भारत-जापान व्यापार समझाैता : एशिया में नई शक्ति संतुलन की नींव
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भारत-जापान व्यापार समझाैता : एशिया में नई शक्ति संतुलन की नींव

भारत-जापान संबंध प्राचीन सांस्कृतिक जुड़ाव से निकलकर आज रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी साझेदारी में बदल चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी की हाल की जापान यात्रा के दौरान 13 समझौतों और 170 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। यह साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, समृद्धि और वैश्विक शांति की धुरी बन रही है

Written byराजीव उपाध्यायराजीव उपाध्याय
Sep 17, 2025, 08:02 pm IST
inभारत, विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तोक्यो में जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ समझौता ज्ञापनों के आदान-प्रदान और संयुक्त प्रेस वक्तव्य के दौरान।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तोक्यो में जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ समझौता ज्ञापनों के आदान-प्रदान और संयुक्त प्रेस वक्तव्य के दौरान।

भारत-जापान संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं, जिनकी नींव छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म के आगमन से पड़ी। स्वतंत्रता के बाद 1952 में औपचारिक राजनयिक संबंध बने और 2011 का व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) व्यापार व निवेश के लिए मील का पत्थर बना। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की यात्राओं, विशेषकर 20-31 अगस्त, 2025 की यात्रा के दौरान हुए 13 समझौतों ने संबंधों को और गहरा किया। अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल में दोनों देशों ने स्थिरता और सहयोग का संदेश दिया। अगले दशक के लिए निवेश, तकनीक, स्वास्थ्य, पर्यावरण, गतिशीलता और मानव संसाधन आदान-प्रदान पर विस्तृत रोडमैप तय हुआ। सेमीकंडक्टर, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा, दुर्लभ खनिज और स्वच्छ प्रौद्योगिकी में संयुक्त सहयोग पर भी जोर रहेगा। हाई-स्पीड रेल, बंदरगाह, विमानन और शिप-बिल्डिंग में जापान तकनीकी व वित्तीय मदद जारी रखेगा।

जापान ने अगले 10 वर्ष में भारत में 10 खरब येन (लगभग 6 लाख करोड़ रुपये) निवेश का लक्ष्य तय किया है, जिसमें एमएसएमई और स्टार्टअप्स पर विशेष जोर रहेगा। यह 2022 के 5 खरब येन के लक्ष्य से दोगुना है। समझौते के तहत 5 लाख भारतीय युवाओं को अगले 5 वर्ष में जापान में रोजगार और प्रशिक्षण मिलेगा, खासकर आईटी और स्वास्थ्य क्षेत्र में। दोनों देशों का उद्देश्य सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, फार्मा और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ाकर चीन के प्रभाव को संतुलित करना और ‘मुक्त-खुले हिंद-प्रशांत’ को प्रोत्साहित करना है। इस यात्रा के दौरान 170 से अधिक एमओयू हुए, जिनमें भारत की पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना के लिए ई-10 शिंकानसेन बुलेट ट्रेन की पहल प्रमुख है। यात्रा को आर्थिक सुरक्षा का नया चरण माना जा रहा है, जो अर्धचालक, खनिज, दूरसंचार उपकरण, उभरती तकनीक और स्टार्टअप्स में साझेदारी को मजबूत करेगा।

राजीव उपाध्याय
सहायक प्रोफेसर, शहीद भगत सिंह काॅलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय

भारत-जापान साझेदारी का लक्ष्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, शांतिपूर्ण और नियम-आधारित व्यवस्था स्थापित करना है। दोनों देश आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा पर सहयोग बढ़ा रहे हैं, जिससे आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और रक्षा संबंध गहरे हो रहे हैं। पिछले दशक में द्विपक्षीय व्यापार निरंतर बढ़ा है। यह 2023-24 में 22.85 अरब डॉलर पर पहुंच गया। जापान का भारत को निर्यात 17.69 अरब डॉलर और भारत का निर्यात 5.15 अरब डॉलर रहा। मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल में जापान की बढ़त से व्यापार असंतुलन है, जबकि भारत इंजीनियरिंग सामान, रसायन और समुद्री उत्पाद भेजता है।

हालांकि, जापान का भारत में बढ़ता निवेश इस असंतुलन को संतुलित करता है और साझेदारी को और मजबूत बनाता है। भारत-जापान आर्थिक साझेदारी में व्यापारिक वृद्धि के साथ-साथ निवेश और तकनीकी सहयोग भी बढ़ रहा है, जो दोनों देशों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। जापान 1958 से भारत का सबसे बड़ा द्विपक्षीय सहयोगी रहा है और आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) के तहत अब तक 6.978 खरब येन (लगभग 4.4 लाख करोड़ रु.) की वित्तीय मदद दी है। इससे दिल्ली मेट्रो, शिंकानसेन हाई-स्पीड रेल व पूर्वोत्तर भारत की अवसंरचना जैसी बड़ी परियोजनाएं संभव हुईं। यह सहायता लंबे समय तक आसान शर्तों वाले ऋ ण के रूप में मिलती है।

