हाल ही में हरियाणवी अभिनेत्री अंजलि राघव और भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें पवन सिंह मंच पर अंजलि के साथ अभद्र हरकत करते नजर आ रहे थे। दोषी ठहराया गया अंजलि को, और ट्रोलिंग की बाढ़ उसी के खिलाफ आ गई।
पीड़ा से व्यथित होकर अंजलि ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी, किंतु भीतर का कष्ट इतना था कि वे अपने को रोक नहीं सकीं और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज से मार्गदर्शन मांगा। कहा- बहुत परेशान हूं, क्या करूं; लोग उन्हें सोशल मीडिया पर मीम्स बनाकर परेशान करते हैं, क्या वह इनका जवाब दें या इन्हें नजरअंदाज कर दें। अनिरुद्धाचार्य बोले, “हाथी चला बाजार, कुत्ते लगे हजार। जब माता सीता को लोगों ने नहीं छोड़ा तो हमें और आपको कौन छोड़ेगा। आलोचना करना उनका काम है और अच्छे काम करते रहना हमारा।”
यह प्रसंग केवल एक कलाकार के व्यक्तिगत संकट की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि आज भी संत समाज और प्रवचन परंपरा क्यों प्रासंगिक है? क्यों लोग अपने मानसिक कष्ट और द्वंद्व लेकर कथावाचकों के पास पहुंचते हैं? वस्तुत: यही तो भारतीय संत परंपरा की शक्ति है; वह जटिल समस्याओं को सरल शब्दों में समझाकर व्यक्ति के मन का बोझ हल्का कर देती है।
भारतीय समाज में संतों की भूमिका हमेशा से केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक प्रश्नों पर भी मार्गदर्शन दिया। कबीर ने जातिगत ढोंग तोड़े और तुलसी ने रामकथा के माध्यम से लोक को जोड़ा। भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसने हमेशा मन को केंद्र में रखा। गीता का युद्धक्षेत्र केवल कुरुक्षेत्र नहीं था, अर्जुन के मन का भी संघर्ष क्षेत्र था। उसका संकट बाहरी नहीं, आंतरिक था। कृष्ण ने उसे कर्मयोग का उपदेश देकर उसका द्वंद्व मिटाया। बुद्ध ने दुःख और उसके निवारण का मार्ग दिखाया। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के माध्यम से आत्मा और ब्रह्म की एकता बताकर भ्रम को दूर किया। प्रेमानंद महाराज का मार्गदर्शन भी अनगिनत लोगों को मिल रहा है। ऐसे प्रश्न जो अनुत्तरित रहते हैं और लोग पूछने से हिचकते हैं, वे प्रश्न प्रेमानंद महाराज के सामने आते हैं और उनका समाधान भी मिलता है।
अत: इस परंपरा का सार यही है कि व्यक्ति चाहे कितने भी कष्ट और आलोचना से घिरा हो, समाधान उसके भीतर है और संत केवल उस समाधान की ओर संकेत करते हैं। आज भी जब लोग कहते हैं कि “संत केवल प्रवचन करते हैं,” तो यह अधूरी समझ है। प्रवचन केवल धार्मिक कहानी या कोई कथा सुनाना नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा और सामाजिक विषमता का समाधान देना भी है। अंजलि राघव का प्रश्न, “मैं ट्रोलिंग का सामना कैसे करूं?” आधुनिक युग का प्रश्न है, जिस पर अनिरुद्धाचार्य का उत्तर कि “आलोचना से न डरो, कर्म करते रहो” वस्तुत: भारतीय संत परंपरा की कालातीत शिक्षा है।
आज यह प्रसंग केवल एक अभिनेत्री के व्यक्तिगत संकट की कहानी हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है, ऐसी अनेक घटनाएं हमारे बीच हर पल घट रही हैं, जो व्यक्ति को वैचारिक रूप से इतना तोड़ देती हैं कि कई बार वह मृत्यु को गले लगा लेता है, लेकिन वहीं, भारतीय संत समाज के विवेक एवं सत्संग का साथ जिन्हें मिलता है, वह कठिन समय को भी हंसकर निकाल देते हैं।
यह घटना उन लोगों के समझने के लिए भी है जो आज संत समाज और प्रवचन परंपराओं पर प्रश्न उठाते हैं, और इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करते हैं। यह कहकर कि ये कथावाचक केवल अंधविश्वास फैलाते हैं, वास्तव में ये उदाहरण दिखाता है कि उनकी भूमिका समाज और व्यक्ति दोनों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
आज का समाज तनाव, ट्रोलिंग, सोशल मीडिया के दबाव और सार्वजनिक छवि की चिंता से भरा दिखता है। कोई कलाकार एक मंचीय घटना से बदनाम हो जाता है, कोई आम व्यक्ति कार्यस्थल या परिवार में लगातार आलोचना का सामना करता है और फिर सोशल मीडिया की अदालत तो है ही! बिना सच्चाई जाने तुरंत फैसला सुना देती है। कहना होगा कि इन परिस्थितियों में प्रवचन केवल धार्मिक रस्म नहीं रह जाते, यह मानसिक उपचार का साधन बन जाते हैं। प्रवचन सुनने से व्यक्ति का मन हल्का होता है, उदाहरणों और उपमाओं से जटिल समस्याएं सरल लगने लगती हैं, और व्यक्ति आलोचना तथा द्वंद्व से बाहर निकलकर सकारात्मक दृष्टिकोण प्राप्त करता है।
अंजलि राघव का प्रसंग हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे समाज की मानसिकता आखिर कब बदलेगी। जब कोई महिला सार्वजनिक रूप से असहज स्थिति में आकर संकेत देती है, तो क्या हमें तुरंत उसका समर्थन नहीं करना चाहिए? परंतु इसके विपरीत होता यह है कि महिला को ही दोषी ठहरा दिया जाता है! यहां अनिरुद्धाचार्य का उत्तर केवल अंजलि के लिए नहीं, बल्कि हर उस स्त्री और पुरुष के लिए है जो समाज की आलोचना और तानों से आहत होता है।
यह संवाद यह भी बताता है कि द्वंद्व और कष्ट स्थायी नहीं होते, अच्छाई का मार्ग कठिन जरूर है, किंतु अंततः वही विजय की ओर ले जाता है। अंजलि राघव की घटना हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम फूहड़ता को ही कला मानते रहेंगे, या संस्कार और संवेदना को भी महत्व देंगे। जब भी जीवन में आलोचना और अपमान के बादल घेरें, तो हमें उसी परंपरा की ओर लौटना चाहिए जिसने सदियों से भारत को अंधकार से उजास की ओर बढ़ाया है।

















