क्या शेयर बाजार किसी देश की आर्थिक सेहत और प्रगति का वास्तविक संकेतक हो सकता है?
आशीष कुमार चौहान : किसी भी अर्थव्यवस्था के कई आयाम और प्राथमिकताएं होती हैं। उनमें से शेयर बाजार भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। लेकिन किसी भी एक संकेतक को पूरी अर्थव्यवस्था का पूर्ण प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
किसी भी अर्थव्यवस्था में बचत मुख्य रूप से परिवारों और आम लोगों से आती है। लोग अपनी छोटी-छोटी बचत करते हैं। वह पैसा बैंक में जमा हो सकता है, सोने में लगाया जा सकता है, अचल संपत्ति में लगाया जा सकता है या उद्योगों में निवेश किया जा सकता है। यदि पैसा सोने में चला गया और वह तिजोरी में पड़ा है, तो उससे सीधे कोई नई आर्थिक गतिविधि पैदा नहीं होती। इसी तरह, यदि पैसा किसी ऐसी संपत्ति में लगा है जो केवल मूल्य बढ़ने की प्रतीक्षा कर रही है, तो उसका उत्पादक उपयोग सीमित हो सकता है। लेकिन जब वही बचत बैंक के माध्यम से उद्योगों तक पहुंचती है या शेयर बाजार के माध्यम से किसी कंपनी में निवेश होती है, तो वह पैसा व्यवसाय को बढ़ाने में इस्तेमाल होता है। कंपनी अपना कारोबार बढ़ाती है, उत्पादन करती है, रोजगार पैदा करती है और लाभ कमाती है। जब आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो आप उस कंपनी में एक छोटे भागीदार बन जाते हैं। कंपनी का कारोबार बढ़ता है और लाभ होता है तो उस लाभ में आपकी हिस्सेदारी भी बनती है। यही शेयर बाजार का मूल सिद्धांत है।
भारत के आर्थिक विकास में शेयर बाजार की भूमिका को आंकड़ों के माध्यम से कैसे समझा जा सकता है?
आशीष कुमार चौहान: उदारीकरण के शुरुआती दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 250 से 270 अरब डॉलर के आसपास था और शेयर बाजार का कुल बाजार पूंजीकरण लगभग 50 से 70 अरब डॉलर के आसपास था। आज भारत की अर्थव्यवस्था कई ट्रिलियन डॉलर की हो चुकी है और शेयर बाजार का बाजार पूंजीकरण भी कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। इस परिवर्तन को केवल संख्याओं के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण चीज है- विश्वास। पहले शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी। जब राष्ट्रीय शेयर बाजार की शुरुआत हुई, तब लगभग 10 लाख लोग शेयर बाजार में निवेश करते थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती गई। वर्ष 2014 के आसपास यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी थी और आज निवेशकों की संख्या 13 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इसका अर्थ है कि देश के करोड़ों लोगों ने अपने उद्यमियों और कंपनियों पर भरोसा किया है।
जब निवेशकों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी है तो क्या इसका अर्थ यह है कि सभी निवेशक शेयर बाजार के बारे में शिक्षित भी हैं?
आशीष कुमार चौहान: यह जरूरी नहीं है कि निवेशकों की संख्या बढ़ने का अर्थ यह हो कि हर निवेशक शेयर बाजार के बारे में पूरी तरह शिक्षित है। निवेश में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है-विश्वास। आप कितना भी पढ़ लें, अंततः निवेश करते समय यह विश्वास करना पड़ता है कि जिस कंपनी में आप पैसा लगा रहे हैं, वह आगे बढ़ेगी। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि निवेश में जोखिम होता है।
निवेशकों की सुरक्षा के लिए शेयर बाजार की व्यवस्था में क्या बदलाव हुए हैं?