निवेश बढ़ाएगा जापान

पिछले दशकों में जापान ने भारत में एफडीआई और ओडीए के जरिये 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। अप्रैल 2000 से दिसंबर 2024 तक उसका कुल एफडीआई 43.28 अरब डॉलर रहा, जो ऑटोमोबाइल, विद्युत उपकरण, रसायन, फार्मा और अवसंरचना क्षेत्रों में केंद्रित है। इस प्रकार, जापान भारत का पांचवां सबसे बड़ा एफडीआई स्रोत है। जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जेबीआईसी) रिपोर्ट (2024) के अनुसार, चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत अब जापानी विनिर्माण कंपनियों का शीर्ष गंतव्य बन गया है। अक्तूबर 2023 में राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष (एनआईआईएफ) और जेबीआईसी ने 600 मिलियन डॉलर का भारत-जापान कोष शुरू किया, जो नवीकरणीय ऊर्जा, ई-मोबिलिटी और सर्कुलर इकोनॉमी पर केंद्रित है। इसमें भारत का योगदान 49 प्रतिशत और जेबीआईसी 51 प्रतिशत है।

चुनाैतियां और अवसर

भारत-जापान आर्थिक संबंध मजबूत होते हुए भी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। व्यापार संतुलन जापान के पक्ष में है, इसलिए भारत को निर्यात विविधीकरण की जरूरत है। इंजीनियरिंग वस्तुएं, विशेष औषधियां, प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद और सेवाओं में निर्यात बढ़ाकर सीईपीए का लाभ उठाया जा सकता है। एआई, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा जैसे उभरते क्षेत्रों में दोनों देशों के लिए बड़े अवसर हैं। नियामक सुधार, व्यापार सुगमता और गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना जापानी निवेश आकर्षित रखने के लिए जरूरी है।

वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ने वाले क्षेत्रीय विनिर्माण क्लस्टर विकसित करने के लिए जापान के साथ रणनीतिक साझेदारी करनी होगी। इसी प्रकार, अनुसंधान, विकास व शिक्षा के क्षेत्र में जापानी कंपनियाें और विश्वविद्यालयों को संयुक्त केंद्रों के लिए आमंत्रित कर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना होगा। अर्धचालक, ऑटो घटकों, हरित ऊर्जा व विनिर्माण में जापानी निवेश से स्थानीय उत्पादन व तकनीकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा।

जापान का ओडीए और निजी वित्त बंदरगाह, रेल व औद्योगिक गलियारों जैसी परियोजनाओं में अहम है। भारत का जापान में निर्यात हिस्सा अभी केवल 1-2 प्रतिशत है, जिसे आसियान, चीन और कोरिया जैसी प्रतिस्पर्धा चुनौती देती है। नियामक और गैर-शुल्क बाधाएं, जैसे फार्मा और खाद्य क्षेत्र में उत्पाद अनुमोदन की जटिलताएं, भारतीय निर्यातकों के लिए बाधक हैं। इसे कम करने के लिए द्विपक्षीय वार्ता आवश्यक है। भारत को बुनियादी ढांचे और रसद सुधार पर जोर देना होगा। साथ ही अनुसंधान, नवाचार और शिक्षा में जापानी सहयोग से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण बढ़ाया जा सकता है।

आज जापान के साथ द्विपक्षीय व्यापार 22.85 अरब डॉलर और एफडीआई 43.2 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी आधारित है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा क्वाड, आपूर्ति शृंखला विविधीकरण और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा चुनौतियों के बीच हुई। इसका उद्देश्य निवेश बढ़ाना, तकनीकी सहयोग मजबूत करना, सीईपीए के तहत व्यापार सुगमता सुनिश्चित करना व बाजार विस्तार को प्रोत्साहित करना है।

यह यात्रा उन्नत तकनीक, शिंकानसेन हाई-स्पीड रेल, रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा में नए लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। भविष्य की सफलता राजनीतिक प्रतिबद्धता, व्यावसायिक सहभागिता और सांस्कृतिक संपर्कों पर निर्भर करेगी। जापान में 53,000 से अधिक भारतीयों की उपस्थिति और भारत में बढ़ती जापानी सक्रियता इस साझेदारी की मजबूती का प्रतीक हैं। भारत-जापान सहयोग क्षेत्रीय समृद्धि, वैश्विक स्थिरता और साझा मानवीय प्रगति में अहम योगदान देने के लिए तैयार है।

Topics: तकनीकडिजिटलसेमीकंडक्टरपाञ्चजन्य विशेषशिंकानसेन हाई-स्पीड रेलरक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षाराजीव उपाध्यायभारत-जापान व्यापारभारत जापान संबंध
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