीघ्र निर्णय का आग्रह किया था। 2011 से अब तक ग्राम संपर्क अभियान, रैलियां, जिला सम्मेलन, 21 राज्यों में विभिन्न कार्यक्रम, प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड तथा लगभग 450 सांसदों से प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से यह अभियान निरंतर संचालित किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि यह विषय केवल आरक्षण अथवा विधिक व्याख्या का नहीं, बल्कि करोड़ों जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जनजातीय समाज ने 75 वर्ष से अधिक समय तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की है; अब समय आ गया है कि उसकी न्यायपूर्ण मांग पर शीघ्र और सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

Topics: सांस्कृतिक अस्मिताजनजाति सुरक्षाआदिम जाति कल्याण संघपारंपरिक आस्थाआस्था का त्यागकन्वर्जनवनवासी कल्याण आश्रमअनुसूचित जनजातिपाञ्चजन्य विशेषजनजाति
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