आज की युवा पीढ़ी अपने-अपने फोन में खोई हुई है। हम महाभारत रामायण देखते थे और साझा करते थे। परिवार के साथ बैठ कर अनुभव साझा करते थे। क्या दर्शक बदल गए हैं या देखने का तरीका बदल गया? इस बदलाव को आप कैसे देखते हैं ?
अपने-आप में हर चीज की स्वतंत्रता एक वरदान है। हममें से कई लोग अगर किसी इस्लामिक देश में गए होंगे तो उन्हें पता होगा कि स्वतंत्रता न होने के मायने क्या होते हैं। इसलिए स्वतंत्रता तो वरदान है ही, लेकिन उस स्वतंत्रता के प्रति सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है। सैटेलाइट चैनलों की बात करें तो दूरदर्शन तो बहुत पहले से था। मुझे स्मरण है कि 1991 के बाद जब सैटेलाइट चैनल आने शुरू हुए, तब उनका कोई नियामक तंत्र नहीं था। जब मैं 1996-97 में लोकसभा में था, तब प्रसार भारती एक्ट की संसदीय समिति बनी थी, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य थे। उस समय तक चैनलों को आए पांच-छह साल हो चुके थे। दूरदर्शन की जो आचार संहिता थी, उसी के आधार पर उनके नियम-कानून बनाए गए। आज वे नियम स्वयं अप्रासंगिक हो चुके हैं।
नियामक कार्यविधि पहले बनाई जानी चाहिए, न कि प्रतिक्रियात्मक ढंग से। प्रसार भारती एक्ट भी छह-आठ साल बाद आया, जब तक सारे चैनल स्थापित हो चुके थे और उनमें से एक चैनल का स्वामी अमेरिकी या ब्रिटिश था। तब जो सांस्कृतिक प्रदूषण हो रहा था, वह आज भी हो रहा है।
ओटीटी के मामले में भी यही सवाल है। सरकारें यह क्यों नहीं देख पा रही हैं कि आपने जो स्वतंत्रता दी है, उसके माध्यम से ये प्लेटफार्म स्थापित हो रहे हैं और इनमें विश्वभर का कंटेंट आ रहा है। ऐसे में इसकी नियामक कार्यविधि क्या होनी चाहिए? आज ओटीटी प्लेटफार्मों के लिए वही आईटी नियामक कार्यविधि-2021 है, जिसके तहत उन्हें स्व-नियमन के लिए कहा गया है।
आज की पीढ़ी जो ओटीटी देख रही है, उसे बहुत-सी ऐसी चीजें भी सामान्य लगने लगी हैं, जो भारतीय संस्कृति में सामान्य नहीं हैं। उन्हें सहज स्वीकार्य बनाया जा रहा है। भारत मेरे लिए आज भी इंडिया नहीं, भारत है। इस देश की परिभाषा ही भारत से है। इसलिए जो नया सामान्य यानी ‘न्यू नॉर्मल’ बनाया जा रहा है, उस पर भी विचार होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अभद्र भाषा और कई बार अश्लीलता की भी छूट ली जाती है। तर्क दिया जाता है कि दर्शक समझदार है, उसे तय करने दीजिए। यह भारत की सभ्यता और संस्कृति नहीं है। विदेशों में अपनी संस्कृति के खिलाफ कुछ होता है तो लोग उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। हम क्यों नहीं हो रहे हैं? इसी कारण गलत चीजें और गलत इतिहास लोगों के सामने दिखाए जा रहे हैं। कई ऐतिहासिक फिल्मों की पूरी सामग्री का इतिहास से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें सिर्फ एक एक्शन फिल्म बनाकर बाजार की ताकत से हिट करा दिया जाता है और कहा जाता है कि हमने पैसे कमा लिए। लेकिन सच्चे इतिहास की कीमत पर पैसा और व्यवसाय नहीं होना चाहिए।
आज ऐसा नहीं हो रहा है। नई व्याख्या के नाम पर मूल भावना से छेड़छाड़ हो रही है। इसमें आस्था और इतिहास, दोनों से छेड़छाड़ होती है। ऐसा करके हम अपनी जड़ों को नकार रहे हैं या उनके बारे में झूठ बोल रहे हैं।
नई व्याख्या के साथ और आप मूल भावना से भी छेड़छाड़ न करो। उसकी प्रक्रिया क्या होनी चाहिए?
मुझे तो लगता है कि भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद को इसका केंद्र बना देना चाहिए। अगर ऐतिहासिक फिल्म बनानी है तो उसकी पटकथा का पूर्व अनुमोदन करवाना चाहिए। वहां इतिहासकार बैठे हैं। वे तथ्यों की जांच-पड़ताल कर उसे स्वीकृत करें कि यह तथ्यात्मक रूप से सही है। यह भी सही है कि थोड़ी-बहुत रचनात्मक स्वतंत्रता लेनी पड़ती है। हम वह लेंगे, लेकिन इतिहासकारों से जांच कराने पर ऐतिहासिक त्रुटियों की संभावना कम होगी और तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी।
कोई भी सीरीज या फिल्म इस तरह के प्लेटफॉर्म पर आती है तो अक्सर विवादों के साथ आती है। क्या विवाद और प्रचार के बीच की रेखा अब धूमिल होती जा रही है?
विवाद ही तो प्रचार है। विवाद भी एक प्रचार है। पूरी तरह विवादास्पद बनाकर प्रचार करना, हमने महाभारत पर कोई विवाद नहीं देखा, लेकिन उसका प्रचार भी हुआ और वह आज तक याद है। समय बदल गया है। महाभारत में जिस पैसे के ऊपर हम सबने काम किया, उस पैसे में आज आपको घर में काम करने वाला भी नहीं मिलेगा।
अब सब कुछ बहुत व्यावसायिक हो चुका है। पांच हजार स्क्रीन चाहिए। आपको ढाई सौ करोड़ रुपये खर्च करने हैं। ढाई सौ करोड़ खर्च करने के लिए बड़ा अभिनेता चाहिए। बड़े स्टार अभिनेताओं में से कितने पढ़ते हैं या पढ़े-लिखे हैं? अगर उन्होंने किसी ऐतिहासिक फिल्म के लिए हामी भर दी है तो उस फिल्म का इतिहास और उस विषय का इतिहास वे कितना जानते हैं?
दर्शकों को आप किस तरह की सलाह देना चाहेंगे?
सबसे पहले तो मैं सारे माता-पिता से कहना चाहूंगा कि बच्चों को हाथ में मोबाइल के बजाय किताबें पकड़ाएं। जिस दिन बच्चे एक घंटा पढ़ना शुरू कर देंगे, उसी दिन बदलाव शुरू होगा। आप एक घंटा फोन देखेंगे तो उसके बाद सोचिए कि मैंने क्या पाया? कुछ नहीं पाया। जबकि एक घंटा अच्छी साहित्यिक किताब पढ़ेंगे तो कुछ पाएंगे-संस्कार पाएंगे, वह विवेक पाएंगे, सत्य-विवेक-बुद्धि मिलेगी। परिवर्तन वहीं से शुरू होगा। बच्चों में धैर्य और संयम नहीं है, क्योंकि यह रील्स का जमाना है। कंटेंट क्रिएटर्स से मेरा आग्रह है कि अगर वे भारत का कंटेंट बना रहे हैं तो सबसे पहले उन्हें भारत, उसके साहित्य और उसकी संस्कृति को जानना होगा।

















