भारत की राजनीतिक बहस में जॉर्ज सोरोस का नाम अब अपने आप में एक आरोप बन चुका है। राष्ट्रवादी पक्ष वर्षों से कांग्रेस और वामपंथी तंत्र पर सोरोस के एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाता रहा है। विडंबना यह है कि जिस ‘ओपन सोसाइटी’ के नाम पर सोरोस ने अपना वैश्विक नेटवर्क खड़ा किया, उसका वैचारिक स्रोत ऑस्ट्रियाई-ब्रिटिश दार्शनिक कार्ल पॉपर हैं। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पॉपर के विचारों से प्रभावित सोरोस उन्हें अपना गुरु मानते रहे हैं, और उनकी पुस्तक ‘द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़’ से ही सोरोस के संगठनों को उनका नाम मिला।
पॉपर की सबसे प्रसिद्ध चेतावनी वही है जिसे सोरोस के भारतीय प्रशंसक सबसे कम याद करते हैं: असीम सहिष्णुता अंततः सहिष्णुता को ही समाप्त कर देती है।
शरजील इमाम का तिहाड़ जेल से लिखा हालिया पत्र इस चेतावनी को परखने का उपयुक्त अवसर है। पत्र एक ऐसा प्रश्न उठाता है जो सुनने में सीधा लगता है: क्या स्वतंत्र भारत में मुसलमानों को राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक रूप से वह हिस्सा मिला, जिसके वे हकदार थे? इमाम का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक है। इसके आगे वे मुसलमानों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व और अधिक मजबूत संस्थागत सुरक्षा की मांग करते हैं, विभाजन को मुस्लिम मांगों की अनदेखी का परिणाम बताते हैं और यह कहते हैं कि भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता।
ये गंभीर दावे हैं और इनका उत्तर भी गंभीरता से दिया जाना चाहिए। पॉपर के खुले समाज में कोई भी दावा, चाहे वह अन्याय का आरोप ही क्यों न हो, प्रमाण और आलोचना से ऊपर नहीं होता। इसलिए इमाम के पत्र को तीन कसौटियों पर परखना चाहिए: हमारा संवैधानिक इतिहास, उपलब्ध आंकड़े, और वह न्यायिक प्रक्रिया जिससे स्वयं इमाम गुजर रहे हैं।
पृथक निर्वाचन का सबक
धर्म के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व भारत के लिए कोई नया विचार नहीं है। अंग्रेजों ने 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के साथ मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था शुरू की थी। अगले लगभग चार दशकों में यह प्रयोग साम्प्रदायिक राजनीति को शांत करने के बजाय उसे संस्थागत आधार देता गया। मतदाता नागरिक के रूप में नहीं, अपने मजहब के सदस्य के रूप में मतदान करने लगा, और राजनीतिक लामबंदी की सबसे सहज धुरी धार्मिक पहचान बन गई।
विभाजन की त्रासदी के बाद संविधान सभा ने इस मॉडल को सोच-समझकर छोड़ा। पृथक निर्वाचन समाप्त हुए और सभी नागरिकों के लिए साझा चुनावी व्यवस्था अपनाई गई। 1949 में सभा ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों का विचार भी त्याग दिया। यह अल्पसंख्यकों की उपेक्षा नहीं थी। उद्देश्य यह था कि अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहें, लेकिन उन्हें स्थायी रूप से अलग राजनीतिक खांचों में न बांटा जाए।
इसी सोच के अनुरूप संविधान ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का भार राजनीतिक कोटे पर नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों पर रखा। अनुच्छेद 25 से 28 धर्म को मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देते हैं। अनुच्छेद 29 और 30 धार्मिक तथा भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति की रक्षा करने और अपने शिक्षण संस्थान स्थापित तथा संचालित करने का अधिकार देते हैं। इन प्रावधानों पर बहस हो सकती है, उनके क्रियान्वयन की आलोचना भी हो सकती है। परंतु यह कहना कि संविधान अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में विफल रहा, ऐसा दावा है जिसे संविधान का अपना पाठ ही कमजोर कर देता है।
आनुपातिक प्रतिनिधित्व: नागरिक का या संप्रदाय का?
