बिहार विधानसभा चुनाव-2025 : जंगलराज से सुशासन तक
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बिहार विधानसभा चुनाव-2025 : जंगलराज से सुशासन तक

1990 से 2005 तक बिहार में अपराध, भय, जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार को राजनीतिक संरक्षण के कारण कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ, माओवादी आतंक समाप्त हुआ और सामाजिक-आर्थिक विकास की राह खुली। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं के सशक्तिकरण, रोजगार, बिजली, उद्योग, स्थिरता, सुरक्षा और विकास का नया अध्याय शुरू हुआ

Written byमनोज रघुवंशीमनोज रघुवंशी
Nov 3, 2025, 10:11 am IST
inविश्लेषण, बिहार

बिहार में 1990 से 2005 तक चले ‘जंगलराज’ से मुक्ति मिले 20 साल हो गए हैं। 2005 से 2024 तक सबसे बड़ा बदलाव यह है कि हत्या की घटनाओं में 20 प्रतिशत की कमी आई है। अपहरण ‘उद्योग’ बंद हो गया, लूटपाट की घटनाएं काबू में हैं तथा डकैती व फिरौती के मामले 80 प्रतिशत घटे हैं। बिहार के लोग अब स्थायी विकास चाहते हैं।

मनोज रघुवंशी
वरिष्ठ पत्रकार

लालू-राज में बिहार भय और अराजकता से जकड़ा हुआ था। अपराधी और जातीय हिंसा, दोनों का आतंक था। पुलिस का सायरन भरोसे के बजाय डर पैदा करता था, क्योंकि नेताओं की अपराध को माैन स्वीकृति से पुलिस लाचार थी। शहाबुद्दीन जैसे दुर्दांत अपराधी खुलेआम हथियारों के साथ घूमते थे और उनके जैसे अपराधियों की सीधी पहुंच मुख्यमंत्री आवास तक थी। जिस शहाबुद्दीन पर 75 मुकदमे दर्ज थे और दो मामलों में सजा हो चुकी थी, सरकार उसके आगे झुकी रहती थी।

लालू-राज में शाम के बाद लोग घर से निकलने से डरते थे, अपहरण उद्योग फल-फूल रहा था और फिरौती लाखों से बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई थी। लेकिन नीतीश कुमार की अगुआई में राजग की सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ और बिहार में नरसंहारों व दंगों का दौर खत्म हुआ। कानून व्यवस्था में सुधार इतना हुआ है कि अब चुनाव दो चरणों में संपन्न हो रहे हैं। राज्य रंगदारी, हत्या, और माओवादी आतंक से निकलकर स्थिरता और विकास की राह पर बढ़ रहा है। इन दो दशकों में नीतीश कुमार सुशासन और विकास के वाहक बने हैं। केंद्र सरकार से भी राज्य को भरपूर सहयोग मिला।

नहीं दोहराना चाहते गलती

1980 और 1990 के दशक की हिंसा की कहानियां अब पुरानी पीढ़ी तक सीमित हैं। पिछले दस वर्ष में प्रदेश में कोई सामूहिक नरसंहार नहीं हुआ। लोग नहीं चाहते कि जंगलराज दोबारा लौटे। लालू राज में बिहार माओवादी आतंक से जूझ रहा था। डेढ़ दर्जन जिलों में लोग दिन में भी घर से निकलने से डरते थे। पुलिस की बेरुखी के चलते न्याय की उम्मीद खत्म हो गई थी। सैकड़ों निर्दोष लोग माओवादियों के शिकार बने। आज स्थिति यह है कि केंद्र सरकार मार्च 2026 तक देश से ‘लाल आतंक’ को पूरी तरह उखाड़ फेंकने के लिए प्रतिबद्ध है।

‘जंगलराज’ के दौर में जहां उद्यमी बिहार छोड़ रहे थे, वहीं अब स्थिर माहौल ने रोजगार और निवेश को बढ़ावा दिया है। भाजपा नेतृत्व के भ्रष्टाचार विरोधी रुख ने लोगों के बीच भरोसा मजबूत किया है। लालू राज के 15 वर्षों में भय, अपराध और बदहाल व्यवस्था के कारण बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। शिक्षा की गिरावट और उद्योगों के ठप पड़ने से बेरोजगारी बढ़ी और रोजगार की तलाश में लोग दूसरे राज्यों में पलायन के लिए मजबूर हुए। डॉक्टरों व व्यवसायियों ने अपहरण और फिरौती के डर से राज्य छोड़ दिया। इसके कारण स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई और इलाज के लिए भी लोगों को बाहर जाना पड़ता था। अब लोग बिहार लौट रहे हैं।

