आत्मनिर्भर भारत : स्वदेशी चेतना का पुनर्जागरण
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आत्मनिर्भर भारत : स्वदेशी चेतना का पुनर्जागरण

भारत आज जिस आत्मनिर्भरता के पथ पर अग्रसर है, वह केवल आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के पुनर्जागरण का विराट आंदोलन है

Written byभजनलाल शर्माभजनलाल शर्मा
Dec 3, 2025, 11:24 am IST
inविश्लेषण, राजस्थान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ‘आत्मनिर्भर भारत’ का आह्वान किया है, वह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह महात्मा गांधी के ‘स्वदेशी’, पं. दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ और आधुनिक तकनीकी भारत के त्रिवेणी संगम की अवधारणा है। इस विचार में स्वदेशी केवल उत्पादन की नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र की पहचान है।
भारत का स्वदेशी भाव हमारी परंपरा की जड़ों में गहराई से बसा है। हमारे गांव अपने आप में आत्मनिर्भर इकाइयां थे और उनमें उत्पादन, विनिमय और उपभोग का अपना संतुलित तंत्र था। अंग्रेजी शासन ने इस तंत्र को तोड़कर भारत को विदेशी वस्तुओं का उपभोक्ता बना दिया।

महात्मा गांधी ने इस मानसिक गुलामी को तोड़ने के लिए ‘स्वदेशी’ को स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनाया। खादी, चरखा, नमक और हस्तशिल्प जैसी साधारण वस्तुएं राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान बन गईं। गांधीजी कहते थे-“स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि आत्मगौरव का प्रतीक है।”

आत्मनिर्भरता का नया युग

आज वही स्वदेशी चेतना आधुनिक रूप में लौट रही है। प्रधानमंत्री मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल से ग्लोबल’ का मंत्र उसी भावना का नया संस्करण है और आत्मनिर्भरता का अर्थ वैश्विक मंच पर भारत की विशिष्ट पहचान स्थापित करना है।

गत एक दशक में भारत ने आत्मनिर्भरता के जिस मार्ग पर कदम रखे हैं, उसने विश्व को चकित किया है। वर्ष 2014 में भारत ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में 142वें स्थान पर था, अब वह शीर्ष 63 देशों में शामिल है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ जैसी योजनाओं ने विनिर्माण क्षेत्र में नई क्रांति की शुरुआत की है।

मोबाइल निर्माण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जो देश एक दशक पहले तक लगभग पूर्ण आयातक था, आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है। रक्षा क्षेत्र में भी भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। तेजस लड़ाकू विमान, पिनाका रॉकेट, आकाश मिसाइल और स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत इसके साक्षात प्रमाण हैं। प्रधानमंत्री मोदी का ‘चिप से शिप तक भारत में’ का संकल्प अब सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण के क्षेत्र में मूर्त रूप ले रहा है। यह ‘स्वदेशी 2.0’ का वास्तविक प्रारूप आत्मनिर्भर भारत का तकनीकी रूपांतरण है।

आर्थिक उपनिवेशवाद से मुक्ति की राह

राजनीतिक स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था पर विदेशी प्रभाव के कई स्वरूप कायम हैं। विदेशी ब्रांड, परामर्श कंपनियां, डेटा नियंत्रण और उपभोक्ता मनोविज्ञान पर विदेशी प्रभुत्व आदि को आधुनिक आर्थिक उपनिवेशवाद का नया चेहरा माना जाता है।

स्वदेशी 2.0 का उद्देश्य अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि नीति, तकनीक और विचार के स्तर पर भी आत्मनिर्भरता स्थापित करना है। राष्ट्रीय डेटा सुरक्षा, घरेलू कंसल्टेंसी को प्रोत्साहन, स्थानीय अनुसंधान और भारतीय नवाचार को प्राथमिकता देना ही इस युग की नई स्वतंत्रता का घोष है।

गांधीजी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी थी। आज आवश्यकता है कि हम विदेशी ब्रांडों, डिजिटल वर्चस्व और उपभोक्तावादी निर्भरता की बेड़ियों को त्यागें। यही आधुनिक भारत का आर्थिक स्वराज्य होगा।

प्रधानमंत्री मोदी का आत्मनिर्भरता मॉडल केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली विकास प्रक्रिया है। जनधन योजना ने 55 करोड़ लोगों को बैंकिंग से जोड़ा, उज्ज्वला योजना ने 10 करोड़ महिलाओं को रसोई के धुएं से मुक्ति दिलाई, और स्वनिधि योजना ने छोटे व्यापारियों को बिना गारंटी ऋ ण उपलब्ध कराया।

नया आत्मविश्वास

अब डिजिटल इंडिया और गति शक्ति योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों को औद्योगिक नेटवर्क से जोड़ दिया है। यूपीआई ने वित्तीय लेन-देन को गांव-गांव तक पहुंचा दिया है। भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। यह आत्मनिर्भर भारत के आत्मविश्वास की सजीव झलक है।

केन्द्र सरकार द्वारा इस वर्ष 305 उत्पादों पर जीएसटी में कमी से आम उपभोक्ताओं को राहत और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिला है।
भारत अब आत्मनिर्भरता को केवल देश की नीति नहीं, बल्कि मानवता की सेवा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। वर्ष 2024-25 में भारत का निर्यात 500 अरब डॉलर के करीब पहुंचा है। फार्मा क्षेत्र में भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक बना हुआ है।

कोरोना महामारी के दौरान भारत ने ‘वैक्सीन मित्र’ बनकर विश्व को जीवनरक्षक वैक्सीन दी, जहां आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से जुड़ गई। राजस्थान ने आत्मनिर्भर भारत के विजन को धरातल पर साकार किया है। सौर ऊर्जा, अनाज, कृषि-प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और एमएसएमई के क्षेत्र में राज्य ने ‘मेड इन राजस्थान’ की पहचान को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा है। जैसलमेर और जोधपुर अब अक्षय ऊर्जा के केंद्र बन चुके हैं, जबकि जयपुर स्टार्टअप इनोवेशन का नया गढ़ बन रहा है। यह दिखाता है कि स्वदेशी अब केवल नारा नहीं, बल्कि नीति का अंग बन चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है, “आत्मनिर्भर भारत, 21वीं सदी का स्वराज्य है।” यह स्वराज्य राजनीतिक स्वतंत्रता से आगे बढ़कर आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। अब समय है कि आत्मनिर्भरता केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि जन-जन की जीवनशैली बने। जब प्रत्येक नागरिक स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देगा, व्यापारी भारतीय वस्तुओं को अपने स्टोर में प्रमुखता देगा और नीति-निर्माता विदेशी प्रभाव से मुक्त निर्णय लेंगे, तभी भारत सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर बनेगा।

महात्मा गांधी का चरखा, पं. दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय और नरेंद्र मोदी का आत्मनिर्भर भारत -तीनों मिलकर आज ‘स्वदेशी 2.0’ को अर्थ देते हैं। यही भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कर, आत्मगौरव, नवाचार और समृद्धि से प्रकाशित करेगा।

Topics: पुनर्जागरणस्वदेशी चेतनास्वदेशी (गांधी)अंत्योदय (दीनदयाल उपाध्याय)आर्थिक स्वराज्यराष्ट्रीय चरित्रवोकल फॉर लोकल21वीं सदी का स्वराज्य‘आत्मनिर्भर भारत’Self-reliant Indiaपाञ्चजन्य विशेषत्रिवेणी संगम
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