आनुपातिक प्रतिनिधित्व अपने आप में कोई अलोकतांत्रिक विचार नहीं है। राज्यसभा जैसे चुनावों में भारत स्वयं इस पद्धति का उपयोग करता है। लेकिन यहां प्रश्न पद्धति का नहीं, इकाई का है। जब आनुपातिक प्रतिनिधित्व नागरिकों के मतों पर आधारित होता है, तो उसका लक्ष्य मतों और सीटों के बीच बेहतर संतुलन होता है। जब वही सिद्धांत धार्मिक समुदायों पर लागू किया जाता है, तो मजहब राजनीतिक शक्ति के बंटवारे का स्थायी आधार बन जाता है। यह ठीक वही रास्ता है जिसे संविधान निर्माताओं ने 1909 से 1947 तक का अनुभव देखकर बंद किया था।
मुसलमानों को नागरिक के रूप में संरक्षण देना एक बात है, और उन्हें एक स्थायी राजनीतिक गुट के रूप में मान्यता देना बिल्कुल दूसरी। पहला गणतंत्र की नींव है, दूसरा उस नींव से पीछे लौटना।
विभाजन: पूरा इतिहास या चुनी हुई कहानी?
इमाम विभाजन को मुख्यतः इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि विकेंद्रीकरण, स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व की मुस्लिम मांगें ठुकरा दी गईं और देश बंट गया। लेकिन 1947 किसी एक संवैधानिक मतभेद का परिणाम नहीं था। उसके पीछे परस्पर टकराते राष्ट्रवाद थे, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग थी, संघीय ढांचे को लेकर कांग्रेस का अपना दृष्टिकोण था, ब्रिटिश नीति थी, कैबिनेट मिशन योजना की विफलता थी और लगातार तीखी होती साम्प्रदायिक लामबंदी थी।
इतने उलझे हुए इतिहास में से केवल एक धागा उठाकर उसे पूरी कहानी बता देना इतिहास-लेखन नहीं, सुविधा के अनुसार किया गया चयन है। और जब यही चयन आज की राजनीतिक मांगों का आधार बनाया जाए, तो उसकी परख और भी आवश्यक हो जाती है।
आंकड़े क्या कहते हैं
सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार के दावे पर भी तस्वीर उतनी सरल नहीं है जितनी इमाम के पत्र में दिखाई देती है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य डॉ. शमिका रवि द्वारा प्रस्तुत घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 2011-12 से 2023-24 के बीच हर समुदाय में गरीबी तेजी से घटी है।
https://eacpm.gov.in/reports/a-secular-democracy-in-practice-objective-assessment-of-amenities-programs-in-india/

गांवों में मुसलमानों की गरीबी दर 31.7 प्रतिशत से गिरकर 2.4 प्रतिशत पर आ गई, जबकि ग्रामीण हिंदुओं में यह 30.9 प्रतिशत से घटकर 4.0 प्रतिशत रही। यानी ग्रामीण भारत में आज मुसलमानों की गरीबी दर हिंदुओं से कम है। शहरों में मुसलमानों की गरीबी 39.4 प्रतिशत से घटकर 5.7 प्रतिशत हुई, और हिंदुओं की 24.4 प्रतिशत से घटकर 3.7 प्रतिशत।
इसका अर्थ यह नहीं कि कोई अंतर शेष नहीं है। शहरी मुसलमानों की गरीबी दर अब भी शहरी हिंदुओं से अधिक है, और इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। किंतु ये आंकड़े लगातार गहराते और एकसमान बहिष्कार की उस कहानी का समर्थन नहीं करते, जिस पर इमाम का तर्क टिका है।

असमानता के व्यापक संकेतक भी इसी दिशा में इशारा करते हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार गिनी सूचकांक से मापी जाने वाली उपभोग असमानता इस अवधि में लगभग 28.8 से घटकर 25.5 रह गई। https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=154837&ModuleId=3®=48&lang=2 भारत में असमानता समाप्त नहीं हुई है, पर बिगड़ती सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का कोई भी व्यापक दावा इन आंकड़ों को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता।
सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास
यदि भेदभाव का आरोप सही होता, तो उसका सबसे स्पष्ट प्रमाण सरकारी योजनाओं के वितरण में दिखना चाहिए था। डॉ. शमिका रवि का प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के लिए अप्रैल 2023 में प्रकाशित शोध पत्र ‘ए सेक्युलर डेमोक्रेसी इन प्रैक्टिस’ ठीक यही परखता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे (2015-16) और पांचवें (2019-21) दौर में शामिल 12 लाख से अधिक परिवारों के आंकड़ों के आधार पर यह अध्ययन देखता है कि देश के सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों तक बिजली, बैंक खाते, शौचालय, रसोई गैस और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं किस तरह पहुंचीं। https://eacpm.gov.in/wp-content/uploads/2023/07/18-Democracy-in-Practice.pdf

निष्कर्ष स्पष्ट हैं। सबसे गरीब मुस्लिम परिवारों में बिजली की पहुंच 50 प्रतिशत से बढ़कर 86 प्रतिशत हो गई, जबकि सबसे गरीब हिंदू परिवारों में यह 52 से 85 प्रतिशत हुई। बैंक खातों में गरीब मुस्लिम परिवार 66 से 92 प्रतिशत पर पहुंचे और हिंदू परिवार 75 से 93 प्रतिशत पर। शौचालय की सुविधा गरीब मुस्लिम परिवारों में 31 से 67 प्रतिशत तक पहुंची और हिंदू परिवारों में 8 से 44 प्रतिशत तक। अध्ययन का निष्कर्ष है कि सरकार ने केवल बहुसंख्यक समुदाय के लिए काम किया हो, या किसी समुदाय की बहुलता वाले जिलों के आधार पर भेदभाव किया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता।
यही ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का व्यावहारिक अर्थ है: बिजली का कनेक्शन, बैंक खाता और शौचालय धर्म देखकर नहीं, जरूरत देखकर पहुंचे। यह दृष्टि नई नहीं है। फरवरी 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान फतेहपुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार पर धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए कहा था: “गांव में कब्रिस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए। रमजान में बिजली आती है तो दिवाली में भी आनी चाहिए। भेदभाव नहीं होना चाहिए।” https://indianexpress.com/elections/uttar-pradesh-assembly-elections-2017/uttar-pradesh-elections-2017-pm-modi-fatehpur-rally-ramzan-diwali-sp-congress-bjp-no-discrimination-4532942/ विपक्ष ने तब इस बयान को साम्प्रदायिक बताया था, पर उसका मूल संदेश समान व्यवहार का था: राज्य की सुविधाएं किसी के त्योहार या मजहब के हिसाब से नहीं बंटनी चाहिए।
अंतर दो राजनीतिक दृष्टियों का है। एक दृष्टि नागरिकों को मजहबी पहचान के आधार पर वोट बैंकों में बांटती है और फिर उन्हीं पहचानों के नाम पर सुविधाओं का बंटवारा करती है। दशकों तक यही राजनीति चली, और उसकी विरासत यह थी कि 2015-16 तक देश के सबसे गरीब मुस्लिम परिवारों में से आधे बिजली के बिना थे और दो-तिहाई से अधिक के पास शौचालय नहीं था। दूसरी दृष्टि हर व्यक्ति को केवल नागरिक मानती है और लाभ जरूरत के आधार पर पहुंचाती है। आंकड़े बताते हैं कि दूसरी दृष्टि ने उसी समुदाय को कहीं अधिक दिया जिसके नाम पर पहली दृष्टि राजनीति करती रही। इमाम जिस साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग करते हैं, वह पहली दृष्टि को संवैधानिक दर्जा देने की मांग है।
मामला असहमति का नहीं है
पत्र का एक अनकहा संदेश यह भी है कि इमाम अपने विचारों के कारण जेल में हैं। इस दावे को उनके मामले की न्यायिक यात्रा के सामने रखकर देखना चाहिए। दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के मामले में उनकी जमानत पर 2025 में ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट विचार कर चुके हैं। जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले के पांच सह-आरोपियों को जमानत दी, पर इमाम और उमर खालिद की याचिकाएं अस्वीकार कर दीं। न्यायालय ने यह छूट अवश्य दी कि संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने पर या एक वर्ष बीतने पर, जो भी पहले हो, नई याचिका दायर की जा सकती है। 