सबका साथ, सबका विकास

24 वर्ष पत्रकारिता में बिताने के बाद रवि त्रिपाठी, जो अब राजनीति में हैं, बताते हैं कि 1990 के दशक में शिक्षा व्यवस्था इतनी बिगड़ चुकी थी कि छात्रों को बिहार छोड़कर दूसरे राज्यों में पढ़ाई करनी पड़ी। स्वयं उन्होंने सेशन लेट होने के कारण दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। शिक्षा और अवसरों के अभाव ने लाखों युवाओं को पलायन के लिए मजबूर किया। लेकिन नीतीश सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग को नई ताकत दी। मोदी-नीतीश की डबल इंजन सरकार ने स्कूल, दवाई, सिंचाई और घर-घर पानी जैसी योजनाओं से सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया। बिहार के 60 लाख गरीब परिवारों को पक्के मकान मिले, बिजली अब दिन के 22-23 घंटे उपलब्ध है और 125 यूनिट मुफ्त दी जाती है। युवाओं को स्नातक के बाद दो साल तक भत्ता मिलता है, जबकि विधवा और बुजुर्ग पेंशन 1,100 रुपये कर दी गई है।

वरिष्ठ पत्रकार सचिंद्र सिंह कहते हैं, मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत एक करोड़ से अधिक महिलाओं को दस-दस हजार रुपये सीधे खाते में मिले हैं और सफल उद्यम के लिए दो लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता भी दी जा रही है। नीतीश कुमार ने 2006 में बालिका साइकिल योजना शुरू कर लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। नतीजा, स्कूलों में लड़कियों के ड्रॉप आउट में कमी आई। आज वही पीढ़ी महिला मतदाता बन चुकी है।

तब… 

और… अब

 

विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं को सीधे लाभ पहुंचाने वाली नीतियों ने चुनावों में राजग को निर्णायक बढ़त दी है। लालू-राज में सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाएं थीं, जबकि मोदी-नीतीश शासन में उन्हें सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण का भरोसा मिला है। आंगनवाड़ी सेविकाओं और ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाया गया है। आईटीआई, पॉलिटेक्निक और स्किल प्रोग्राम्स ने युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। जो राज्य कभी डर और निराशा से भरा था, वहां अब आत्मविश्वास और विकास की नई रोशनी है।

बिहार की महिलाओं को मुफ्त बिजली, गैस, इलाज, शौचालय और पक्के मकानों से राहत मिली है, पर असली आत्मबल सुरक्षा से आया है। अब 112 पर कॉल कर महिलाएं अपनी यात्रा पर पुलिस की निगरानी सुनिश्चित कर सकती हैं, डिजिटल और भौतिक दोनों तरह से। 2016 की शराबबंदी कानून ने महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाया। पहले शराब पीकर हिंसा और उत्पात आम थे, लेकिन प्रतिबंध के बाद घरों और सड़कों दोनों में शांति और सुरक्षा लौटी है।

अर्थव्यवस्था को मिली गति

‘जंगलराज’ में अपराध और अपहरण ने बिहार की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया था। व्यापारी भय में जीते थे और निवेशक बिहार में पैसा लगाने से कतराते थे। नई औद्योगिक नीति, सख्त कानून व्यवस्था और बेहतर बिजली आपूर्ति से उद्योगों में फिर से जान आई है। अब निवेशक लौट रहे हैं, एमएसएमई व स्टार्टअप्स को नई मजबूती मिल रही है।

आज बिहार नई उम्मीद और नवाचार का प्रतीक बन रहा है। अब उद्यम और तकनीक का विकास दिख रहा है। मोदी-नीतीश की प्रतिबद्धता ने भय को विश्वास में बदला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, निवेशक फिर से बिहार की ओर लौट रहे हैं। पुराने उद्योग जैसे बरौनी, मोकामा और डालमियानगर को पुनर्जीवित किया जा रहा है।