पिछले तीन-चार दशकों में निवेशकों की सुरक्षा के लिए व्यवस्था लगातार मजबूत हुई है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को 1990 के दशक में अधिक अधिकार मिले और उसके बाद राष्ट्रीय शेयर बाजार की स्थापना हुई। यदि कोई सूचीबद्ध कंपनी आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराती है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की व्यवस्था है। लगातार नियमों का पालन नहीं करने पर उसके कारोबार पर रोक लग सकती है और आगे चलकर उसे शेयर बाजार से बाहर भी किया जा सकता है। हमारी भूमिका मुख्य रूप से पारदर्शिता और सूचना सुनिश्चित करने की है। आज निवेशक के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है। लेकिन जानकारी उपलब्ध कराना एक बात है और उस जानकारी को समझकर निर्णय लेना दूसरी बात।
सामाजिक उद्यमों और सामाजिक क्षेत्र के लिए शेयर बाजार किस तरह मदद कर सकता है?
आशीष कुमार चौहान: वर्ष 2019 में केंद्रीय बजट में सामाजिक शेयर बाजार की स्थापना की घोषणा की गई। इसके बाद नियामक के सामने यह सवाल आया कि दान और सामाजिक कार्यों को शेयर बाजार की व्यवस्था में किस प्रकार लाया जाए। इस दिशा में विचार-विमर्श के बाद एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसमें सामाजिक संस्थाएं पंजीकरण करा सकती हैं और सामाजिक कार्यों के लिए धन जुटा सकती हैं। इसके लिए शून्य कूपन, शून्य मूलधन जैसी संरचना बनाई गई, जिसे सामाजिक क्षेत्र के लिए विशेष वित्तीय साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक गैर-सरकारी संगठन सामाजिक शेयर बाजार से जुड़े हैं। कुछ संस्थाओं ने इसके माध्यम से करोड़ों रुपए जुटाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में काम किया है।
ग्रामीण क्षेत्र और महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने में सरकारी नीतियों की क्या भूमिका रही है?
छाया नंजप्पा: मैंने पिछले 20 वर्षों में सब्सिडी या सरकारी योजनाओं पर बहुत अधिक निर्भरता नहीं रखी। मुझे कभी-कभार कुछ योजनाओं के माध्यम से सहायता मिली, लेकिन व्यवसाय के विकास के लिए हमने मुख्य रूप से अपने प्रयासों और ऋण का सहारा लिया। कई बार हमने 12 से 13 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण लेकर भी कारोबार को आगे बढ़ाया। लगातार मेहनत और सही दिशा में काम करने से आज हमारा संगठन उस स्तर तक पहुंचा है जहां हमने बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के सामने अपनी जगह बनाई है। लगभग 20 वर्ष पहले हमने करीब 50 किलोग्राम शहद से शुरुआत की थी। आज हमारा संगठन हर महीने लगभग 200 टन शहद खरीदने वाली संस्थाओं में शामिल है। इससे यह साबित होता है कि ग्रामीण भारत में भी बड़े स्तर का सामाजिक उद्यम खड़ा किया जा सकता है। इसके लिए केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। अवसरों को पहचानना, नवाचार करना और लगातार प्रयास करते रहना जरूरी है।
क्या सरकार की योजनाएं और नीतियां पर्याप्त रूप से सही लोगों तक पहुंच रही हैं?
छाया नंजप्पा: सरकार की कई योजनाएं अच्छी तरह बनाई गई हैं और उनके लिए पर्याप्त बजट भी रखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में बहुत बड़े परिवर्तन हुए हैं। लेकिन समस्या कई बार योजनाओं के क्रियान्वयन में होती है। हर योजना का लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए जिसके लिए वह बनाई गई है। महिला आरक्षण और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की तरह ही यह भी जरूरी है कि महिलाओं को वास्तविक जिम्मेदारियां और निर्णय लेने की भूमिकाएं मिलें। जिन महिलाओं ने जमीनी स्तर पर वर्षों तक काम किया है, उनके अनुभव का उपयोग सरकारी समितियों, बोर्डों और विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाओं में किया जाना चाहिए। इससे सरकार और जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकता है।

