2026 में इमाम की नई याचिका ट्रायल कोर्ट ने खारिज की और सितंबर 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी अपील भी अस्वीकार कर दी। जामिया से जुड़े एक अलग मामले में भी उनकी जमानत पर सुनवाई हुई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इमाम और खालिद को अन्य आरोपियों से अलग श्रेणी में रखा। भाषणों, बैठकों, संचार, विचार-विमर्श, विरोध प्रदर्शनों की रणनीति और चक्का जाम के स्वरूप को देखते हुए उन्हें कथित साजिश का “वैचारिक संचालक” माना गया, जबकि गुलफिशा फातिमा जैसे आरोपियों की भूमिका स्थानीय स्तर पर सुविधा उपलब्ध कराने वालों की बताई गई। न्यायालय ने यह भी माना कि जमानत के चरण में अभियोजन सामग्री को प्रथम दृष्टया स्वीकार करने पर इमाम के विरुद्ध आरोपों को सही मानने के उचित आधार मौजूद हैं।
आरोपों की प्रकृति भी ध्यान देने योग्य है। जनवरी 2020 के उनके भाषण के अभियोजन पक्ष के विवरण के अनुसार, उन्होंने कथित रूप से बड़ी संख्या में लोगों को जुटाकर असम की ओर जाने वाले मार्ग को रोकने, सिलीगुड़ी गलियारे यानी “चिकन नेक” के माध्यम से पूर्वोत्तर को शेष देश से काटने और बाधा डालने वाले चक्का जाम की बात की थी। सर्वोच्च न्यायालय के जनवरी 2026 के आदेश में ये आरोप दर्ज हैं। अभियोजन का मामला इससे भी आगे जाकर दिल्ली दंगों की व्यापक साजिश और उसके बाद हुई हिंसा की योजना में उनकी कथित सक्रिय भूमिका तक जाता है।
यह सब दोषसिद्धि नहीं है। जमानत संबंधी आदेश, चाहे उनमें आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने की टिप्पणी ही क्यों न हो, अंतिम निर्णय नहीं होते, और आरोपों की असली परीक्षा मुकदमे में होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह किसी ऐसे असहमत नागरिक का मामला नहीं है जिसे बिना सुनवाई के बंद कर दिया गया हो। नागरिकता संशोधन अधिनियम की आलोचना करना या मुस्लिम राजनीतिक लामबंदी की वकालत करना लोकतांत्रिक असहमति है। किसी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गलियारे को अवरुद्ध करने की कथित योजना और हिंसा की कथित तैयारी उस दायरे से बाहर की बात है, और स्वतंत्र अदालतें इसे बार-बार परख रही हैं।
खुले समाज की असली शर्त
पॉपर का आशय यह कभी नहीं था कि अलोकप्रिय विचारों को दबाया जाए। उनका आशय यह था कि खुला समाज उन आंदोलनों को अनिश्चितकाल तक सहन करने के लिए बाध्य नहीं है जो उन्हीं संस्थाओं को कमजोर करना चाहते हैं जिन पर उसका खुलापन टिका है। भारत में उन संस्थाओं की नींव यही है कि हर व्यक्ति पहले नागरिक है, किसी मजहबी गुट का सदस्य बाद में।
इस कसौटी पर इमाम का पत्र तीनों मोर्चों पर विफल होता है। उसके ऐतिहासिक दावे चयनित हैं, उसके सामाजिक-आर्थिक दावे आंकड़ों से मेल नहीं खाते, और उसकी राजनीतिक मांग उस संवैधानिक व्यवस्था को पलटने की है जो साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के कड़वे अनुभव से जन्मी थी।
मुसलमान समान अधिकारों के हकदार हैं। वे भेदभाव से सुरक्षा और वास्तविक राजनीतिक अवसर के हकदार हैं। भारत का संविधान उन्हें यह सब देता है, और पिछले एक दशक की योजनाएं यह बिना भेदभाव के उन तक पहुंचा भी रही हैं। लेकिन समान नागरिकता और मजहब के आधार पर सत्ता में पहले से तय हिस्सा, ये दो अलग चीजें हैं, और दोनों एक साथ नहीं चल सकतीं।
जो लोग सोरोस के ‘खुले समाज’ की दुहाई देते हैं, उन्हें पॉपर को पूरा पढ़ना चाहिए। पॉपर का खुला समाज नागरिकों का समाज है, मजहबी गुटों का नहीं। 1909 से 1947 तक भारत ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की कीमत चुकाई, और उस रास्ते का अंत विभाजन में हुआ। संविधान निर्माताओं ने वह अध्याय सोच-समझकर बंद किया था। शरजील इमाम उसे फिर से खोलना चाहते हैं। भारत को वह दरवाजा बंद ही रखना चाहिए।