बेगूसराय का उर्वरक संयंत्र भी पीएम ऊर्जा गंगा योजना के तहत दोबारा सक्रिय हुआ, जिससे युवाओं को रोजगार, किसानों को खाद और महिलाओं को सस्ती गैस मिली। बरौनी में बन रहा पेट्रोकेमिकल प्लांट हजारों लोगों को रोजगार देगा। बरौनी डेयरी के विस्तार से किसानों की आय बढ़ी है और बेगूसराय में उद्योग व मल्टीब्रांड शोरूम तेजी से खुल रहे हैं। मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत 18 से 50 वर्ष तक के लोगों को दस लाख रुपये तक की सहायता मिल रही है।

इस योजना से हजारों लोगों ने न सिर्फ अपना रोजगार शुरू किया, बल्कि दूसरों को भी काम दिया है। कुल मिलाकर बिहार अब पिछड़ेपन से प्रगति की ओर बढ़ चला है। लालू-राज के दौरान बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। 1991 में काला आजार की महामारी फैलने पर सैकड़ों लोग मारे गए, लेकिन मुख्यमंत्री लालू यादव को न तो आंकड़े पता थे, न उन्होंने प्रभावित जिलों का दौरा किया। केंद्रीय मंत्री माखन लाल फोतेदार की सहायता की पेशकश का भी कोई जवाब नहीं दिया गया। सरकार ने बीमारी को गंभीरता से लेने के बजाय मजाक में टाल दिया। स्वास्थ्य मंत्री सुधा श्रीवास्तव ने स्वीकार किया कि सरकारी डॉक्टर गांव नहीं जाते और दवाइयों की खुलेआम कालाबाजारी होती है। यह हाल बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता थी।

‘जंगलराज’ के दौरान स्वास्थ्य निदेशक आर.के. पासवान ने स्वीकार किया था कि अगर डीडीटी का छिड़काव होता तो काला आजार नहीं फैलता। उन्होंने लापरवाही पर बस इतना कहा, “हम लोग थोड़ा अपरा भाव तो मानते हैं अपने में।” उस समय अस्पतालों में डॉक्टर नहीं थे, दवाइयां गायब थीं और गरीब इलाज से पहले ही हार मान लेते थे। केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयास से अब हालात बदल गए हैं।

मोबाइल हेल्थ वैन से गांव-गांव तक डॉक्टर और दवाइयां पहुंच रही हैं। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए टीकाकरण नियमित है। 108 और 102 नंबर पर मुफ्त एम्बुलेंस सेवाओं से हर आपात स्थिति में मदद मिलती है। स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त किया गया है। स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार से उल्लेखनीय परिणाम मिले हैं। 2006-10 तक जहां औसत आयु 65.8 वर्ष थी, वह 2016-20 में बढ़कर 69.5 वर्ष हो गई। जीवन प्रत्याशा भी बढ़कर लगभग 70 साल हो गई है। 2015 में जहां प्रति हजार में से 42 नवजातों की मौत हो जाती थी, 2020 तक यह संख्या घटकर 27 रह गई। अब राज्य में 22 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 3000 एमबीबीएस सीटें हैं और मुजफ्फरपुर में नया होमी भाभा कैंसर अस्पताल खुला है।

आयुष्मान भारत योजना से हर परिवार को पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिल रहा है। स्वास्थ्य और जनकल्याण पर जोर देने से सामाजिक पूंजी और अर्थव्यवस्था, दोनों मजबूत हुए हैं। 2022-23 में बिहार की जीएसडीपी में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। वहीं सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब 1100 रुपये प्रति माह हो गई है। लालू शासन के विपरीत, जब बीमारियों पर ध्यान नहीं दिया जाता था, आज मोदी-नीतीश सरकार ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाकर बिहार का चेहरा बदल दिया है।

Topics: शिक्षाCrime/Offense‘जंगलराज’डबल इंजन सरकारसुशासनपाञ्चजन्य विशेषलाल आतंकeducationNDA governmentgood governanceमाओवादी आतंकअपराधराजनीतिक संरक्षणशहाबुद्दीनJungle Rajshahabuddinलालू राज
मनोज रघुवंशी
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